निरंतर संघर्ष की अमिट गाथा वाल्मीकि समाज

भारत भी अरबों के नव मजहबी जुनून से बच नहीं सका। लेकिन ये समाज अरवों-तुर्कों से अंतिम दौर तक संघर्ष करते रहे और हार नहीं मानी और प्रताड़ना का शिकार होते रहे उन्हे भूखमरी का भी सामना करना पड़ा। स्टेनले राइस अपनी पुस्तक ‘हिंदू कस्टम्स एंड देयर ऑरिजिन’ में लिखते हैं कि, ‘अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे जातियां भी हैं, जो विजेताओं से हारीं और अपमानित हुई तथा जिनसे विजेताओं ने अपने मनमाने काम करवाए।’ जाहिर है वाल्मीकि समाज भी उसी में शामिल था। लेकिन महर्षि वाल्मीकि में उनकी आस्था अटल रही। इस भयंकर कालरात्रि में भी वे वाल्मीकि महाराज का रास्ता त्याग कर अरबों-तुर्कों के इस्लाम के रास्ते पर नहीं गए। हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने वाल्मीकि समाज को लेकर प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ लिखा था…
काल निरन्तर गतिमान रहता है और इसके साथ ही इतिहास का चक्र घूमता रहता है। लगभग पन्द्रह सौ साल पहले जम्बूद्वीप के अरब क्षेत्र में एक नए पंथ का उदय हुआ। यह पंथ दुनिया भर में अपना साम्राज्य तो स्थापित करना ही चाहता था, लेकिन उसके साथ-साथ विजित प्रदेशों के चिन्तन, दर्शन, विरासत को समाप्त कर इस्लाम पंथ के आधार पर उदय हो रही नव अरब संस्कृति को थोपना चाहता था। इसको वह ‘जिहाद’ कहता था। आसपास के अनेक देश अरबों के इस जिहाद के शिकार हो गए। कुछ भाग कर भारत में आ गए। मध्य एशिया भी इसकी जद में आ गया। उसके बाद अफगानिस्तान भी इसका शिकार हुआ। तुर्क, बलूचों और पश्तूनों ने मुकाबला तो डट कर किया, लेकिन नियति शायद अरबों के पक्ष में थी। तुर्कों और पश्तूनों को भी अरबों के आगे झुकते हुए मतान्तरित होना पड़ा। मध्य एशिया के कबीले चाहे मतान्तरित हो गए थे, लेकिन इस्लाम पंथ उनको एक नहीं कर सका। वे एक-दूसरे के राज्यों को हथियाने के लिए आपस में युद्ध करते रहते थे। तुर्कों ने तो इस्लाम के खलीफा कहे जाने वाले अरबों को भी अपने अधीन कर लिया। भारत भी अरबों के नव मजहबी जुनून से बच नहीं सका। अरबों ने 712 ईस्वी से ही भारत पर आक्रमण करने शुरू कर दिए थे। पहला आक्रमण सिन्ध क्षेत्र पर हुआ था। कालान्तर में इन्हीं मतान्तरित तुर्कों ने सप्त सिन्धु क्षेत्र से ही भारत पर हमले शुरू कर दिए। 1200 के आसपास दिल्ली पर इनका कब्जा हो गया। आक्रमण का रास्ता सप्त सिन्धु-पंजाब क्षेत्र से होकर ही गुजरता था। इसी क्षेत्र में महर्षि वाल्मीकि का अनुयायी वाल्मीकि समाज बड़ी संख्या में रहता था और अब भी है। इन हमलावरों का मुकाबला करने वालों में इस वाल्मीकि समाज की भी प्रमुख भूमिका थी। लेकिन विजय अन्तत: अरबों, तुर्कों और मुगलों की ही हुई। बहुत से समुदाय झुक गए, लेकिन वाल्मीकि समाज नहीं झुका। इसलिए उसे शासन के प्रकोप का शिकार तो होना ही था। शासन ने उनकी आजीविका के सारे रास्ते बन्द कर दिए।
वे दर-बदर हो गए। स्टेनले राइस अपनी पुस्तक ‘हिंदू कस्टम्स एंड देयर ऑरिजिन’ में लिखते हैं कि, ‘अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे जातियां भी हैं, जो विजेताओं से हारीं और अपमानित हुई तथा जिनसे विजेताओं ने अपने मनमाने काम करवाए।’ जाहिर है वाल्मीकि समाज भी उसी में शामिल था। लेकिन महर्षि वाल्मीकि में उनकी आस्था अटल रही। इस भयंकर कालरात्रि में भी वे वाल्मीकि महाराज का रास्ता त्याग कर अरबों-तुर्कों के इस्लाम के रास्ते पर नहीं गए। हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने वाल्मीकि समाज को लेकर प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ लिखा था। इस उपन्यास के लिए वे लखनऊ में वाल्मीकि बस्तियों में, जिन्हें वहां मेहतर या भंगी भी कहा जाता है, बहुत घूमे थे। तब निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा, ‘काम करते हुए क्रमश: मुझे अनुभव होने लगा कि भंगी कोई जाति नहीं है।’ अमृतलाल नागर ने अपने अध्ययन में गाजीपुर के देवदत्त शर्मा चतुर्वेदी की पुस्तक ‘पतित प्रभाकर अर्थात मेहतर जाति का इतिहास’ की चर्चा की है। इसे 1931 में पंडित चिन्तामणि वाल्मीकि के पितामह वंशीराम राऊत मेहतर ने प्रकाशित करवाया था। इसमें भंगी, मेहतर, खरिया, चूहड इत्यादि तथाकथित जातियों के गोत्र दिए गए हैं, जो हिन्दुओं के अन्य समुदायों के नामों के ही हैं।
