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जेल जाने का सुख!

चाहिए तो यह था कि इस टाइमगैप अरेंजमेंट काल में राजकुमार को पढऩे के लिए पंचतंत्र दिया जाता। लेकिन वह वक्त तो राजकुमार ने मनमोहन सिंह द्वारा बनाए अधिनियमों को सार्वजनिक रूप से फाड़ कर अपनी झूठी शक्ति का प्रदर्शन करने में लगा दिया। अब राजवंश में हडक़म्प मचा हुआ है। राजकुमार की उम्र बढ़ती जा रही है। राजमाता की तबीयत ठीक नहीं रहती। समय हाथ से निकला जा रहा है। लगता है अब दरबारियों ने समझाया है कि घर बैठने या विदेश में जाते रहने से कुछ नहीं बनेगा। सदा सडक़ों पर घूमा करो। आम लोग जैसा बनने की कोशिश करो…

राजशाही और लोकशाही/लोकतंत्र में क्या संबंध है, यह राजनीति विज्ञान पंडितों की माथापच्ची के लिए उपयुक्त विषय हो सकता है। राजशाही का अर्थ तो सभी जानते हैं। जिस व्यवस्था में राजा का बेटा ही राजा बनता है। बेटे को इसके लिए किसी योग्यता या प्रतिभा की जरूरत नहीं होती। राजा के घर में जन्म लेना ही उसकी सबसे बड़ी योग्यता होती है। दुनिया के इतिहास में ऐसे भी बहुत से उदाहरण मिल जाते हैं जहां राज का ताज उस व्यक्ति के सिर पर आ जाता है जिसे उस ताज का अर्थ भी नहीं पता होता। ऐसे राजा की अज्ञानता का लाभ उठाकर उसके दरबारी जो तांडव मचाते हैं, उससे भी इतिहास भरा पड़ा है। लेकिन मेरा मूल प्रश्न तो यह है कि क्या राजशाही या लोकशाही का भी कोई संबंध हो सकता है, क्योंकि ये दोनों अवधारणाएं तो एक-दूसरे की बिल्कुल विरोधी हैं? लोकतांत्रिक राजशाही वह होती है जिसमें राजा तो राजा का बेटा ही बनता है, लेकिन उसका चयन लोकमत से होता है। जब लोकमत की मोहर लग जाती है तो माना तो यही जाएगा कि लोकतांत्रिक पद्धति से ही राजा बना है। उसके भी बहुत से उदाहरण इतिहास में मिल जाते हैं। राजनीति विज्ञान पंडित इसकी व्याख्या कैसे करेंगे, इसके बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन सामान्य जन के पास इसकी सहज व्याख्या होती है। ‘इनके खानदान में किसी ने पुण्य कर्म किए होंगे जिसका फल उस खानदान के लोग पीढिय़ों से खा रहे हैं।’ यदि उस खानदान के लोग उस पुण्य कर्म में कुछ न कुछ खुद भी जोड़ते रहें तो राजवंश लोकतांत्रिक ढंग से भी काफी देर तक चलता रहता है।

यदि यह ‘कुछ न कुछ’ जोड़ते रहने की क्रिया बन्द हो जाए तो एक न एक दिन राजवंश की पूर्व पुण्य कर्म की तमाम पूंजी समाप्त हो जाती है। तब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया भी राजवंश की रक्षा नहीं कर सकती। यह तो हुई राजवंशों के उत्थान और पतन को लेकर आम आदमी द्वारा की गई व्याख्या। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक दुखद पहलू भी है। राजवंश के पूर्व जन्मों के किए गए पुण्य कर्म तो लगभग समाप्त हो रहे होते हैं लेकिन राजवंश के बच्चों की मानसिकता तो वही रहती है कि ‘मैं बड़ा होकर इस देश का राजा’ बनूंगा। वे यह भी अपने अवचेतन में मानते रहते हैं कि मुझे देश के लोग हर हालत में राजा चुनेंगे ही। यदि शुरू से ही उनके आसपास के, परिवार के लोग यह समझाना या बताना शुरू कर दें कि राजवंश के पुण्य कर्म समाप्त हो चुके हैं, इसलिए यदि राजा बनना है तो स्वयं में योग्यता अर्जित करो, तो शायद राजवंश के बच्चे इस ओर भी ध्यान देने लगते। पंचतंत्र का तो इतिहास ही यही है। जब राजा को विश्वास हो गया कि उसके पुत्र योग्य नहीं हैं तो उसको चिन्ता हुई। कई गुरुकुलों में पढऩे के लिए भेजा। लेकिन वे फालतू की उछल-कूद करते रहे, गुरुजनों का अपमान करते रहे, बड़े-छोटे का लिहाज भूल गए थे, ज्ञान अर्जित करने में उनकी कोई रुचि विकसित नहीं हुई। उनको शायद लगता था, यह योग्यता हासिल करने के लिए इतनी मेहनत क्यों करें। राजा तो हमको ही बनना है, चाहे योग्यता हो या न हो। बच्चों की बात तो ठीक थी क्योंकि राजा तो उनको ही बनना था। लेकिन राजा चाहता था कि राजा बुद्धिमान भी होना चाहिए। इसलिए अन्तत: उसने उन्हें विष्णु शर्मा के पास पढऩे के लिए भेजा। विष्णु शर्मा ने पूरा पंचतंत्र उन राजपुत्रों को योग्य बनाने के लिए ही रचा था। लेकिन कई बार अस्ताचलगामी राजवंश इतनी जल्दी में होता है कि वह ‘पंचतंत्र’ वाला प्रयोग भी नहीं होता। राजवंश के बच्चे राजा बनने के लिए मचलते हैं और अब लोग उन्हें राजा बनाने के लिए तैयार नहीं होते। क्योंकि नए युग में राजवंश के बेटे की ताजपोशी से पहले एक नई लोकतांत्रिक शर्त जुड़ गई है। वह है कि ताजपोशी से पहले राजकुमार को लोकमत भी प्राप्त करना होगा। लगता है जम्बू द्वीप के भारतवर्ष खंड के नेहरु-गान्धी राजवंश के साथ भी यही हो रहा है।

