संघ प्रमुख भागवत ने भाजपा और मोदी को खरी खरी सुना कर क्या संदेश दिया है?

आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन के जरिये जिस तरह के तेवर दिखाये हैं उससे प्रदर्शित हो रहा है कि इस बार स्पष्ट बहुमत से दूर रही भाजपा को सिर्फ अपने गठबंधन सहयोगियों को ही साथ लेकर नहीं चलना होगा बल्कि संघ परिवार के लोगों को भी साथ लेकर चलना होगा।
नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला तो देश-दुनिया से बधाई संदेश आने लगे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने इसी बीच मोदी सरकार और भाजपा को जिस तरह खरी-खरी सुनाई उससे सब आश्चर्यचकित हैं। हालांकि विपक्ष ने भागवत की टिप्पणियों का स्वागत किया है। देखा जाये तो मणिपुर की अशांति को लेकर भाजपा की चुप्पी पर मोहन भागवत ने जो कुछ कहा है वह एनडीए सरकार के लिए बड़ी चेतावनी की तरह है। मणिपुर में अब भी जिस तरह से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां के मुद्दे हल करने में केंद्र और राज्य सरकार नाकाम रही हैं।
इसके अलावा, आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन के जरिये जिस तरह के तेवर दिखाये हैं उससे प्रदर्शित हो रहा है कि इस बार स्पष्ट बहुमत से दूर रही भाजपा को सिर्फ अपने गठबंधन सहयोगियों को ही साथ लेकर नहीं चलना होगा बल्कि संघ परिवार के लोगों को भी साथ लेकर चलना होगा। आरएसएस के कई पदाधिकारी इस बात को स्वीकार रहे हैं कि चुनावों से पहले भाजपा ने अति आत्मविश्वास के साथ ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा लगाना शुरू किया था तब संघ परिवार के लोगों ने उन्हें जमीन पर रह कर काम करने की सलाह दी थी लेकिन पार्टी के नेताओं को ‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारे पर इतना भरोसा हो गया था कि उन्होंने किसी की नहीं सुनी और आखिरकार मुंह की खानी पड़ी। देखा जाये तो लगभग ऐसी ही स्थिति साल 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी हुई थी जब भाजपा के नेता इंडिया शाइनिंग के नारे पर इतना भरोसा कर रहे थे कि उन्होंने जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर दी थी। रही सही कसर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के कथित तौर पर आरएसएस के बारे में दिये गये बयान से पूरी हो गयी थी। चुनावों के बीच ही आरएसएस कार्यकर्ताओं ने जिस तरह भाजपा से दूरी बना ली थी उससे पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जिस तरह इशारों इशारों में भाजपा की कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं उससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा के नये अध्यक्ष के चयन में अब नागपुर की ज्यादा चलेगी। हम आपको याद दिला दें कि 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद भागवत की पहल पर ही नितिन गडकरी को नागपुर से दिल्ली भेजा गया था ताकि वह पार्टी को संभालें। उस समय भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार जैसे नेता दिल्ली की राजनीति में प्रभावी थे लेकिन सबको दरकिनार कर गडकरी को लाया गया था।
जहां तक मोहन भागवत के संबोधन की बात है तो आपको बता दें कि एक तो उन्होंने मणिपुर में एक वर्ष बाद भी शांति स्थापित नहीं होने पर चिंता जताई है साथ ही देश के सभी समुदायों के बीच एकता पर जोर दिया है। आरएसएस प्रमुख ने साथ ही चुनावी बयानबाजी से बाहर आकर देश के सामने मौजूद समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद अपनी पहली टिप्पणी में भागवत ने कहा है कि नतीजे आ चुके हैं और सरकार बन चुकी है, इसलिए क्या और कैसे हुआ आदि पर अनावश्यक चर्चा से बचना चाहिए। भाजपा की सीटें घटने की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि आरएसएस ‘‘कैसे हुआ, क्या हुआ’’ जैसी चर्चाओं में शामिल नहीं होता है। उन्होंने कहा कि संगठन केवल मतदान की आवश्यकता के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने का अपना कर्तव्य निभाता है।
