मायावती की ‘एकला चलो’ पॉलिटिक्स से कांग्रेस, सपा, बीजेपी किसे फायदा-किसे नुकसान?

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को 2024 के चुनावी अखाड़े में पटखनी देने के लिए विपक्षी पार्टियां एक सीट पर एक उम्मीदवार उतारने के फॉर्मूले पर काम कर रही हैं. यूपी में बीजेपी सभी 80 सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर चुनावी तैयारियों में जुट गई है तो वहीं विपक्ष का एक सीट, एक उम्मीदवार का फॉर्मूला सूबे में फेल हो गया है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती ने यह ऐलान कर दिया है कि हम किसी से गठबंधन किए बगैर चुनाव मैदान में उतरेंगे.
मायावती ने चुनाव बाद गठबंधन का विकल्प खुला रखा है लेकिन साथ ही यह भी साफ कहा है कि बसपा किसी को भी फ्री में समर्थन नहीं देगी. मायावती के इस ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि यूपी में लड़ाई त्रिकोणीय होगी. अब चर्चा इसे लेकर भी होने लगी है कि मायावती के ‘एकला चलो’ की पॉलिटिक्स से कांग्रेस, सपा और बीजेपी में किसे नफा हो सकता है और किसे नुकसान?
क्या कहते हैं जानकार
वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर श्रीराम त्रिपाठी का कहना है कि बसपा के अकेले चुनाव मैदान में उतरने से सपा-कांग्रेस गठबंधन को नुकसान का खतरा अधिक है. अगर यह मान लें कि बीजेपी का वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले बड़ी गिरावट के साथ बीजेपी का वोट शेयर 42 या 44 फीसदी के स्तर तक भी आ जाता है तो बाकी का वोट सपा-कांग्रेस और बसपा के बीच बंटेगा. बसपा के पास करीब 19 फीसदी वोट बैंक है जो पार्टी के ही साथ जाता है. मायावती दलित-मुस्लिम समीकरण सेट करने में सफल रहीं तो रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अनुकूल माहौल और एंटी वोट का सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा के बीच बंटवारा बीजेपी की राह आसान कर सकते हैं.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव (फाइल फोटो)
अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दे रहे हैं. घोसी उपचुनाव में सपा की जीत से भी विपक्षी खेमा उत्साहित है लेकिन एक फैक्टर यह भी है कि घोसी में बीजेपी और सपा के बीच सीधा मुकाबला था. बसपा ने उम्मीदवार नहीं उतारा था. लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा देकर चुनाव मैदान में उतर रही बीजेपी के साथ ही बसपा से पार पाने की चुनौती भी होगी. कहा यह भी जा रहा है कि मुकाबला अगर एकजुट विपक्ष से होता तो बीजेपी के लिए चुनावी राह अधिक मुश्किल हो सकती थी लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले का नुकसान विपक्ष को उठाना पड़ सकता है.



