मानवताविहीन विकास आखिर किसके लिए?

इस आत्मघाती वातावरण में घोर आश्चर्य ये है कि देश-दुनिया के शक्तिशाली लोग अपने मासूम बच्चों के मुख देखकर भी नहीं पिघल रहे। उन्हें ये विचार भी नहीं सूझता कि आधुनिकता के कारण मरणासन्न प्राकृतिक परिवेश, ऋतुगत विकृतियों तथा पंचतत्त्वों के असंतुलन के कारण उनके प्यारे-भोले बच्चों का क्या होगा? अंतत: विकास एवं आधुनिकता के लक्ष्य भावी संतति के सुख व सुविधाओं के लिए ही तो थे…
अंतर्मन बारंबार पूछता है कि क्या तुझे स्वयं की मनुष्यता, भारतीयता तथा सामाजिक पहचान पर गर्व है? उत्तर में अतिशय निराशा उत्पन्न होती है तथा नहीं को स्वीकार करना पड़ता है। विश्व के प्रत्येक संवेदनशील, प्राकृतिक तथा शांत व्यक्ति की यही मन:स्थिति है। वह निजास्तित्व, नागरिकता, राष्ट्रीयता तथा सामाजिकता को विवशतापूर्वक स्वीकार किए हुए है। भारत के संदर्भ में स्वयं को ही सम्मुख रखता हूं। जीवन जकड़ा हुआ लगता है। भीतर जो वैचारिकता स्वतंत्रता है, वह बाहर की विभिन्न परतंत्रताओं से भयाक्रांत है। अभिलाषा प्राकृतिक, ग्रामीण, पारंपरिक तथा आधुनिकता के लगभग हर हस्तक्षेप से मुक्त जीवन जीने की है, किंतु जीना पड़ रहा है ऐसा जीवन जिसके वास्तविक सिद्धांत, क्रियाकलाप तथा समग्र गतिविधियां अभिलाषा के विपरीत विषैली हैं। क्यों नहीं किसी को ये स्वीकार करना चाहिए कि उसे विसंगतियों से परिपूर्ण लोकतंत्र नहीं चाहिए? उसे शासन-प्रशासन की घिनौनी, लुंज-पुंज, मरणासन्न तथा हिंसापरक कुंठा उत्पन्न करने वाली गतिविधियां नहीं चाहिए। उसे पारंपरिक भारतीय राष्ट्र, समाधानहीन समस्याएं उत्पन्न करने वाले वैश्विक ग्राम में परिवर्तित नहीं चाहिए। उसे धनपतियों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों तथा इनके संकेतों पर नीतियां बनाने वाले नेता, शासकीय कर्मचारी तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएं नहीं चाहिए। ये खुलकर क्यों नहीं स्वीकार हो कि उसे वैज्ञानिक प्रयोगों, आविष्कारों, खोजों तथा अभिशाप की पराकाष्ठा को स्पर्श करता विज्ञान का प्रायोगिक जीवन-व्यवहार नहीं चाहिए।
जब मनुष्य यंत्र में परिवर्तित हो चुका हो, मनुष्य के यंत्रवत हावभाव स्पष्ट परिलक्षित हों तथा मानवता का विकराल अभाव परिव्याप्त हो तो क्यों नहीं तब आधुनिकता, विकास, विज्ञान, उन्नति एवं पशुवत मानवीय गतिविधियों पर विराम लगे? ये प्राकृतिक विधि से जीवनयापन करने की अभिलाषा रखने वाले मनुष्य की केवल अभिलाषा है, जो पूर्ण कभी नहीं होगी। इसलिए नहीं होगी क्योंकि विकास के स्वरूप में विद्यमान विनाशी कुमार्ग की यात्रा अब तक बहुत लंबी हो चुकी है। अब तो ऐसे विनाश के बाद जब प्रलय होगी तथा सार्वभौमिक मृत्यु के बाद नवजीवन उदित होगा, तब ही प्राकृतिक जीवन होगा। तब तक संवेदनशील प्राकृतिक मनुष्यों को घुटना होगा, घुट-घुट कर मरना होगा तथा आधुनिक सार्वजनिक जीवन-व्यवहार के प्रति गहन अनिच्छा के उपरांत भी उसमें अपना निर्धारित जीवन समय व्यतीत करना होगा। आधुनिकता की कुछ विसंगतियों के साथ वर्णन आगे बढ़ाते हैं। एक ओर, देश-दुनिया के जीवन में विद्यमान प्यारे, मासूम, निश्छल व मखमली बच्चों के बारे में सोचकर नीति-नियम बनते हैं कि बच्चों को मदिरा, धूम्र, मादक तथा अन्य विषैले पदार्थों से पृथक रखकर उनका समुचित पालन-पोषण किया जाना है, किंतु दूसरी ओर जीवन जी रहे वयस्क लोगों के लिए ऐसे पदार्थों का नियमबद्ध उत्पादन, व्यापार तथा क्रय-विक्रय किया जाता है। भारत जैसे देश में तो ऐसे पदार्थों की बिक्री द्वारा शासन को सर्वाधिक राजस्व अर्जन होता है। ये क्या है? क्या ऐसे में विकास तथा आाधुनिकता के नाम पर सभ्य, प्रतिष्ठित, आदर्श एवं समुचित होने का कोई अर्थ है? बिल्कुल नहीं है। इसी प्रकार, एक ओर, बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखने तथा उन्हें इसके संपर्क में न आने देने के लिए प्रधानमंत्री से लेकर विद्वान-विशेषज्ञ गण प्रवचन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर बच्चों के माता-पिता तथा अभिभावकों के लिए उनकी इच्छा जाने बिना ही मोबाइल फोन रखना अनिवार्य कर दिया गया है। हर आर्थिक, बैंकिंग, सामाजिक तथा अन्य कार्य मोबाइल फोन से जोड़ दिया गया है। ऐसे में स्थिति ये हो चुकी है कि जिसे मोबाइल फोन रखने की इच्छा नहीं है, उसे भी बलात शासकीय प्रपंच व षड्यंत्र से मोबाइल फोन ढोना पड़ रहा है।
