राजनीति

छुप छुप बैठे हो…

बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
फैज अहमद फैज का यह शेर अगर चिराग पासवान, चंद्रबाबू नायडू, जयंत चौधरी, अनुप्रिया पटेल और सायोनी घोष के कानों में पड़ता होगा तो फिलहाल वे क्या सोचते होंगे? ज्यादातर क्षेत्रीय दलों ने केंद्र सरकार का हिस्सा बनने के लिए अपनी जुबान भाजपा की राजनीतिक शक्ति के खजाने में गिरवी रख दी। अब जब केंद्रीय सत्ता के खिलाफ जनता की राजनीतिक भाषा बदल रही है तो सवाल उठता है कि क्या क्षेत्रीय नेताओं को युवाओं के समर्थन की जरूरत नहीं रही? आखिर कब तक भाजपा की राजनीतिक शक्ति इनकी भी शक्ति बनती रहेगी। दिल्ली से शुरू हुआ विद्यार्थियों का आंदोलन झारखंड में अपने चरम पर है। वहां इस संकट से हेमंत सोरेन को ही संवाद करना है। बांकीपुर में जनता ने कुत्ता-बिल्ली वाले विमर्श को खारिज कर दिया है। केंद्रीय सत्ता के खिलाफ चुप रहने के लिए छुप कर बैठे दलों पर बेबाक बोल

अमेरिकी विश्वविद्यालय में विद्यार्थी अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हुए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने विद्यार्थियों की मांगों पर कहा-यह उतनी ही महत्त्वहीन है जितनी यह राय कि मुझे स्ट्राबेरी पसंद है। प्रशासन के इस ‘स्ट्राबेरी स्टेटमेंट’ ने विद्यार्थियों के विद्रोह को व्यापक कर दिया और सत्ता को दमन का सहारा लेना पड़ा। 1968 में हुए अमेरिका के छात्र आंदोलन से प्रेरित फिल्म ‘द स्ट्राबेरी स्टेटमेंट’ 1970 में बनी थी।

साठ के दशक की जेन-जी को जब सत्ता ने सुनना बंद कर दिया तो विद्यार्थियों के विरोध ने बोलना शुरू कर दिया। फिल्म का नायक साइमन (ब्रूस डेविसन) कालेज के शुरुआती समय में अपने निजी जीवन को ही पूरी दुनिया मानता है। फिर कालेज की एक छात्रा के प्रभाव में आकर उसकी भी समझ बनती है कि प्रशासन विद्यार्थियों की आवाज को दबा रहा है। विद्यार्थियों का संघर्ष इतना तेज हो जाता है कि वे कालेज के भवन पर कब्जा कर लेते हैं।

सत्ता शक्तिशाली होते ही अपने ऐसे चरम पर पहुंचती है, जब वह सुनना बंद कर देती है। ऐसी हर सत्ता के पास अपना ‘स्ट्राबेरी स्टेटमेंट’ होता है। सत्ता ऐसा कोई बयान नहीं भी देती है तो उसके साथ ऐसे नत्थी कर दिए गए बयान को उसी का मान लिया जाता है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में प्रशांत किशोर ने जनता से कहा कि आप लोग यहां भाजपा के प्रत्याशी को हराइए, ताकि मोदी जी तक आवाज पहुंचे कि उन्होंने बिहार का मुख्यमंत्री सही नहीं चुना है। प्रशांत किशोर ने लोगों को समझाया कि भाजपा अब यह समझने लगी है कि वह किसी सीट पर कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा कर देगी तो वह जीत जाएगा।

जिस तरह से राजग की सरकार एक केंद्रीय चेहरे के इर्द-गिर्द घूम रही है तो इसे आराम से भाजपा का बयान मान लिया गया। लोगों ने ठान लिया कि उसे सत्ता को इस कुत्ता-बिल्ली को भी जिता देने वाले अहंकार से बाहर निकालना है। जनता ने खुद को सत्ता-पक्ष की कठपुतली वाले भाव से निकालते हुए कथित कुत्ता-बिल्ली को हरा दिया। आज भाजपा के अध्यक्ष जितना भी हंसते हुए तस्वीरें खिंचवा लें, मंथन करें, लेकिन सच यही है कि जनता ने दिल्ली तक संदेश पहुंचा दिया कि बिहार में आपने अच्छा नहीं किया।

दिल्ली के जंतर मंतर से शुरू हुआ जेन-जी आंदोलन नीट परीक्षा तक सिमटा नहीं रहा। जब भी संस्थाएं युवाओं की बात सुनना बंद कर देती हैं तो विरोध केवल एक मांग तक नहीं रह जाता है। वह वृहत्तर रूप में लोकतांत्रिक भागीदारी और सम्मान की मांग बन जाता है। लोकतंत्र को सिर्फ इस पैमाने पर नहीं परखा जाता है कि लोग सरकार के साथ हैं या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाता है कि असहमति रखने वालों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। जेन-जी आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित किया है कि कोई आंदोलन भले ही एक सवाल से शुरू होता है, लेकिन उस सवाल का जवाब देने में देरी कर दी गई तो वही व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाता है।

आज जब जेन-जी पीढ़ी भाजपा को चुनौती दे चुकी है तो सवाल है कि उसके सहयोगी दल क्यों चुप हैं? उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता क्यों नहीं हो रही है? चिराग पासवान तो खुद को युवाओं का युवा नेता कहते थे, क्या अब उन्हें जेन-जी की जरूरत नहीं है? जद (एकी) के सभी शुरुआती नेता जेपी के समय के छात्र-आंदोलन की उपज रहे हैं।

विद्यार्थी से नेता बने नीतीश कुमार को क्या अपने पुत्र के सिवा किसी और युवा की जरूरत नहीं है? राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने सभी नैतिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर अपने बेटे को मंत्री तो बना दिया, लेकिन क्या उन्हें बिहार की राजनीति में युवाओं की अहमियत का पता नहीं? आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू क्या सोच रहे हैं?

