राष्ट्रीय

क्यों कम हो रहे सरकारी स्कूलों में छात्र

सरकारी स्कूलों में हर वर्ष बच्चों की संख्या कम हो रही है। इससे जाहिर है कि शिक्षा की नीतियों में खामियां हैं जिन्हें समय रहते दूर किया जाना आवश्यक है। जब हम मकान बनाते हैं तो उसकी नींव पर खास ध्यान देते हैं कि नींव काफी मजबूत हो, ताकि उसके ऊपर बहुमंजिल खड़ी की जा सके। कमजोर नींव के ऊपर बहुमंजिल का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसी तरह बच्चों की शिक्षा भी मजबूत आधार पर निर्भर है। यदि बच्चों की शिक्षा का आधार मजबूत होगा, तो इसका लाभ इन्हें आगे उच्च शिक्षा ग्रहण करने में मिलेगा। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में आम नागरिक कितना पीछे था, इसके लिए गुलामी के दिनों का इतिहास गवाह है। अंग्रेज उच्च विद्यालय तो दूर, प्राथमिक विद्यालय तक नहीं खोलना चाहते थे, ताकि हिंदोस्तानी ज्यादा पढ़े-लिखे न हो जाएं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा के क्षेत्र में जो हमारा देश आगे बढ़ा, यह किसी से छिपा नहीं है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में कुछ समय उपरांत जो कमियां उभरी, वे भी कम नहीं थीं।

आज सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं और हर प्रांत एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहा है। यह अच्छी बात है लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में जो भारी त्रुटियां हैं यह अच्छा संकेत नहीं है। जब नन्हा बच्चा पहली बार विद्यालय में प्रवेश करता है, तो इस सोच के साथ प्रवेश करता है कि मैं आज अपने माता-पिता के घर से व उनकी गोद से अलग होकर ऐसे घर में प्रवेश कर रहा हूं, जहां से मेरे जीवन के सुनहरे कल का उदय होगा व इस घर से शिक्षित होकर जीवन की मजबूत मंजिल की ओर बढूंगा और अपने जीवन के उदेश्यों की पूर्ति के अतिरिक्त समाज व देश की सेवा में भागीदार बनूंगा, अर्थात यही उस बच्चे का सपना भी है और अधिकार भी जो उसे एक समान मिलना चाहिए। हर बच्चे को एक समान शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह सरकारी स्कूल में पढ़ रहा है या निजी स्कूल में। लेकिन एक समान शिक्षा का अधिकार एक सपना बन कर रह गया है। ऊपर वाले ने तो सबको एक समान बनाकर पैदा किया, लेकिन पैदा होते ही हमारा विभाजन हो गया। अर्थात एक अमीर, दूसरा गरीब। अमीर तो अच्छी और उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम है, लेकिन गरीब बेचारा बेबस है। आज गरीब के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, तो अमीर के बच्चे दूसरे तामझाम वाले प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। गरीब का बच्चा भी पहली कक्षा से ही अंग्रेजी व अंग्रेजी भाषा में विज्ञान और गणित विषय सीखना चाहता है। यदि प्राईवेट स्कूलों के अध्यापक कम वेतन मिलने के बावजूद अंग्रेजी भाषा में उक्त विषय पढ़ा सकते हैं, तो अच्छा वेतन लेने वाले व प्रशिक्षित राजकीय प्राथमिक पाठशालाओं के अध्यापक पहली कक्षा से बच्चों को अंग्रेजी व अंग्रेजी भाषा में विज्ञान और गणित विषय क्यों नहीं पढ़ा सकते? शिक्षा का आधार तो प्राइमरी स्कूलों में ही बनता है। यदि गरीब के बच्चे से वास्तव में ही सरकार को सच्ची हमदर्दी है, तो उसे भी वही शिक्षा प्रदान की जाए, जो शिक्षा एक अमीर, राजनेता व उच्चाधिकारी का बच्चा ग्रहण कर रहा है। आज गरीब के बच्चे भी शिक्षित होकर उच्च पदों पर विराजमान हैं। कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाला श्री नरेंद्र मोंदी आज विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत का प्रधानमंत्री है।

