लेख

कब किसान गर्व से कहेगा, ‘मेरी संतान भी किसान बने’

एक डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, अफसर या कारोबारी अक्सर यही चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी उन्हीं के पेशे को आगे बढ़ाए। लेकिन इस मामले में किसान एक अपवाद है। बहुत कम किसान चाहते हैं कि उनकी संतान भी खेती करे। देश में खेती-किसानी के सामने सबसे बड़ा मौन संकट यही है कि किसानों की नई पीढ़ी की गांव, खेत-खलिहान से जुड़ी जड़ें लगातार कमजोर पड़ रही हैं। कड़ी मेहनत के बावजूद खेती उनके लिए घाटे का सौदा है। ऐसे में शहरों या विदेशों में नौकरी के लिए जाना उन्हें ज्यादा सही लगता है। नतीजा यह है कि गांवों में ज्यादातर बुजुर्ग किसान बचे हैं, जो अपनी जड़ों (खेतों) से जुड़े रहना चाहते हैं। 

देश की करीब 46 प्रतिशत आबादी आज भी खेती पर निर्भर है, जबकि देश की जी.डी.पी. में 16 प्रतिशत योगदान खेती का है। यह अंतर साफ बताता है कि खेती का दायरा बड़ा है लेकिन देश की अर्थव्यवस्था में उसकी घटती हिस्सेदारी एक बड़ी चुनौती है।  यहां आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस यानी ए.आई. एक बड़े बदलाव की राह खोल सकता है। यह सिर्फ एक नई टैक्नोलॉजी नहीं, बल्कि खेती को पूरी तरह बदल देने वाली ताकत बन सकता है। ए.आई. के जरिए खेती को डाटा और टैक्नोलॉजी आधारित स्मार्ट खेती, ज्यादा मुनाफेमंद व सबसे अहम, युवाओं को इससे जोड़ा जा सकता है।

स्मार्ट खेती की ओर : ए.आई. खेती के तौर-तरीके बदल रहा है। अब सैटेलाइट तस्वीरों, मिट्टी की जांच, मौसम के पैटर्न और फसल की स्थिति के आधार पर किसानों को तुरंत सलाह मिल सकती है। इससे किसान सही समय पर बुवाई कर सकता है, खाद एवं कीटनाशकों का संतुलित उपयोग कर सकता है और बाजार में सही समय पर फसल बेच सकता है। ए.आई. आधारित खेती से उत्पादन में बढ़ौतरी, पानी और रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों की खपत काफी घटाई जा सकती है। स्मार्ट फोन और डिजिटल दुनिया में पली-बढ़ी नई पीढ़ी के लिए यह बदलाव खेती को टैक्नोलॉजी आधारित पेशे में बदल देता है, जहां डाटा एनालिटिक्स भी उतने ही जरूरी हैं, जितने खेती के दूसरे पारंपरिक संसाधन। 

ए.आई., अवसर एवं चुनौतियां : भारत के पास कृषि से जुड़े विशाल डाटा में मौसम, मिट्टी, सैटेलाइट और फसलों संबंधी आंकड़े हैं, लेकिन अभी भी 10 प्रतिशत से कम किसान डिजिटल सलाह का इस्तेमाल करते हैं। यानी टैक्नोलॉजी का असली फायदा अभी खेतों की पहुंच से परे है। हालांकि अब तस्वीर बदलने लगी है। ‘किसान ई-मित्र’ जैसे प्लेटफॉर्म रोज हजारों किसानों के सवालों का जवाब दे रहे हैं। आई.आई.टी. रोपड़ की ‘एनम ए.आई.’ एप जैसी पहल भी डाटा को आसान भाषा में किसानों तक पहुंचा रही हैं। शुरुआती प्रयोग से यह साफ हुआ है कि ए.आई. के इस्तेमाल से खेती की लागत 8 से 12 प्रतिशत तक घट सकती है और उत्पादन 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। 

