संपादकीय

भारत पर 100 फीसदी टैरिफ!

राष्ट्रपति टं्रप ने टैरिफ का खेल फिर शुरू कर दिया है। अमरीकी कांग्रेस (संसद) में एक बिल पेश किया गया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले पांच देशों-भारत, चीन, हंगरी, अजरबैजान, स्लोवाकिया-पर 100 फीसदी टैरिफ थोपने का प्रावधान है। संसद में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स सांसद बिल पारित करने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे रूस की अर्थव्यवस्था को अधिक कमजोर करना चाहते हैं। बिल के मसविदे में 500 फीसदी टैरिफ का प्रस्ताव था, जिसे घटा कर 100 फीसदी किया गया है। यदि अमरीकी संसद में यह बिल पारित किया जाता है, तो भारत पर 100 फीसदी टैरिफ के अलावा, 12.5 फीसदी बाल-मजदूरी का टैरिफ और 18 फीसदी सामान्य टैरिफ, कुल मिला कर 130.5 फीसदी टैरिफ लागू हो सकता है। अमरीका ने हमारे तांबा, इस्पात, एल्युमीनियम पर 50 फीसदी टैरिफ और सेमीकंडक्टर तथा ऑटो पाट्र्स पर 25-25 फीसदी टैरिफ थोप रखा है। यदि 100 फीसदी टैरिफ लागू हो गया, तो भारत अमरीका को जो सालाना 6.5 लाख करोड़ रुपए का निर्यात करता है, वह प्रभावित होगा। रूस से कच्चा तेल खरीद कर भारत सालाना 60,000 करोड़ रुपए की बचत करता है, लेकिन टैरिफ लागू होने से 10 गुना अधिक निर्यात पर पलीता लग सकता है। भारत के 2.1 लाख करोड़ रुपए के फार्मा, वस्त्र, हीरे के निर्यात पर भी असर पड़ेगा। आखिर अमरीका के साथ ‘माई डियर फ्रेंड’ वाली दोस्ती और रणनीतिक साझेदारी का सच यही है कि हम टैरिफ की मार लगातार झेलते रहें? राष्ट्रपति टं्रप के आदेशानुसार ही तेल, गैस के आयात करें? यदि वह रूसी तेल की खरीद के लिए छूट दे, तो बल्लियां उछलते रहें और रूस से खुल कर खरीददारी करें? टं्रप होते कौन हैं, क्या दुनिया भर के ‘चौधरी’ हैं, ठेकेदार हैं, जो भारत जैसे संप्रभु देश और दुनिया के सबसे बड़े बाजार को हांकते रहते हैं? हमारी सरकार और नेतृत्व गुमसुम क्यों रहते हैं? ब्राजील जैसे छोटे देश के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा अमरीका को टका-सा जवाब दे सकते हैं, लेकिन दुनिया की सबसे अधिक आबादी का देश-भारत-अमरीकी राष्ट्रपति के फरमान सुनने और पालन करने को विवश है? दुर्भाग्य, विडंबना और शर्मिन्दगी है! सवाल यह भी गंभीर है कि क्या राष्ट्रपति टं्रप 100 फीसदी टैरिफ थोप कर भारत पर ‘व्यापार समझौते’ के लिए दबाव बनाने में कामयाब हो सकते हैं? फरवरी में समझौते की जो रूपरेखा सार्वजनिक हुई थी, उसके बाद आधी जुलाई तक भी ‘अंतिम सौदा’ नहीं हो पाया है! बहरहाल भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा है। जून में भी 26.1 लाख बैरल तेल रोजाना खरीदा गया। टं्रप की टैरिफ नीति भी अजीब है, क्योंकि रूस से लगातार गैस खरीदने वाले यूरोपीय देशों को प्रस्तावित टैरिफ से बाहर रखा गया है। यूरोपीय देश रूस से 65,000 करोड़ रुपए की गैस आयात कर रहे हैं। क्या वे ‘मौसी के बेटे’ हैं टं्रप के? क्या इससे रूस की युद्ध-मशीन को ताकत नहीं मिल रही है? युद्ध के मैदान में यूरोप रूस के खिलाफ मोर्चे खोल रहा है, यूक्रेन को हरसंभव मदद दे रहा है, लेकिन 9.97 मिलियन मीट्रिक टन गैस बीते 6 माह के दौरान रूस से खरीदी है। यह कैसी कूटनीति है भाई? यही नहीं, बिल में प्रस्ताव है कि जो देश रूस से सैन्य उपकरण, हथियार आदि भी खरीदेगा, टैरिफ उस पर भी थोपा जाएगा। भारत रूस से करीब 45 फीसदी हथियार, सैन्य सामग्री, रक्षा उपकरण आदि दशकों से खरीद रहा है, क्या भारत पर अतिरिक्त टैरिफ भी लग सकता है? हालांकि अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने टं्रप-टैरिफ को बिल्कुल ‘अवैध’ करार दिया था, लेकिन टं्रप किसकी परवाह करने वाले राष्ट्रपति हैं? वह तो ‘पक्के दुकानदार’ हैं और विदेश नीति, व्यापार नीति भी ‘दुकान’ की तरह चलाना चाहते हैं! अमरीका ने भारत पर गंभीर आरोप लगाया था कि भारत जो सामान अमरीका में बेचता है, वह सामान ‘जबरन श्रम’, यानी बाल-मजदूरी, से बनवाया गया होता है, लिहाजा अमरीका ने 12.5 फीसदी टैरिफ थोप रखा है। भारत सरकार ने उस आरोप का जबरदस्त जवाब क्यों नहीं दिया? क्या अमरीका चाहता है कि भारत उससे ही तेल खरीदे? क्यों खरीदें? वह कच्चा तेल महंगा पड़ता है और आपूर्ति कमोबेश 40 दिन के बाद होती है। बेशक भारत को टैरिफ की यह लड़ाई निर्णायक तौर पर लडऩी चाहिए। भारत एक प्रभुता संपन्न देश है। उसे कोई बाहरी ताकत अपनी इच्छा अनुसार हांक नहीं सकती है। भारत को अपने हित में स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का पूरा-पूरा हक है।

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