तो एक गरीब परिवार में पैदा हुआ, हर कठिनाइयों का सामना करता हुआ आज श्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री है। आज किसी भी अधिकारी, मंत्री व राजनेता के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते। एक तरफ पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं सरकार ने बंद कर दी और दूसरा आठवीं कक्षा तक कोई बच्चा फेल नहीं करना, अर्थात सभी बच्चे पास करने की प्रथा बनाई दी गई है। रही-सही कसर सतत समग्र मूल्यांकन प्रणाली ने पूरी कर दी। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के पास पढ़ाने के लिए सरकार ने समय ही कहां छोड़ा है। उसे राशन डिपुओं से खिचड़ी के लिए राशन भी लाना है, रोज खिचड़ी भी बनवानी है, बच्चों की वर्दी व किताबों का हिसाब भी रखना है व सतत समग्र मूल्यांकन प्रणाली के अधीन तमाम रजिस्टर भी रोज भरने हैं। इसके अतिरिक्त ढेर सारे और अन्य काम भी अध्यापकों को करने हैं, जैसे कि पंचायत चुनाव, विधानसभा व लोकसभा चुनाव, जनगणना व वोटर लिस्ट तैयार करना आदि अनेक कार्य। आठवीं कक्षा तक कोई बच्चा फेल नहीं करना व सतत समग्र मूल्यांकन प्रणाली का असर सरकारी स्कूलों में दसवीं व जमा दो के वार्षिक परीक्षा परिणामों में देखने को मिल रहा है। कई सरकारी स्कूलों में अध्यापक ही पूरे नहीं, ऐसे में परीक्षा परिणाम तो प्रभावित होंगे ही। तो दूसरी तरफ कई स्कूलों के भवन ही पूरे नहीं। उदाहरण के तौर पर 100 साल से भी पुराना राजकीय प्राथमिक केन्द्र पाठशाला भट्टू समूला (तहसील पालमपुर) लंबे समय से केवल दो कमरों में चल रहा है जहां पर इस समय पांच कमरों की अति आवश्यकता है। आज ऐसे कई स्कूल हिमाचल प्रदेश में होंगे। ऐसे दो कमरों वाले स्कूलों में बच्चे कैसे पढ़ते होंगे, अध्यापक कहां पर बैठते होंगे व खिचड़ी कहां बनती होगी? यदि सरकार सरकारी स्कूलों के बच्चों के प्रति चिंतित है तो उसे निजी स्कूलों की भांति नर्सरी, केजी कक्षाएं शुरू करनी होंगी व नर्सरी कक्षा से ही अंग्रेजी व अंग्रेजी भाषा में विज्ञान और गणित विषय पढ़ाने होंगे। सतत समग्र मूल्यांकन प्रणाली बंद होनी चाहिए। आठवीं कक्षा तक सभी बच्चे पास करने की नीति बंद होनी चाहिए व पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं पुन: शुरू की जानी चाहिए।

अध्यापक के पास पढ़ाई के अलावा कोई अन्य काम न सौंपा जाए। प्राइमरी व मिडल स्कूलों में क्लर्क आदि की नियुक्ति की जाए। यदि माध्यमिक पाठशाला तक की शिक्षा प्रणाली सही होगी तो दसवीं व जमा दो के परीक्षा परिणाम भी अच्छे होंगे। स्कूलों में अध्यापकों की कमी को समय पर पूरा किया जाना भी आवश्यक है। वर्ष के दिसंबर, जनवरी और फरवरी महीनों में स्कूलों में सभी प्रकार के समारोह पूर्ण रूप से बंद होने चाहिएं। सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार कम हो रही है, इसका कारण सरकार भी जानती है और अधिकारी भी, लेकिन जानते हुए भी सब आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं।-प्रकाश चौधरी

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