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इसके अलावा, सत्ता पक्ष और विपक्ष के संबंधों में जिस तरह की खटास हाल के वर्षों में देखने को मिली है उस ओर इशारा करते हुए भागवत ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आम सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया है ताकि आम जनता के लिए काम किया जा सके। भागवत ने स्पष्ट कहा है कि चुनाव बहुमत हासिल करने के लिए होते हैं और यह एक प्रतिस्पर्धा है, युद्ध नहीं। उन्होंने विपक्ष को विरोधी कहने की बजाय प्रतिपक्ष नाम से पुकारने का सुझाव भी दिया है। भागवत का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक दल और नेता एक-दूसरे की बुराई कर रहे हैं, लेकिन वे इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं कि इससे समुदायों के बीच दरार पैदा हो सकती है। भागवत का इस बात पर अफसोस जताना भी स्वाभाविक ही था कि आरएसएस को बिना किसी कारण राजनीतिक विवादों में घसीटा जाता है।
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दूसरी ओर, भले इस बार का लोकसभा चुनाव बिना किसी विघ्न के संपन्न हुआ लेकिन इस बार के लोकसभा चुनावों में मिथ्या प्रचार और अफवाहों का बाजार खूब देखने को मिला। इस ओर भी इशारा करते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा है कि चुनाव में हमेशा दो पक्ष होते हैं, लेकिन जीतने के लिए झूठ का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने परोक्ष तौर पर डीपफेक आदि की ओर इशारा करते हुए यह भी कहा कि तकनीक का उपयोग करके झूठ फैलाया गया। हम आपको याद दिला दें कि चुनावों के बीच ही गृह मंत्री अमित शाह का आरक्षण के बारे में विवादित बयान वाला डीपफेक वीडियो जारी किया गया था जिसे कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा भी कर दिया था।
इसके अलावा, भागवत ने देश की विविधता का सम्मान करते हुए आगे बढ़ने की नसीहत देते हुए यह भी कहा कि एक दूसरे की उपासना पद्धति का सम्मान किया जाना चाहिए। भागवत का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि इस्लाम और ईसाई जैसे धर्मों की अच्छाई और मानवता को अपनाया जाना चाहिए और सभी धर्मों के अनुयायियों को एक-दूसरे का भाई-बहन के रूप में सम्मान करना चाहिए। देखा जाये तो भागवत की यह नसीहत उन लोगों के लिए खासतौर पर है जो टीवी की बहसों और सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणियों में धर्म विशेष को निशाना बनाते हैं। यकीनन ऐसे लोगों के चलते ही समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है।
इसके अलावा, जो लोग बात-बात पर दूसरों को देश छोड़कर कहीं ओर बस जाने की सलाह देते हैं, उनकी ओर इशारा करते हुए भागवत ने कहा है कि सभी को यह मानकर आगे बढ़ना चाहिए कि यह देश हमारा है और इस भूमि पर जन्म लेने वाले सभी लोग हमारे अपने हैं। आरएसएस प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया है कि कुछ लोगों की यह सोच कि केवल विदेशी विचारधाराएं ही सत्य हैं, समाप्त होनी चाहिए। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अतीत की बातों को भूलने और सबको अपनाने की सीख दी है। साथ ही उन्होंने जातिवाद को पूरी तरह से खत्म करने का आह्वान करते हुए अपने संगठन के पदाधिकारियों से समाज में सामाजिक सद्भाव की दिशा में काम करने के लिए कहा है।
बहरहाल, संघ प्रमुख के नागपुर में दिये गये संबोधन को लेकर जिस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं वह दर्शा रही हैं कि प्रतिपक्ष को भाजपा पर वार करने के लिए नया हथियार मिल गया है। खैर…पहले ही चुनावी नतीजों से परेशान दिख रही भाजपा यदि भागवत की नसीहत पर तत्काल प्रभाव से अमल करे तो यकीनन वह जल्द ही निराशा के भंवर से उबर सकती है।



