…जिम्मेदारी समझें जकरबर्ग

फेसबुक की ओनर कंपनी मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग एक बार फिर गलतबयानी के मामले में फंस गए हैं। संसद की आईटी एंड कम्युनिकेशन मामलों की स्टैंडिंग कमिटी उन्हें समन करने वाली है। फेसबुक और मेटा पहले भी तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और फेकन्यूज को लेकर ढिलाई जैसे आरोपों में घिरती रही हैं।
क्या है मकसद
यह वाकई हैरत की बात है कि जकरबर्ग ने भारत को भी उन देशों में शामिल कर लिया जहां पिछले साल चुनाव में सरकारों ने सत्ता गंवाई। तथ्य यह है कि बीजेपी की सीटें भले कम हुई हों, लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन NDA ने बहुमत हासिल कर सरकार में वापसी की। परिणामस्वरूप नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार चल रही है। इस तथ्य से जकरबर्ग कैसे अनजान हो सकते हैं? क्या वह जानबूझकर भारत सरकार के बारे में गलत सूचनाएं फैला रहे हैं?
विश्वसनीयता का सवाल
जकरबर्ग ने अभी हाल ही में मेटा की कंटेंट मैनेजमेंट पॉलिसी में बड़े बदलाव की घोषणा की है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लाए जा रहे इन बदलावों के तहत मेटा थर्ड पार्टी फैक्ट चेकिंग का सिस्टम समाप्त करने वाली है। उसकी इस घोषणा को भी अमेरिका में हो रहे सत्ता परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह ट्रंप समर्थकों को खुश करने की कोशिश है जो फ्री स्पीच के नाम पर फैक्ट चेकिंग की इस व्यवस्था का काफी समय से विरोध कर रहे हैं। 2018 में सामने आए कैंब्रिज एनालिटिका विवाद को भी इस संदर्भ में याद किया जा सकता है जिसमें यूजर्स के पर्सनल डेटा की सुरक्षा का सवाल प्रमुखता से उभरा था।
गैर जिम्मेदारी स्वीकार्य नहीं
ऐसे और भी मामले हैं जिनसे यह संदेह मजबूत होता है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल सिर्फ अधिक से अधिक मुनाफा हासिल करने के मकसद से हो रहा है। समाज को होने वाले नुकसान की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस तरह की गैर जिम्मेदारी खतरनाक हो सकती है और इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
व्यापक चिंता
ताजा विवाद को सरकार ने गंभीरता से लिया है, यह अच्छी बात है। लेकिन जरूरी है कि चिंता इसी मामले तक सीमित न रहे। हेट स्पीच और फेक न्यूज के अन्य मामले भी उतने ही गंभीर हैं चाहे वे किसी भी समुदाय और पार्टी के खिलाफ केंद्रित हों। उम्मीद है, सरकार की सख्ती मेटा को ज्यादा जिम्मेदार बनाएगी।



