कांग्रेस ‘मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट’ पर क्यों जोर दे रही है?

भारत निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) ने गत सप्ताह ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ (स्पैशल समरी रिवीजन या एस.एस.आर.) के तहत मतदाता सूचियों के एक और पुनरीक्षण के लिए एक निर्देश जारी किया। इस प्रक्रिया में नए पात्र मतदाताओं को जोडऩा और उन लोगों के नाम हटाना शामिल है, जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो स्थानांतरित हो चुके हैं। यह प्रक्रिया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एस.आई.आर.) प्रक्रिया से इस मायने में भिन्न है कि इसमें मौजूदा मतदाताओं के नाम स्वत: ही नई सूचियों में शामिल हो जाते हैं।
कांग्रेस पार्टी ने राजनीतिक दलों को प्रारूप (ड्राफ्ट) और अंतिम सूचियों की प्रतियां पठनीय (रीडेबल) पी.डी.एफ. प्रारूप में उपलब्ध कराने से जुड़े निर्देश के एक हिस्से को रेखांकित किया। पार्टी ने कहा, ‘‘राहुल गांधी जी लगातार ‘मशीन-रीडेबल’ डिजिटल वोटर लिस्ट की मांग कर रहे थे, ताकि वोटर लिस्ट में होने वाली छेड़छाड़ को पकड़ा जा सके।’’ पार्टी ने आगे जोड़ा कि अब चुनाव आयोग को ‘हार माननी पड़ी है।’
‘मशीन-रीडेबल’ का क्या अर्थ है : लिखित पाठ (टैक्स्ट) को डिजिटल प्रारूप में बदलने के लिए पहले मैनुअल डाटा एंट्री करनी पड़ती थी। इस श्रमसाध्य प्रक्रिया की जगह बाद में ‘ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन’ (ओ.सी.आर.) नामक तकनीक ने ले ली। यह तकनीक मशीनों को भारी मात्रा में डाटा पर प्रशिक्षित करके अक्षरों की पहचान करने में सक्षम बनाती है। यहां वोटर लिस्ट को मशीन-रीडेबल बनाने से मतदाताओं के नाम और विवरण खोजना आसान हो जाता है। वर्तमान में, ये सूचियां ‘इमेज पी.डी.एफ.’ के रूप में उपलब्ध हैं, जहां मतदाता सूचियों की फोटो स्कैन करके अपलोड की जाती हैं। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि चुनाव आयोग का यह नया निर्देश किसी बदलाव का संकेत देता है या नहीं।
चुनाव आयोग के निर्देश में कहा गया कि ‘‘ई.आर.ओ. (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) प्रारूप और अंतिम प्रकाशन के तुरंत बाद, प्रत्येक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को मतदाता सूची के प्रत्येक अलग मतदान केंद्र की 2 प्रतियां (एक हार्ड कॉपी और एक रीडेबल पी.डी.एफ. प्रारूप में सॉफ्ट कॉपी) नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा।’’ इसमें आगे कहा गया कि यह निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत है। ये नियम अनिवार्य करते हैं कि ई.आर.ओ. मतदाता सूची के प्रत्येक भाग की प्रतियां ‘प्रत्येक ऐसे राजनीतिक दल को उपलब्ध कराएगा, जिसके लिए चुनाव आयोग द्वारा राज्य में विशेष रूप से एक चुनाव चिन्ह आरक्षित किया गया हो।’
कांग्रेस का तर्क : पार्टी हाल के दिनों में लगातार मतदाता सूचियों को मशीन-रीडेबल बनाने की मांग करती रही है। वर्ष 2025 में, राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि बेंगलुरु सैंट्रल लोकसभा क्षेत्र के एक हिस्से में मतदाता सूची में फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े गए थे। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने अंग्रेजी के एक समाचार पत्र में लिखा था, ‘‘पूरे देश की मतदाता सूचियों का ऑडिट करने का एकमात्र तरीका इस प्रक्रिया को स्वचालित (ऑटोमेट) करना है…। हमें सभी निर्वाचन क्षेत्रों की डिजिटल ‘मशीन-रीडेबल’ मतदाता सूचियों की आवश्यकता होगी।’’
वर्ष 2018 में, कांग्रेस नेता कमलनाथ और सचिन पायलट चुनावों से संबंधित इन और अन्य प्रक्रियात्मक मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। पीठ ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि जिस प्रारूप में प्रारूप मतदाता सूची उपलब्ध कराई जाती है, वह चुनाव नियमावली (इलैक्शन मैनुअल), 2016 की आवश्यकता को पूरा करती है।
नियमावली कहती है कि प्रारूप सूची मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वैबसाइट पर ‘टैक्स्ट मोड में डाली जाएगी और मतदाता के विवरण के आगे कोई तस्वीर नहीं दिखाई देगी।’ चुनाव आयोग ने कहा कि उसने ‘मतदाताओं की गोपनीयता के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए, जानबूझकर स्कैनेबल टैक्स्ट मोड में मतदाता सूचियों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराईं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला, ‘‘नियम में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि प्रारूप मतदाता सूची को मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वैबसाइट पर ‘सर्च करने योग्य पी.डी.एफ’ में डाला जाना अनिवार्य है।’’ वर्ष 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फिर से विचार किया, जब याचिकाकत्र्ताओं ने एस.आई.आर. प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी। याचिकाकत्र्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग 2003 की मतदाता सूची को मशीन-रीडेबल प्रारूप में देने से इंकार कर रहा था (पिछली बार एस.आई.आर. प्रक्रिया 2002 से 2004 के दौरान आयोजित की गई थी)। अदालत ने एक बार फिर नागरिकों की गोपनीयता और ‘डाटा माइनिंग’ को लेकर चिंता जताई। अपने मई 2026 के फैसले में, अदालत ने एस.आई.आर. प्रक्रिया को बरकरार रखा।-ऋषिका सिंह



