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सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति और कॉलेजियम के फैसलों को RTI के दायरे में लाने की याचिका, सुनवाई से अलग हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने एक याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति से जुड़े ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (MoP) को अंतिम रूप देने और कॉलेजियम के फैसलों को ‘सूचना का अधिकार’ यानी RTI कानून के दायरे में लाने की मांग से जुड़ा है। इसे लेकर शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई थी, जिसमें जस्टिस नरसिम्हा ने खुद को सुनवाई से अलग करने का फैसला लिया है।

सुनवाई से क्यों अलग हुए जस्टिस नरसिम्हा

‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ MoP को अंतिम रूप देने संबंधी यह याचिका जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने सूचीबद्ध था। सुनवाई शुरू होते ही, जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकते, क्योंकि ‘नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन’ (NJAC) से जुड़ी कार्यवाही के दौरान, वह एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के तौर पर पांच जजों की संविधान पीठ के सामने पेश हुए थे। यह याचिका NGO ‘लोक प्रहरी’ ने दायर की है।

क्या है MoP को अंतिम रूप देने की याचिका

  • याचिका में भारत के मुख्य न्यायाधीश और केंद्र सरकार से संशोधित ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ को अंतिम रूप देने का निर्देश देने की मांग की गई है
  • पूरा मामला करीब 11 साल से लंबित है
  • MoP में हायर ज्यूडिशियरी में जजों की नियुक्ति, प्रमोशन और ट्रांसफर से जुड़ी प्रक्रिया तय की गई है
  • अक्टूबर 2015 में, पांच जजों की एक संविधान पीठ ने NJAC कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था
  • सर्वोच्च कोर्ट ने साथ ही सरकार को निर्देश दिया था कि वह CJI और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के साथ परामर्श करके मौजूदा MoP को अंतिम रूप दे।

सुप्रीम कोर्ट दिए थे खास निर्देश

शीर्ष कोर्ट ने कई ऐसे पहलुओं की पहचान की थी जिन पर ध्यान देने की जरूरत थी, जैसे- न्यायिक नियुक्तियों के लिए पात्रता मानदंड, चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता, एक स्थायी सचिवालय, और संभावित उम्मीदवारों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए एक तंत्र। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट कॉलेजियम की बैठकों के मिनट्स को RTI कानून के तहत उपलब्ध कराया जाए।

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