इस राजवंश की शुरुआत अंग्रेजों के समय मोतीलाल नेहरु ने शुरू की थी। उनके पुरखे कभी कश्मीर के पहाड़ों से निकल कर उत्तर प्रदेश के मैदानों में आ बसे थे। अंग्रेजों ने भारत की न्यायिक व्यवस्था में एक नई संस्था स्थापित की थी। शिकायत कर्ता और न्याय कर्ता के बीच में एक मध्यस्थ की व्यवस्था। इसके अनेक नाम रखे गए थे। पलीडर, बैरिस्टर, एडवोकेट इत्यादि इत्यादि। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक ही शर्त थी कि इस मध्यस्थ को सारी बात शिकायत कर्ता की भाषा में नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार की भाषा अंग्रेजी में ही करनी थी। उस वक्त भी तेज तर्रार लोग समझ गए थे कि जमाना बदल गया है। अब नई व्यवस्था में इन्हीं ‘मध्यस्थों’ पर लक्ष्मी बरसेगी। इसलिए जब उत्तर प्रदेश के लोग ब्रजभाषा में सूरदास के पद और अवधी में तुलसीदास की चौपाइयां गा रहे थे तो कुछ भविष्यदृष्टाओं ने ‘वा वा बलैकशीप’ सीखना शुरू कर दिया। वे भारत के नए शासकों के साथ बेहतर बातचीत कर सकते थे। इन्हीं लोगों ने तुर्क शासनकाल में फारसी पर महारत हासिल कर ली थी। अब नए युग की हवा को भांप कर शेक्सपियर के दीवाने हो रहे थे। इन्हीं में से भारत में नए राजवंश बने। इन्हीं राजवंशों में से एक था नेहरु-गान्धी राजवंश। इस राजवंश ने लोकतांत्रिक पद्धति से बहुत देर तक राजसुख भोगा। कई बार ऐसा भी होता है कि राजा का निधन हो जाता है और राजकुमार की उम्र छोटी होती है तो ‘टाइम गैप एरेंजमैंट’ किया जाता है। इस राजवंश ने भी यह किया।

दस साल डा. मनमोहन सिंह इस एरेंजमैंट के तहत प्रधानमंत्री की कुर्सी राजकुमार की ओर से संभाले रहे। लेकिन जब राजकुमार की ताजपोशी का समय आया तो ‘लोकमत’ ने सहमति देने से इंकार कर दिया। चाहिए तो यह था कि इस टाइमगैप अरेंजमेंट काल में राजकुमार को पढऩे के लिए पंचतंत्र दिया जाता। लेकिन वह वक्त तो राजकुमार ने मनमोहन सिंह द्वारा बनाए अधिनियमों को सार्वजनिक रूप से फाड़ कर अपनी झूठी शक्ति का प्रदर्शन करने में लगा दिया। अब राजवंश में हडक़म्प मचा हुआ है। राजकुमार की उम्र बढ़ती जा रही है। राजमाता की तबीयत ठीक नहीं रहती। समय हाथ से निकला जा रहा है। लगता है अब दरबारियों ने समझाया है कि घर बैठने या विदेश में जाते रहने से कुछ नहीं बनेगा। सदा सडक़ों पर घूमा करो। आम लोग जैसा बनने की कोशिश करो। अब राहुल गान्धी सडक़ों पर घूम रहे हैं। कभी लेट जाते हैं, कभी खड़े हो जाते हैं। जो मन में आता है, बोलते रहते हैं। लगता है शायद किसी नजूमी ने बता दिया है कि राजनीति में जेल जाना भी शगुन माना जाता है। पता चला है कि अब एक दिन जेल भी हो आए हैं। बड़े लोगों के लिए पुलिस यदि उठा कर बस में बिठा लेती है तो वह जेल ही मानी जाती है। मात्र शगुन की ही तो बात है। लेकिन अब कहा तो जा सकता है कि भाई, अब तो मैं जेल भी हो आया हूं। अब जेल जाने से तो राजसत्ता मिलती है। मुझे क्यों नहीं दे रहे? अब इस सवाल का जवाब राहुल गान्धी को कौन दे? जनता या तो हंस रही है या तरस खा रही है। दरबारियों की अपनी चिन्ता है, यदि राजा न बना तो हमारा क्या होगा?-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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