संपादकीय

उपराष्ट्रपति का चुनाव

आज देश के उपराष्ट्रपति का चुनाव है। संविधान के दूसरे सर्वोच्च पद का चुनाव आम सहमति से, निर्विरोध होना चाहिए, लेकिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का चुनाव निर्विरोध किया गया। वह 1952 और 1957 में देश के उपराष्ट्रपति चुने गए। यही नहीं, मई, 1962 से 1967 तक वह राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर भी रहे। वैसे 1979 में हिदायतुल्लाह और 1987 में शंकर दयाल शर्मा भी निर्विरोध उपराष्ट्रपति चुने गए थे। बहरहाल राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक और सेनाओं के सुप्रीम कमांडर भी होते हैं। केंद्र सरकार राष्ट्रपति के नाम पर ही काम करती है, लिहाजा ऐसे पद पर निर्विरोध चुनाव की सहमति क्यों नहीं बन पाती, हम इस सवाल पर हैरान भी हैं और क्षुब्ध भी हैं। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम देश के ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिनके दूसरे कार्यकाल के लिए सर्वसम्मति बनाने के प्रयास किए गए, लेकिन नाकाम रहे। हालांकि देश के ‘मिसाइल मैन’, परमाणु परीक्षणों के एक सूत्रधार रहे और ‘भारत-रत्न’ के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत होने के बावजूद एपीजे को राष्ट्रपति बनने के लिए चुनावी बहुमत हासिल करना पड़ा था। मौजूदा उपराष्ट्रपति पद के लिए भी निर्विरोध चयन की कोशिशें मोदी सरकार ने की थीं। विपक्ष अच्छी तरह जानता था और अब भी स्पष्ट है कि लोकसभा और राज्यसभा के कुल सांसदों की गिनती सत्तारूढ़ भाजपा-एनडीए के पक्ष में है, फिर भी निर्विरोध चुनाव की कोशिशें खारिज कर दी गईं। विपक्ष चुनाव लडऩे को ही लोकतंत्र मानता है। यह मिथ्या अवधारणा है। लोकसभा स्पीकर का चुनाव बहुधा सर्वसम्मति से ही होता रहा है। आंकड़े तब भी सत्ता पक्ष के पाले में ही होते हैं। इस बार की लोकसभा में विपक्ष को करीब 236 सांसदों का समर्थन हासिल है। सामान्य बहुमत (272 सांसद) किसी भी पक्ष में नहीं है। भाजपा 240 सांसदों के साथ सदन में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, लेकिन एनडीए के कुल सांसदों की संख्या 293 है, लिहाजा सरकार एनडीए की बनी। यदि स्पीकर पर आम सहमति बन सकती है, तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए ऐसा समविचारक निर्णय क्यों नहीं किया जा सकता? सरकार और विपक्ष को अब भी व्यापक मंथन करना चाहिए। बहरहाल कुछ अप्रत्याशित और अनपेक्षित नहीं हुआ, तो एनडीए के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति चुनाव जीतना तय है। उनके पक्ष में लोकसभा में एनडीए के 299 सांसद हैं, जबकि राज्यसभा में 140 सांसद हैं।

राधाकृष्णन के पक्ष में कुल 439 सांसदों का समर्थन दिखता है। विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन के उम्मीदवार जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के पक्ष में कुल 324 सांसदों का समर्थन लगता है। विपक्ष के लोकसभा में 236 और राज्यसभा में 91 सांसद हैं। बीजद के 7, बीआरएस के 4, अकाली, जद-एस, वीओटीटीपी के 1-1 सांसद और 3 निर्दलीय सांसदों का समर्थन फिलहाल अनिश्चित और अघोषित है। आंध्रप्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है। इस चुनाव में राजनीतिक दल कोई भी ‘व्हिप’ जारी नहीं कर सकते। सांसद अपने विवेक पर मतदान करते हैं, लिहाजा कई बार पालाबदल भी होता रहा है। डॉ. राधाकृष्णन और हामिद अंसारी ही ऐसे नेता रहे हैं, जो लगातार दो बार उपराष्ट्रपति चुने गए। दो महिला नेताओं- नजमा हेपतुल्ला और मार्गरेट अल्वा- को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार जरूर बनाया गया, लेकिन वे चुनाव हार गईं। बहरहाल उपराष्ट्रपति का पद बेहद महत्वपूर्ण होता है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं और राष्ट्रपति की ‘छाया’ भी होते हैं। अपरिहार्य स्थितियों में वह ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के दायित्व भी संभालते हैं, लिहाजा उनकी विचारधारा और सोच देश के सामने आनी चाहिए। हालांकि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता भी अपने दलों और गठबंधनों वाली ही होती है, लेकिन देश की प्रगति और विकासोन्मुख मुद्दों और स्थितियों पर वे कमोबेश बात कर सकते हैं। बेशक उपराष्ट्रपति को तटस्थ ईकाई माना जाता है, लेकिन सदन में उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट हो जाती है। फिर भी वे ‘तटस्थ’ और ‘ईमानदार’ होने का प्रयास करते हैं। जिन अस्पष्ट स्थितियों में, अचानक ही, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को इस्तीफा देकर जाना पड़ा और आज तक उनका एक भी बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है, कमोबेश देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक शख्स के साथ ऐसी राजनीति नहीं खेली जानी चाहिए। बहरहाल, स्पीकर-डिप्टी स्पीकर से निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है।

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