संपादकीय

महिला अपराधों और अत्याचारों पर जवाबदेही किसकी

वे गुंडे-बदमाश, हिंसक और विध्वंसक थे। उनके हाथों में लाठियां, डंडे थे और वे काफी उग्र लग रहे थे। स्वतंत्रता की पूर्व रात्रि में भारतीय ही भारतीय पर हमलावर होगा, ऐसी आजादी की हमने कल्पना तक नहीं की थी। क्या हमें ऐसी ही आजादी चाहिए? भीड़ ने पहला हमला प्रदर्शनकारी डॉक्टरों पर किया। उन्हें तितर-बितर किया। मारा-पीटा, तोड़-फोड़ की और प्रदर्शन का मंच ही ध्वस्त कर दिया। उसके बाद भीड़ उस सरकारी अस्पताल के अंदर घुस गई, जहां कुछ दिनों पहले ही 31 वर्षीय टे्रनी डॉक्टर के साथ बर्बर बलात्कार किया गया और बाद में दरिंदगी से उसकी हत्या भी कर दी गई थी। अस्पताल के भीतर भी खूब तोड़-फोड़ की। आपातकालीन कक्ष और बिस्तरों को भी नहीं छोड़ा। गंभीर चिकित्सा विभाग को भी अस्त-व्यस्त कर दिया।

देश ने स्वतंत्रता की 78वीं सालगिरह मनाई है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने ऐतिहासिक लालकिले पर 11वीं बार ‘तिरंगा’ फहराया और राष्ट्र को संबोधित किया। वह ऐसे प्रथम गैर-कांग्रेसी एवं भाजपाई प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें देश ने इतना सम्मान दिया है। आज 98 मिनट के प्रधानमंत्री संबोधन का विश्लेषण करने का दिन था। प्रधानमंत्री ने पहली बार देश में ‘धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता’ पर चर्चा की बात कही है। उस विकृति की ओर भी संकेत किया, जो सर्वनाश का कारण बन सकती है। यह पराकाष्ठा की स्थिति है कि आखिर ऐसी विकृतियां किसकी गोद में पल रही हैं? प्रधानमंत्री के भाषण का फोकस ‘विकसित भारत 2047’ पर अधिक रहा। उन्होंने महिला अपराधों और अत्याचारों पर भी अपनी पीड़ा व्यक्त की और फांसी की सजा तक का सुझाव दिया। बेशक देश की स्वतंत्रता का मौका था, लिहाजा औसत नागरिक जश्न, उल्लास और आनंद के मूड में था, लेकिन संभ्रांत लोगों के शहर कोलकाता में, आधी रात के आसपास, अचानक एक भीड़ उमड़ आई। सैकड़ों होंगे अथवा हजारों होंगे, यह गणना बेमानी है।

वे गुंडे-बदमाश, हिंसक और विध्वंसक थे। उनके हाथों में लाठियां, डंडे थे और वे काफी उग्र लग रहे थे। स्वतंत्रता की पूर्व रात्रि में भारतीय ही भारतीय पर हमलावर होगा, ऐसी आजादी की हमने कल्पना तक नहीं की थी। क्या हमें ऐसी ही आजादी चाहिए? भीड़ ने पहला हमला प्रदर्शनकारी डॉक्टरों पर किया। उन्हें तितर-बितर किया। मारा-पीटा, तोड़-फोड़ की और प्रदर्शन का मंच ही ध्वस्त कर दिया। उसके बाद भीड़ उस सरकारी अस्पताल के अंदर घुस गई, जहां कुछ दिनों पहले ही 31 वर्षीय टे्रनी डॉक्टर के साथ बर्बर बलात्कार किया गया और बाद में दरिंदगी से उसकी हत्या भी कर दी गई थी। अस्पताल के भीतर भी खूब तोड़-फोड़ की। आपातकालीन कक्ष और बिस्तरों को भी नहीं छोड़ा। गंभीर चिकित्सा विभाग को भी अस्त-व्यस्त कर दिया। संभव है कि उस जघन्य, वहशियाना अपराध के कुछ सबूत भी मिटा दिए गए हों! आखिर वह भीड़ कहां से आई? कौन थे वे गुंडे और उनकी मंशा क्या थी? भीड़ की अराजकता से, अंतत:, किसे लाभ हो सकता है? बंगाल पुलिस कहां थी? यदि ठुल्ले तैनात थे, तो वे तमाशबीन ही क्यों बने रहे? पुलिस और भीड़ में कोई सांठगांठ थी क्या? क्या सीबीआई जांच भी प्रभावित होगी? बहरहाल इन सवालों के जवाबों की प्रतीक्षा प्रधानमंत्री मोदी को नहीं करनी चाहिए। उन्हें राज्यपाल सीवी आनंद बोस की ताजा रपट मंगवानी चाहिए और केंद्रीय कैबिनेट को अनुच्छेद 356 के तहत पश्चिम बंगाल में ‘राष्ट्रपति शासन’ चस्पा कर देना चाहिए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चिल्लाने और संघीय ढांचे की दुहाई देने दो।

दरअसल यह भीड़ और यह मार-काट बंगाल की नई परंपरा, नया रूटीन बन गई है। कभी संदेशखाली में, तो कभी 24 परगना अथवा किसी अन्य क्षेत्र में भीड़ हिंसा पर उतारू उमड़ती है। हत्याएं तक करना आम बात है। ममता बनर्जी 2011 से मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री हैं, लिहाजा कानून-व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी उन्हीं की है। क्या देश की स्वतंत्रता के दिन भी ऐसी उन्मादी, उग्र भीड़ तोड़-फोड़, मार-काट करने को स्वतंत्र है? देश की महिलाएं, देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री से, पूछ रही हैं कि आखिर ममता किसकी ‘दीदी’ हैं? बेशक ममता अब धरने पर बैठ राजनीति करें, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया है कि राम और वाम इक_ा हो गए हैं और अशांति फैला रहे हैं। ‘राम’ नाम का इस तरह प्रयोग घोर आपत्तिजनक है। बहरहाल भीड़ डॉक्टरों को हतोत्साहित नहीं कर पाई है, क्योंकि जो डॉक्टर काम पर लौट गए थे, वे फिर हड़ताल पर वापस चले गए हैं। भारत में डॉक्टरों की कमी पहले से ही संकट बनी हुई है, क्योंकि औसतन 1108 लोगों पर एक ही डॉक्टर है। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी को बंगाल में अनुच्छेद 356 लागू कर देना चाहिए तथा प्रशासन में आमूल फेरबदल करना चाहिए।

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