ए.आई. खेत मजदूरों का रोजगार छिनेगी? : अक्सर यह चिंता जताई जा रही है कि ए.आई. और मशीनें खेत मजदूरों को बेरोजगार कर देंगी। लेकिन भारत की जमीनी हकीकत अलग है। यहां 86 प्रतिशत किसानों के पास 2 हैक्टेयर तक के खेत हैं, जहां पूरी तरह मशीनों पर निर्भर होना संभव नहीं। ऐसे में ए.आई. खेत मजदूरों का काम खत्म नहीं करेगा, बल्कि काम का तरीका बदलेगा। अब नए तरह के काम सामने आ रहे हैं, जैसे एग्री-डाटा संभालने वाले तकनीशियन, ड्रोन से छिड़काव करने वाले ऑप्रेटर और सप्लाई चेन को संभालने वाले एक्सपर्ट छोटी जोत की खेती को भी मुनाफेमंद बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। 1966 में हरित क्रांति और मशीनीकरण की अगुवाई करने वाले पंजाब और हरियाणा के कई इलाकों में महिलाएं ड्रोन से फसलों की निगरानी और कीटनाशकों का छिड़काव कर रही हैं। यह संकेत है कि आने वाले समय में गांवों की अर्थव्यवस्था भी डिजिटल टैक्नोलॉजी से बदलेगी। यानी ए.आई. रोजगार कम नहीं करेगी, बल्कि खेती को कुशल और सम्मानजनक पेशे में बदल सकती है। 

कैसे विकसित देशों ने युवाओं को खेतों की ओर खींचा : दुनिया के कई देशों ने साबित किया कि जब खेती टैक्नोलॉजी से जुड़ती है, तो युवा खुद-ब-खुद उससे जुड़ते जाते हैं। चीन का उदाहरण बेहद दिलचस्प है। भूजल संकट के बावजूद भारत लगभग 4.4 करोड़ हैक्टेयर में धान उगाता है, जबकि भूजल सरंक्षण के लिए चीन ने धान का रकबा घटाकर 2.8 करोड़ हैक्टेयर कर दिया है। बावजूद इसके चीन का चावल उत्पादन भारत से सिर्फ 50 लाख टन कम है। भारत में प्रति हैक्टेयर चावल उत्पादन करीब 2.3 टन है, जबकि चीन में प्रति हैक्टेयर 4 टन, यानी भारत से 70 प्रतिशत ज्यादा उत्पादन। अमरीका में ‘सी एंड स्प्रे’ जैसी तकनीक कम्प्यूटर विजन के जरिए सिर्फ खरपतवार पर ही दवा डालती है, जिससे कैमिकल कीटनाशकों का इस्तेमाल 90 प्रतिशत तक घट जाता है। इसराईल में ए.आई. आधारित सिंचाई प्रणाली मिट्टी और मौसम के हिसाब से पानी का इस्तेमाल तय करती है। 

खेती को आकर्षक बनाना होगा : ए.आई. की मदद से जहां पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों की गेहूं-धान के फसली चक्र पर निर्भरता का समाधान निकाला जा सकता है, वहीं मिट्टी, पानी, मौसम, बीज, खाद एवं कीटनाशक की खपत और बाजार की मांग का विश्लेषण करके किसानों को फलों, सब्जियों, दालों, तिलहन और बागवानी जैसी अधिक लाभकारी फसलों की ओर मोड़ कर न केवल उनकी आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि पानी की बचत व पर्यावरण संतुलन भी बेहतर हो सकता है। मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, किसानों के कौशल विकास और दूरदर्शी नीतियों को यदि सही ढंग से लागू किया जाए, तो खेती आधुनिक, सम्मानजनक और मुनाफेमंद हो सकती है। तब शायद किसान भी गर्व से कह सकेगा कि ‘मेरी संतान भी किसान बनेगी।’-डा. अमृत सागर मित्तल

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button