क्या ट्रंप टैरिफ वापस लेंगे?

‘एप्पल’ ने भारत से 67,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। ‘अमेजन’ ने 40,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। ‘गूगल’ ने 22-23,000 करोड़ रुपए बनाए हैं और ‘मेटा’ ने भी लगभग इतनी ही कमाई की है। ये सभी अमरीकी कंपनियां हैं और भारत उनका सबसे बड़ा बाजार है। भारत में इनके प्लांट भी सक्रिय होंगे अथवा स्थापित होने की प्रक्रिया में होंगे! ऐसी कई और अमरीकी कंपनियां होंगी, जो भारत में व्यापार कर रही हैं और मोटा मुनाफा कूट रही हैं। इन कंपनियों के सबसे अधिक ग्राहक और उपयोगकर्ता भी भारत में हैं। यह मुनाफा अमरीका में ही जा रहा है। राष्ट्रपति टं्रप अब भारत के बारे में क्या सोच रहे हैं? चूंकि अमरीकी कंपनियां भारत में उत्पादन कर रही हैं और माल अमरीकी बाजार में जा रहा है, क्या राष्ट्रपति टं्रप इन उत्पादों पर भी 50 फीसदी टैरिफ थोपेंगे? बल्कि टं्रप हररोज टैरिफ पर सफाई दे रहे हैं। भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों का मानना है कि राष्ट्रपति टं्रप 100 दिनों के अंतराल में टैरिफ पर पुनर्विचार कर अपने फैसले को वापस ले सकते हैं, लिहाजा उन्होंने सर्वोच्च अदालत से आग्रह किया है कि वह टैरिफ मामले पर यथाशीघ्र सुनवाई कर उसे ‘वैध’ करार दे। अदालत नवंबर माह में सुनवाई शुरू करेगी, यह पहले से ही तय है। राष्ट्रपति टं्रप इसलिए भी चिंतित हैं, क्योंकि दुनिया दो ध्रुवों के बीच बंटती जा रही है और अमरीका को ‘शीत युद्ध’ एक बार फिर शुरू होने की आशंका है। अमरीका की ताकत भी बंटती जा रही है। अब देश अमरीका की ‘दादागीरी’ मानते रहने को तैयार नहीं हैं। राष्ट्रपति टं्रप और अमरीकी मंत्री अब भी भारत को अपना ‘परम मित्र’ मानते हैं। अमरीकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि देश के राष्ट्रपतियों ने दशकों की मेहनत, कूटनीति, दूरदर्शिता और देशों की लामबंदी के जरिए जो ताकत अर्जित की थी और अमरीका को सबसे बड़ी 25 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था तक पहुंचाया था, राष्ट्रपति टं्रप उस पर पानी फेर रहे हैं। भारत को 50 फीसदी टैरिफ से अमरीका ने दबाव में लाने की रणनीति बनाई, लेकिन भारत दूसरे धु्रव पर रूस और चीन के साथ मिल गया।
उसके समर्थन में 50 अन्य देश, ब्रिक्स और एससीओ के देश आ खड़े हुए। भारत के वाणिज्य-उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक साक्षात्कार में खुलासा किया है कि भारत का ऑस्टे्रलिया और ओमान के साथ व्यापार का करार शीघ्र ही होने जा रहा है। भारत की 50 अन्य देशों के साथ भी निर्यात की संभावनाओं पर बातचीत जारी है। अमरीका के साथ भी नवंबर तक व्यापार-समझौता होना लगभग तय है। भारत आगामी दो सालों के भीतर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन सकता है। सवाल यह है कि टं्रप को भारत से दिक्कत है अथवा रूस और चीन से? भारत ने पलट कर अमरीका पर कोई टैरिफ नहीं थोपा है। अमरीकी कंपनियां भारत की सार्वजनिक और निजी कंपनियों से अरबों डॉलर के करार कर रही हैं। अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे अधिकारी ने अमरीका में मंदी की संभावनाओं को लेकर राष्ट्रपति को सचेत किया है। ऐसे भी विश्लेषण सामने आए हैं कि एक-तिहाई उद्योग पहले से ही आर्थिक संकट झेल रहे हैं। ऐसे में भारत के साथ कारोबार कम क्यों किया जा रहा है? टैरिफ का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि रूस के साथ भारत, चीन के अलावा अमरीका और यूरोपीय देश भी तेल और गैस का धंधा कर रहे हैं। राष्ट्रपति टं्रप को आरोप लगाने की अपनी आदत को सुधारना चाहिए। उन्होंने अब चीन पर आरोप चस्पां किया है कि वह अमरीका के खिलाफ साजिश रच रहा है। दरअसल बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमरीका अकेला पड़ता जा रहा है। अच्छे संबंधों को सिर्फ टैरिफ तक सीमित कर देखना टं्रप और अमरीका के लिए नुकसानदायक होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब शीत युद्ध शुरू हुआ था, तब भी भारत दोनों ध्रुवों से अलग, अपनी गुटनिरपेक्षता के लिए, मजबूती से खड़ा था। बहरहाल जो भी निर्णय लेना है, राष्ट्रपति टं्रप और अमरीका को लेना है।



