संपादकीय

भारत में ’सूखा’

भारत में ‘सूखा’ पड़ रहा है। मॉनसून बीते अभी एक माह भी नहीं हुआ, लेकिन देश में ‘जल-आपातकाल’ के हालात बन गए हैं। करीब 10 साल के अंतराल के बाद 2026 में अब भारत में ‘सूखे’ की स्थितियां स्पष्ट हो चुकी हैं। करीब 70.6 फीसदी हिस्सा, किसी न किसी रूप में, ‘सूखे’ का सामना कर रहा है। बुनियादी कारण ‘कम बारिश’ ही नजर आता है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर इस बार सामान्य से करीब 13 फीसदी बारिश कम हुई है। देश के 300 बड़े जलाशयों में पानी बहुत कम है। तालाब तो शहर-दर-शहर सूख चुके हैं। कम बारिश, अनियमित बारिश और अलनीनो के व्यापक प्रभाव के कारण स्थितियां यहां तक पहुंच चुकी हैं कि गोवा में 94.6 से 100 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में करीब 82 फीसदी, पंजाब में करीब 80 फीसदी, कर्नाटक में 76.3 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश में 76.1 फीसदी, तेलंगाना में करीब 76 फीसदी, महाराष्ट्र में 70-84 फीसदी, हरियाणा में करीब 76 फीसदी और बिहार में 70 फीसदी से अधिक इलाके ‘सूखा-प्रभावित’ माने जा रहे हैं। महाराष्ट्र में 358 में से 265 तालुकाओं को ‘सूखाग्रस्त’ घोषित किया जा चुका है। कर्नाटक ने केंद्र से 11,000 करोड़ रुपए की मदद मांगी है। आंध्रप्रदेश ने भी केंद्र सरकार से मदद के अलावा सबसिडी की गुहार भी लगाई है। भारत में 1871 से 2026 के बीच 27 ‘सूखे वर्ष’ दर्ज किए जा चुके हैं। हालांकि लगातार दो साल सूखा पड़ा हो, ऐसा अपेक्षाकृत दुर्लभ ही रहा है। 2001 के बाद 6 में से 5 सूखे अलनीनो से जुड़े और प्रभावित रहे हैं। मौजूदा संदर्भ में मजबूत अलनीनो का असर 2027 तक बना रह सकता है। बहरहाल सूखे का पहला असर कृषि पर होगा। सोयाबीन, बागवानी और खरीफ की अन्य फसलों को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।

कई इलाकों में सोयाबीन की फलियों में दाने तक नहीं बन पाए हैं। कृषि से जुड़ा पहला सवाल यह है कि क्या देश में खाद्य-संकट पैदा हो सकता है? क्या अकाल और भुखमरी के हालात भी बन सकते हैं? विशेषज्ञ मान रहे हैं कि सूखे के कारण 15,000 से अधिक मौतें हो सकती हैं! यह घोर त्रासद होगा! भारत में खाद्य-सुरक्षा के अधिकार का कानून है। भारत सरकार गेहूं, चावल, चना, चीनी और अन्य अनाजों के ‘पर्याप्त भंडारों’ का दावा करती रही है। सरकार आज भी करीब 81.5 करोड़ भारतीयों को ‘मुफ्त राशन’ बांट रही है। बाजार में भी कोई संकट या कमी नहीं है, लिहाजा खाद्य-संकट के तात्कालिक आसार नहीं लगते। जहां तक जीडीपी का सवाल है, उसमें अब कृषि का करीब 16 फीसदी योगदान है। आजादी के वक्त यह योगदान 52 फीसदी था। किसान की करीब 39 फीसदी आमदनी ही खेती से होती है, शेष वह मजदूरी से कमाता है। यह भी कृषि के संदर्भ में विडंबना है कि हम उसे आमदनी का बुनियादी, ठोस आधार नहीं बना पाए, नतीजतन किसान आज भी गरीब और कर्जदार है। यह देश की अर्थव्यवस्था का भी एक कुरूप यथार्थ है। बहरहाल सूखे का असर किसानों और देश की आर्थिक विकास दर पर कितना पड़ेगा, यह आकलन आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा, क्योंकि सिंचाई के लिए अब नलकूपों, छोटे-छोटे चैक डैम आदि का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। उनके लिए भी पानी की आवश्यकता बुनियादी है और सूखे से पहले ही कई इलाकों में भू-जल स्तर में भारी गिरावट आई है। निजी और व्यापारिक तौर पर बोरिंग कराई जा रही हैं, लेकिन भूमिगत जल नहीं है, तो बोरिंग से भी पानी कहां से मिलेगा? सूखे के कारण पेयजल, पशुओं के चारे की किल्लत भी बढ़ गई है, नतीजतन किसानों को औने-पौने दामों पर अपने मवेशी तक बेचने को बाध्य होना पड़ रहा है। देश के करीब 86 फीसदी किसानों के पास औसतन एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। यदि सूखे के कारण उसकी आमदनी प्रभावित होती है, तो घर खर्च, बच्चों की स्कूल फीस, दवा-इलाज, जीवन की अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए पैसा कहां से आएगा?

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button