संपादकीय

पीएम संबोधन में शिक्षा गायब

पांच सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ आया और चला गया। कुछ रस्मी आयोजन जरूर किए गए। देश में यह दिवस प्रथम उपराष्ट्रपति एवं दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर मनाया जाता है। वह महान दार्शनिक और शिक्षाविद थे। राधाकृष्णन की अदम्य और विनम्र इच्छा थी कि उनका जन्मदिन शिक्षा और शिक्षकों को समर्पित किया जाएगा, तो अच्छा रहेगा। 1962 से यह सिलसिला जारी है कि 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शिक्षक को ‘नियति का निर्माता’ करार दिया है, तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सरकारी आवास पर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षकों से मुलाकात की। उनके साथ हल्के-फुल्के पल भी जिए। बच्चों के संदर्भ में स्क्रीन टाइम और नशे की लत से बचाने की नसीहत भी दी। इसी दिन प्रख्यात श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का ‘शताब्दी समारोह’ भी मनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी मुख्य अतिथि थे और उन्होंने छात्रों की युवा पीढ़ी, जेन-जी, को संबोधित भी किया। अपेक्षा थी कि प्रधानमंत्री शिक्षा, स्कूल, परीक्षा और रोजगार पर सरकार की नीतियों और विचाराधीन कार्यक्रमों, योजनाओं पर कुछ साझा करेंगे, लेकिन उनका संबोधन 2013 की स्थितियों और ‘आधा गिलास खाली’ की राजनीति पर ही केंद्रित रहा। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर दोहराया कि 2014 से पहले का कालखंड निराशा, हताशा के दलदल में फंसा था। घोटाले चरम पर थे। विकास फर्श पर और महंगाई अर्श पर थी। उन्होंने छात्रों से कहा कि आप इंटरनेट खोल कर सब कुछ पढ़ और जान सकते हैं कि तब हालात क्या थे? दरअसल हमारा सवाल यहीं उभरता है कि क्या अध्ययनरत छात्रों का यही सरोकार होना चाहिए? उन्हें शिक्षा, परीक्षा, रोजगार के प्रति आश्वस्त नहीं किया जाना चाहिए था? प्रधानमंत्री का संबोधन था, न कि एक विशुद्ध राजनेता छात्रों के साथ संवाद कर रहा था! यहां हम कुछ आंकड़े फिर दोहरा रहे हैं, ताकि पाठक और सरकार जान सकें कि देश में स्कूली शिक्षा और आधारभूत ढांचे का यथार्थ क्या है? 2014-25 के दौरान 1.02 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और 1.04 लाख स्कूलों में एक ही अध्यापक (शिक्षक?) है। क्या वह अपने शिक्षक-धर्म को निभा सकता है?

करीब 70,000 स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है, 55083 स्कूलों में लाइब्रेरी नहीं है, 4.08 लाख स्कूलों में कम्प्यूटर की व्यवस्था नहीं है, 46345 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है और देश के 48 फीसदी छात्र सरकारी स्कूलों से ही शिक्षित होने को बाध्य हैं। करीब 48 फीसदी छात्र 12वीं कक्षा तक पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। ऐसे यथार्थ में हम एक पर्याप्त पढ़ी-लिखी, हुनरमंद जेन-जी की पीढ़ी कैसे पैदा कर सकते हैं? ऐसे कई आंकड़े प्रधानमंत्री मोदी के ध्यान में होंगे! उन्हें ‘शिक्षक दिवस’ पर कौन-सा प्रधानमंत्री स्वीकार करेगा? छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार की खूब गालबजाई की। पहली तिमाही की विकास दर 7.8 फीसदी को ‘अतुलनीय’ और वैश्विक करार दिया। प्रधानमंत्री ने करीब 60 करोड़ जन-धन खातों, देश की 50 फीसदी आबादी के बैंक खातों, करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए के मोबाइल निर्यात, करीब 2 लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन और करीब 40,000 करोड़ रुपए के रक्षा-निर्यात, रेलवे के 100 फीसदी विद्युतीकरण के साथ-साथ नक्सलवाद के खात्मे और ‘दिमागी नक्सल’ की होम्योपैथिक गोली आदि का भी उल्लेख किया। ये उल्लेख प्रधानमंत्री करते भी रहे हैं तथा किसी और मौके पर जिक्र कर सकते थे। रोजगार के संदर्भ में सिर्फ यही कहा-‘अवसर पैदा हो रहे हैं।’ शायद प्रधानमंत्री जानते होंगे कि केंद्र सरकार में अब भी 8,23,556 स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। रक्षा मंत्रालय और रेलवे में ही करीब 2.41 लाख (प्रत्येक में) पद रिक्त हैं। सरकार इन पदों पर नियुक्तियां क्यों नहीं करती? आखिर हमारी अर्थव्यवस्था 4.15 ट्रिलियन डॉलर की है और हम सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था भी हैं। गौरतलब यह भी है कि 2005-23 के दौरान 21 राज्यों में कुल 220 परचे लीक हुए, नतीजतन करीब 10 करोड़ छात्र उनसे प्रभावित हुए। ‘शिक्षक दिवस’ कुल 1 करोड़ से अधिक अध्यापकों, शिक्षकों को समर्पित घोषित किया जाता है। यदि प्रधानमंत्री भी शिक्षा, स्कूल, परीक्षा, रोजगार की बात नहीं करेंगे, तो पूर्व राष्ट्रपति राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अधूरी और रस्मी ही होगी। महंगाई का आलम तो यह है कि करीब 40 करोड़ भारतीय महंगी स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च नहीं उठा सकते। प्रधानमंत्री इन संदर्भों में क्या कहना चाहेंगे?

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