जिन बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखने की सलाहें दी जा रही हैं, वे भी बड़े होते-होते चाहे-अनचाहे इनको ढोने के लिए विवश हो ही जाएंगे। इस संदर्भ में आश्चर्य तो तब होता है, जब प्रधानमंत्री, एक ओर तो बच्चों को परीक्षावधि में तनाव से दूर रखने के मंत्र बताते हुए कहते हैं कि मोबाइल फोन से दूर रहना सीखो, और दूसरी ओर एआई अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शिक्षा लेने का आग्रह भी करते हैं। यह कैसा विरोधाभास है! क्या एआई एप्लिकेशन बनाने वाली कंपनियों से व्यापारिक समझौते करते समय शासन को इस संदर्भ में बच्चों तथा उनके अभिभावकों की इच्छा-अनिच्छा जानने के लिए कर्तव्यनिष्ठ नहीं होना चाहिए? इसी विषय को नहीं, अपितु अन्य विषयों तथा नीतियों को लोगों पर थोपने से पूर्व शासन को उनको स्वीकार-अस्वीकार करने की लोगों की इच्छा-अनिच्छा पर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या सामान्य लोग शासन से कहते हैं कि हमारे लिए मदिरा, धूम्र, मादक पदार्थों का उत्पादन एवं कारोबार करो? क्या जनसामान्य कहता है कि उसे डिजिटल लेन-देन, मोबाइल फोन तथा एआई चाहिए? जनसामान्य तो अपने प्रबुद्ध विचार तथा युक्तियुक्त बुद्धि-विवेक द्वारा शांत प्राकृतिक जीवन जीने को लालायित है। किंतु दुर्भाग्य देखिये कि जनसामान्य की इस प्राकृतिक इच्छा के साथ शासन का कोई सरोकार नहीं है। इस संदर्भ में उसका स्वयं संज्ञान रसातल में है। इस इच्छा की पूर्ति के लिए न तो वैज्ञानिक, धनपति, पूंजीपति, उद्योगपति तथा न ही शासकीय प्रतिनिधि कुछ करते हैं। ये सभी तो प्राकृतिक व्यवस्था बनाए रखने में नहीं, अपितु प्रकृति से प्रचुर अयस्क, खनिज तथा अन्यान्य रत्न खींच-सोख डालने को अतिव्याकुल हैं, ताकि इनके द्वारा आधुनिकता के झांसे में लिए गए लोगों के लिए कुछ नवीन वैज्ञानिक वस्तुएं, मशीनें एवं सुविधाएं बनाई जा सकें तथा इनके मध्य अमीरी में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ बनी रहे। इन सब परिस्थितियों में जीवन शुष्क पाषाण की भांति हो चुका है। मानव में से मानवता समाप्त हो चुकी है। आखिर इस सब की अंतिम परिणति है क्या? क्या आधुनिकता की दौड़ में तन-मन-धन से डूबे अग्र प्रभावशाली व्यक्तियों के पास इसका विचारणीय उत्तर है? उनके पास कोई उत्तर नहीं है।
आधुनिकता की ये सबसे बड़ी कमी है कि इसमें डूब चुकी दुनिया तथा दुनिया के अधिसंख्य मानवों को रुककर जीवन के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं होता। इस भंवर में घूमते लोगों तथा लोगों को घुमाने वाले शक्तिशाली लोग केवल वेश में ही मनुष्य बचे हुए हैं। अंदर से वे रिक्त, भावनाहीन, मानवताविहीन, प्रकृतिरहित हो चुके हैं। इस आत्मघाती वातावरण में घोर आश्चर्य ये है कि देश-दुनिया के शक्तिशाली लोग अपने मासूम बच्चों के मुख देखकर भी नहीं पिघल रहे। उन्हें ये विचार भी नहीं सूझता कि आधुनिकता के कारण मरणासन्न प्राकृतिक परिवेश, ऋतुगत विकृतियों तथा पंचतत्त्वों के असंतुलन के कारण उनके प्यारे-भोले बच्चों का क्या होगा? अंतत: विकास एवं आधुनिकता के लक्ष्य भावी संतति के सुख व सुविधाओं के लिए ही तो थे, किंतु जब ऐसे लक्ष्यों के कारण जीवन के आधार पांच तत्त्वों तथा इनकी प्राकृतिकता ही घनघोर संकट में है, तो तब इस दिशा में आगे ही आगे बढ़ते जाने का क्या औचित्य है? इस दिशा में प्रतिक्षण, प्रतिदिन सोच-विचार की अति आवश्यकता है। इस पर अनिवार्य चिंतन-मनन होना चाहिए। यदि इस विषय पर सोच-विचार तथा चिंतन-मनन का अभाव हो, तो तत्काल मासूम बच्चों के मुख देखे-याद किए जाएं।-विकेश कुमार बडोला