जब जनता भाजपा के खिलाफ बगावत कर सकती है तो सहयोगी दलों को चुप रहने के लिए क्यों माफ करेगी? तृणमूल कांग्रेस के जो सदस्य विधानसभा चुनाव के बाद गुमनाम एनसीपीआइ का हिस्सा बन कर राजग सरकार का हिस्सा हो गए अगले चुनाव में युवाओं के सामने किस मुंह से खड़े होंगे? तृणमूल के नेता तो लोकसभा चुनाव या राज्यसभा के जरिए संसद में आए थे। फिर विधानसभा चुनाव हारने के बाद उनमें क्यों भगदड़ मच गई? आपने अपने मतदाताओं को क्यों धोखा दिया?

सवाल है कि जब भाजपा की अपनी हालत खराब होने लगेगी तो सहयोगियों के लिए कितना सोचेगी? युवा किसानों के सवालों का जयंत चौधरी क्या जवाब देंगे? अनुप्रिया पटेल या ओम प्रकाश राजभर युवा मतदाताओं के पास किस मुंह से वोट मांगने जाएंगे? राघव चड्ढा जो एक समय जेन-जी वाले रुतबे के साथ थे, अभी अनुभवी वृद्ध की तरह सोच कर खुश हैं कि एक चुप सौ सुख। लेकिन चुप्पी से आप कितने दिनों का सुख हासिल कर लेंगे? नीतीश कुमार पुत्र, उपेंद्र कुशवाहा पुत्र, नायडू पुत्र, सभी के पुत्र इसलिए चुप हैं क्योंकि उनके पिताओं ने अपनी संतानों के राजनीतिक भविष्य के लिए देश भर के युवाओं के लिए चुप्पी साध ली है।

भाजपा के साथ सहयोगी बने क्षेत्रीय क्षत्रप तो मानो यूं एलान कर रहे हैं कि न तो उन्हें जेन-जी की जरूरत है और न जनता के अन्य वर्ग की। उन्हें इस बात की खुशफहमी है कि भाजपा अब चुनाव हारेगी ही नहीं और वे उसके सहयोगी बन कर सत्ता का सुख लेते रहेंगे। उनकी इसी राजनीतिक सुविधाभोगी वाली सोच कल उन्हें जनता के सामने कुत्ता-बिल्ली सरीखा ही बना देगी।

अपनी राजनीतिक पूंजी को भाजपा की सत्ता के खजाने में जमा कर वे सत्ता के संदर्भ मेंअमीर होने की खुशफहमी पाल बैठे हैं। लेकिन कल जब चुनावी मैदान में वे भाजपा की राजनीतिक शक्ति की तिजोरी से अपना हिस्सा मांगने जाएंगे तो उनका अस्तित्व मिट चुका होगा। तब उन्हें भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की याद आएगी कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा था कि आनेवाले समय में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

विद्यार्थियों का आंदोलन झारखंड पहुंच चुका है और सत्ता पक्ष वाले काकरोच जनता पार्टी को ताना मान रहे हैं कि वे झारखंड क्यों नहीं जाते? यू-ट्यूबर्स से पूछ रहे हैं कि झारखंड क्यों नहीं जाते? झारखंड में कतर से खाना क्यों नहीं आ रहा है? झारखंड के विद्यार्थियों को पता है कि यह उनकी अपनी लड़ाई है और अपने तरीके से लड़ेंगे। क्षेत्रीय क्षत्रपों को लग रहा है कि यह भाजपा की लड़ाई है, और वो तो जीत ही जाएगी।

जंतर मंतर के बाद झारखंड तो झांकी है। विद्यार्थी आंदोलन का मूल्य केवल उसके तात्कालिक परिणामों में नहीं, बल्कि उस नैतिक प्रश्न में होता है जो वे समाज के सामने रखते हैं। जरूरी नहीं है कि हर आंदोलन सत्ता का परिवर्तन कर दे। इतना जरूर है कि हर बड़ा आंदोलन राजनीति की भाषा बदल देता है।

भरत तिवारी के मुठभेड़ का मामला हो या बिहार के थाना परिसरों से आने वाली भ्रष्टाचार की खबरें, चिराग पासवान जैसे नेता चुप ही हैं।
बांकीपुर की एक सीट ने इतना तो बता दिया दिया है बिहार के युवाओं की राजनीतिक भाषा बदल गई है। क्षेत्रीय क्षत्रपों को भाजपा के सामने अपनी गिरवी रखी भाषा का मूल-ब्याज देखना शुरू कर देना चाहिए। भाषा का बदलाव कभी-कभी सत्ता भी बदल देता है।-मुकेश भारद्वाज

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