संपादकीय

‘वंदे मातरम्’ पर बवाल

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ पर देश भर में राजनीतिक बवाल मच गया, यह वाकई शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। ‘वंदे मातरम्’ पर संसद के दोनों सदनों में बिल पारित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी उस पर हस्ताक्षर कर दिए। अब ‘वंदे मातरम्’ पर नया कानून बन गया और लागू हो चुका है, लिहाजा कानून का उल्लंघन अथवा राष्ट्रगीत को खंडित करना, उसके गायन-वादन में व्यवधान डालना आदि ‘अपराध’ हैं। प्रत्येक अपराध की सजा भी निश्चित होती है, लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में जो विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं, जुलूस निकाले जा रहे हैं, नारेबाजी बुलंद है, वे तमाम राजनीतिक मानसिकता के उदाहरण हैं। सुदूर सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) में मशाल-जुलूस निकाला गया। कश्मीर के श्रीनगर में ‘मुर्दाबाद’ के नारे गूंजते रहे और कांग्रेस के शीर्ष तीन नेताओं को ‘माफी मांगने’ को कहा गया। पंजाब के अमृतसर में कांग्रेस नेताओं के पुतले जलाए गए। प्रधानमंत्री के चुनाव-क्षेत्र वाराणसी में ‘डीएनए’ पर सवाल उठाए गए। मुंबई में अजीब नारेबाजी की गई-‘सीताराम कहेंगे, राधेश्याम कहेंगे।’ इन हिंदूवादी नारों का ‘वंदे मातरम्’ से क्या सरोकार है? गुजरात, मप्र, उप्र, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि राज्यों के शहरों में भी बवाल मचाए गए, खासकर सोनिया गांधी को निशाना बनाया गया। कई शहरों में भाजपाई, जाहिर है, चेहरों ने सोनिया गांधी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी के खिलाफ भी शिकायतें दर्ज कराईं और उन्हें ‘प्राथमिकी’ बनाने के आग्रह पुलिस से किए गए। राजधानी दिल्ली में तो पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी ही दर्ज कराई गई है। शिकायतों में गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की मांगें भी बुलंद हुई हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ‘वंदे मातरम्’ के कथित अपमान को ‘पाप’ करार दिया है और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को देश एवं गीतकार बंकिम बाबू की आत्मा से माफी मांगने का आग्रह किया है।

भाजपा इसे ‘भारत का अपमान’ चित्रित कर रही है। कांग्रेस ने एक बार फिर भाजपा को अपनी ‘कमजोर नस’ थमा दी है, एक संवेदनशील मुद्दा दे दिया है, भाजपा इसे विकराल रूप देकर 2027 के विधानसभा चुनावों में भुना सकती है। अलबत्ता जेन-जी और अल्फा के मुद्दे पर भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई थी और देश का माहौल बदलने लगा था। दरअसल वह 15 अगस्त, देश के स्वतंत्रता दिवस, का पावन अवसर था। कांग्रेस मुख्यालय में भी परंपरागत रूप से ‘तिरंगा’ फहराया जाता रहा है। चूंकि ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन-वादन कानूनन ‘अनिवार्य’ कर दिया गया है, लिहाजा कांग्रेस मुख्यालय में भी गाया गया। उस समारोह के जो सीधे प्रसारण और वीडियो सार्वजनिक हुए हैं, उनमें राष्ट्रगीत के गायन के दौरान ही कांग्रेस अध्यक्ष खडग़े और सोनिया गांधी आपस में बतियाते हुए दिखे हैं। फिर ‘सेवादल’ का कर्मचारी उनके पास आया और दोनों नेताओं ने उसे अलग-अलग निर्देश दिए। सोनिया गांधी की उस दौरान की ‘मुख-मुद्रा’ पढ़ी जा सकती है। वह ‘वंदे मातरम्’ गाए जाने से बेचैन लग रही थीं। राहुल गांधी ने भी बाएं मुड़ कर कुछ संकेत किए। बाद में वह यह कहते हुए सुने गए-‘हम अपना वंदे मातरम् गा रहे हैं, सरकारी ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाना है।’ यह अपना और सरकारी ‘वंदे मातरम्’ क्या होता है? बहरहाल बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जो गीत 1875 में लिखा था और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में भी गाया गया, उसकी पृष्ठभूमि 1906-07 की भी है। इस गीत की उत्प्रेरक भूमिका आजादी की लड़ाई में क्या रही, 1936-37 में तत्कालीन मुस्लिम लीग और मुहम्मद अली जिन्ना के आग्रह पर इस गीत के दो छंद ही स्वीकार किए गए और उन्हें ही गाया जाता रहा। संपूर्ण गीत में छह छंद हैं, जिन्हें अब संसद के जरिए सांगोपांग गाना कानूनन अनिवार्य कर दिया गया है। गुलामी का वह दौर अब एक ‘अतीत’ है, लिहाजा तब की व्यवस्थाओं में संशोधन करना अपरिहार्य है। वह संसद में किया गया है। कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत को बाधित क्यों किया गया, अनुशासन का उल्लंघन क्यों किया गया, यह खुद कांग्रेस के तीनों शीर्ष नेता ही स्पष्ट कर सकते हैं। बेशक खडग़े 85 साल की उम्र में हैं, सोनिया गांधी भी 80 साल की हो चुकी हैं, यदि किसी कुर्सी अथवा पानी की जरूरत थी, तो उसका पहले से ही बंदोबस्त किया जा सकता था। खडग़े संसद और बाहर खड़े होकर लंबे भाषण देते रहे हैं। फिर राष्ट्रगीत के दौरान ही हलचल क्यों जरूरी थी? उधर कांग्रेस का दावा है कि उसके हर अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया जाता रहा है। उसका कहना है कि छात्रों के आंदोलन से देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए भाजपा इस मसले पर राजनीति कर रही है।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button