विदेशी शासन ने वाल्मीकि समाज को प्रताडि़त तो किया ही, उन्हें शिक्षा से भी वंचित कर दिया। ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ का ही एक पात्र इतिहास के इस पन्ने को उघाड़ता हुआ कह रहा है, ‘हमारे एक बुजुर्ग ने हमें बतलाया था कि हम लोग भी कोई सदा के मेहतर नहीं थे, क्षत्री थे। गोरी गजनी के बादशाह से लड़ाई में हार गए। वह हमें पकड़ कर ले गया। हमारी औरतें हमसे छीन लीं। उनका धरम बदल दिया। हमसे भी कहा कि अपना दीन-धरम छोडक़र हमारे मजहब में आ जाओ। हमने कहा कि हम अपना धरम हरगिज हरगिज नहीं छोड़ेंगे। बादशाह ने गुस्से होके कहा कि नहीं छोड़ोगे तो तुम्हें हमारा मल मूत्र उठाना पड़ेगा। हमने यह काम मंजूर कर लिया, लेकिन अपना धरम नहीं छोड़ा।’ डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने भी कहा है कि जनजातियों की परस्पर लड़ाइयों में जो अपनी जनजाति से बिछुड़ गए, उन्हें किसी दूसरी जनजाति की बसाहत में रहने का आश्रय तो मिला, लेकिन रहना गांव के बाहर पड़ा।
बाद में यही लोग गांववालों के लिए अछूत मान लिए गए। अंबेडकर इन्हें ‘ब्रोकन मैन’ कहते हैं। नागर भी इसी की व्याख्या करते प्रतीत होते हैं। वे लिखते हैं, ‘बिखरे हुए कबीलों के कमजोर लोग भी दास-दासीवत समझे जाते थे, जिनका खानपान प्रचलित समाज के खानपान से अलग होता था। ऐसे लोगों को नैतिक और सामाजिक दृष्टि से बाद में अस्पृश्य माना जाने लगा और मुगलों-तुर्कों के समय में यह विजित-विजेता दम्भ-संघर्ष की पुरानी परम्परा में तेजी से बढ़ोतरी हुई। पहले शहरी घरों में अधिकांश संडासें ही बनं थीं। किलों में ऐसे शौचालय बनते थे जो पानी से ही स्वच्छ किए जाते थे, उन्हें कमाना नहीं पड़ता था। शहरों में कमाने वाले पाखाने गुलामों की बढ़ोतरी के अनुपात में बढ़े। भंगी समाज में बहुत से छोटे मोटे पराजित राजकुलों के वंशधर भी मौजूद थे। विजेता के दम्भ ने विजितों के दम्भ को कुचलकर किसी मानसिक गति में नाली के कीड़े की तरह बहा दिया है।
तरह-तरह के जाति-वर्णों से आए हुए व्यक्ति दास बनकर एक से एक अत्याचार भोगने पर बाध्य हुए। अरब-तुर्क-मुगल मंगोल (एटीएम) शासकों ने हमलावरों का मुकाबला करने वालों को मार-मार कर मेहतर बनाया। आज भी पाकिस्तान में चित्राल 20 का राजा मेहतर ही कहलाता है। जिन उच्च वर्णों का वर्णत्व शक्ति से भंग कर दिया गया, वे भंगी कहलाए। वैसे भंगी कोई जाति नहीं है। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में भंगी जाति होने का प्रमाण बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिला। लेकिन जीवन की कठोरताओं का अनुभव करते-करते वाल्मीकि समाज समझ गया था कि महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उनके पुरखों ने जो ज्ञान और प्रशिक्षण हासिल किया था, शस्त्र और शास्त्र की साधना की थी, वही अब उनके जीवन का सम्बल रहेगा। वही उन्हें इस नर्क से बाहर निकालेगा।
बहुत अरसा बाद अंबेडकर ने भी यही निष्कर्ष निकाला था। वाल्मीकि समाज से कई ऐसे योद्धा हुए हैं, जो विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों का डटकर विरोध करने के बावजूद इतिहास के किसी अंधेरे कोने में खड़े मिलेंगे। आज जरूरत ऐसे योद्धाओं को याद करके भारत के नवनिर्माण की है। भारतीय नागरिकों को ऐसे योद्धाओं से सीख लेनी चाहिए तथा उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिए। इतिहास के अंधेरे कोने में पड़े ऐसे योद्धाओं की गाथाओं को सम्मान मिलना चाहिए तथा इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिए। अंबेडकर की धरती भारत भूमि पर ऐसे योद्धाओं का सम्मान उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यह गाथा जातिवाद की निरर्थकता भी साबित करती है।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री



