राजनीति

उत्तर के विरोध में क्यों उतरे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन?

उत्तर का विरोध द्रविड़ राजनीति का मूलाधार है। रामकथा को भी आर्यों की द्रविड़ों के ऊपर जीत के रूप में देखा गया। इसलिए जस्टिस पार्टी के संस्थापक इ वी रामास्वामी नायकर उर्फ पेरियार ने भगवान राम के पोस्टर जलवाए।‌ सी एन अन्नादुरै ने राज्यसभा में भाषण दिया कि अगर रावण दहन की प्रथा बंद नहीं की गई तो तमिलनाडु भारत से अलग हो जाएगा।

विरोध का तर्क

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने लोकसभा सीटों के परिसीमन का विरोध किया है। उनका तर्क है कि दक्षिण के राज्यों ने परिवार नियोजन की नीति को प्रभावी तरीके से लागू किया जिससे उनकी आबादी नियंत्रण में रही, जबकि उत्तर भारत में ऐसा नहीं हुआ और उनकी आबादी बेतहाशा बढ़ गई।

उलटा रुख

दिलचस्प है कि स्टालिन जाति जनगणना का समर्थन करते हैं ताकि संख्या के आधार पर सबको उनका हक मिल सके। देखा जाए तो जातियों के साथ भी वही बात है। जो शिक्षित थे, उन्होंने अपने परिवार को छोटा रखा और बच्चों को अच्छी शिक्षा दी। जो अशिक्षित थे, उनके परिवार बड़े थे। इनमें पिछड़े व दलित अधिक थे। इनसे वोट तो सबों ने मांगे किंतु उन्हें शिक्षित नहीं किया गया। अब जिन्होंने परिवार नियोजन की नीति को अपनाया और परिवार छोटे रखे, उन्हें संख्या में कम होने का नुकसान उठाना पड़ रहा है। जातीय जनगणना का समर्थन और परिसीमन का विरोध अंतर्विरोधी है।

कांग्रेस भी साथ

कांग्रेस ने कहा है कि परिसीमन का नुकसान दक्षिण के राज्यों को होगा।‌ विडंबना यह है कि कांग्रेस भी जातीय जनगणना की मांग कर रही है। स्टालिन दक्षिण के राज्यों को भड़का रहे हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण का प्रभाव कम हो जाएगा क्योंकि लोकसभा में उनकी संख्या कम हो जाएगी।

संशोधन के जरिए स्थगन

संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, हर जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का निर्धारण संख्या के आधार पर होना था। 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा नए परिसीमन पर 25 साल के लिए (2001 तक) रोक लगा दी गई। साल 2000 में फिर हंगामा हुआ तो 84वें संविधान संशोधन के जरिए अगले 25 सालों तक यह रोक बढ़ा दी गई। अब फिर वही हंगामा हो रहा है।

त्रिभाषा फॉर्म्युला

नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्म्युला है – मातृभाषा, एक अन्य भारतीय भाषा और अंग्रेजी। इसमें हिंदी का कोई जिक्र नहीं है। लेकिन स्टालिन का कहना है कि तीसरी भाषा के बहाने हिंदी थोपने की साजिश रची गई है। उनका यह भी इल्जाम है कि इस बहाने केंद्र ने सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत उसे 2,152 करोड़ रुपये की देय राशि रोक रखी है। दिक्कत असल में यह है कि केंद्रीय अनुदान प्राप्त करने के लिए राज्य की विधानसभा को नई शिक्षा नीति लागू करने के लिए विधान बनाना होगा, जिसमें त्रिभाषा फॉर्म्युला लागू करने की शर्त होगी।

1948-49 में हुई अनुशंसा

त्रिभाषा फार्म्युले के इतिहास पर नजर डालने से तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। 1948-49 में इसकी अनुशंसा राधाकृष्णन आयोग ने की। इसे केंद्र सरकार ने शिक्षा नीति में अपनाया। 1968 में कोठारी आयोग ने यही अनुशंसा की। आयोग ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय एवं राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार-विमर्श कर सबकी सहमति से रिपोर्ट तैयार की थी। इसमें हिंदी, एक आधुनिक भारतीय भाषा और अंग्रेजी को शामिल किया गया था। नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (2005) में कहा गया कि बच्चे तीन से अधिक भाषाएं भी सीख सकते हैं। नई शिक्षा नीति में भी बहुभाषावाद को बढ़ावा देने पर जोर है।

तमिलनाडु को रहा एतराज

तमिलनाडु ने त्रिभाषा फॉर्म्युले को कभी स्वीकार नहीं किया। उसका तर्क है कि दो भाषा नीति तो ठीक से लागू हुई ही नहीं है, तीन भाषाएं बच्चे कहां से सीख लेंगे। साथ ही, हिंदी विरोधियों का यह भी कहना है कि तमिल सबसे पुरानी जीवित भाषा है। अन्य पुरानी भाषाएं खत्म भले न हुई हों, आमजन की भाषा नहीं रहीं।

गैर-हिंदी राज्यों में समर्थन

हिंदी को राजभाषा बनाने के पक्ष में अधिकांश गैर-हिंदी राज्यों में शुरू से समर्थन था। 19वीं सदी में ही बंगाल में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, द्विजेंद्र लाल राय, माइकल मधुसूदन दत्त जैसे साहित्यकारों ने हिंदी के समर्थन में आवाज उठाई। कलकत्ते में दयानंद सरस्वती की भेंट केशब चंद्र सेन से हुई तो उन्होंने दयानंद को सलाह दी कि वह ‘सत्यार्थ प्रकाश’ संस्कृत में नहीं, बल्कि हिंदी में लिखें।

संतों ने नहीं किया भेद

दक्षिण भारत के अनेक संतों-साहित्यकारों ने हिंदी में लिखा। शंकर, रामानुज, माध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, निंबार्क, आदि सभी दक्षिण से थे और उनके उपदेश की गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ी। संत भक्तों ने कभी उत्तर और दक्षिण का भेद नहीं किया- भक्ति द्राविड़ उपजी, लाए रामानंद। लेकिन आज राजनीति जाति, संप्रदाय, भाषा आदि के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही है। स्टालिन के विरोध में तमिल व तमिलनाडु की चिंता कम, अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की फ़िक्र अधिक है।

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