लेख

अप्रकाशित किताब…

प्रकाशित संदर्भों से लेकर संविधान की पुस्तक तक झोल हो सकता है, लेकिन अप्रकाशित किताबों की किसी भी संभावना से देश खौफजदा है। पता नहीं कौन कब क्या लिख दे। वैसे हर किसी इनसान के पास होते हैं कई अप्रकाशित पन्ने, जिन्हें ताउम्र बचाता है, छुपाता है। यह विमर्श का विषय है कि क्या कोई प्रकाशक लिखने को प्रेरित कर पाया या लेखकों ने लिख-लिख कर कई प्रकाशक बना दिए। जरूरी नहीं कि लिखे को पढ़ा जाए, लेकिन जो अनलिखे को भी पढ़ ले, उसे मजमून कहते हैं। मजमून सफल प्रकाशन की विधा नहीं, पता नहीं कब कौनसा कतरा बड़ा हो जाए। जिस तरह अनकहे सवाल कई बार ज्यादा समझे जाते हैं, उसी तरह अनछपे अध्याय भी कयामत रखते हैं। आश्चर्य यह कि जिसे प्रकाशन माना जाता है, वह पढऩे लायक होता नहीं, लेकिन पढऩे-लिखने के विषय अप्रकाशय हो गए हैं। उसने उम्मीदों से बाहर जाकर एक किताब की पांडुलिपि तैयार की। वह न लेखक था और न ही साहित्यकार। कहानीकार तो बिल्कुल नहीं। वह पहलवान था। कुश्तियां लड़ता था। देश-विदेश के कई पहलवान पटके थे। कई दंगल, कई मैडल जीते, लेकिन हर बार हड्डियां टूटीं। पहलवान की हर सफलता के पीछे किसी न किसी हड्डी का टूटना अच्छा शगुन माना जाता है। पता नहीं महाभारत में कितनी हड्डियां टूटी थीं, मगर आज तो कई लोग दूसरों की हड्डियों के पीछे पड़े हैं। हर किसी को हड्डी चाहिए। दूसरी ओर ताज्जुब यह कि रीढ़विहीन लोग आजकल दूसरों की हड्डियां तोडऩे को आमादा रहते हैं। हमारे पहलवान की किताब दरअसल हड्डियों पर ही थी। अपनी हड्डियां तुड़वा तुड़वा कर वह हड्डी विशेषज्ञ की तरह लोगों की भी चैक कर लेता था। किसी हड्डी में कितना दर्द है, वह जान चुका था। वह डाक्टर नहीं था, फिर भी उसे इतनी समझ तो थी कि अकसर हड्डियां चटकती कहां और क्यों। अब तो वह रीढ़ को हड्डी मानता ही नहीं, क्योंकि यह बिना टूटे ही बता देती है कि इसकी जरूरत खत्म हो रही है।

उसने सबसे ज्यादा हड्डियों के ढेर देश की राजधानी में देखे। कितनी फिसलन है दिल्ली में। लोग सत्ता के गलियारों में, ब्यूरोक्रेसी की गलियों और संसद के पथ पर देखते-देखते फिसल जाते हैं। चारों तरफ रीढ़विहीन दूसरों की हड्डियां तोड़ रहे। उसे याद है जब वह पहली बार हड्डी टूटने पर निजी अस्पताल गया था। मशहूर अस्पताल में उसे उम्मीद थी कि उसकी हड्डियां मजबूत हो जाएंगी, लेकिन डाक्टर ने टूटी हड्डी के बदले कैसे उससे मजबूत हड्डी मांग ली थी। वह इसके खिलाफ अदालत गया, तो पहले वकील ने फीस में हड्डी मांग ली, फिर समूची न्याय व्यवस्था ने किसी न किसी तरह हड्डियां टटोल लीं। बिना हड्डी के जज साहिब ने फैसला दे किया था, ‘तुम हड्डियों के काबिल ही नहीं हो। गनीमत यह रही कि जज ने फैसला सुरक्षित रखा, वरना हड्डी-पसली एक हो जाती।’ अब तक पहलवान को यकीन हो चुका था कि उसे अगर आगे बढऩा है, तो अपनी हड्डियों के टुकड़े जगह-जगह बांटने पड़ेंगे। उसने सारी उम्र लगा दी और रिटायरमेंट के बाद अपने अनुभवों को किताब का आकार दे दिया। अब मसला इसे प्रकाशित करवाने का था। वह प्रकाशकों के यहां चक्कर काटने लगा। हर प्रकाशक बदले में उसकी कोई न कोई हड्डी चाहता था। हैरान हुआ, ‘मैं जिंदगी भर टूटती रही हड्डियों पर किताब लिख पाया और ये इसे छापने के लिए भी हड्डियां मांग रहे हैं।’ अंतत: उसने किताबी वजन के बराबर अपनी हड्डियां तोल दीं, लेकिन प्रकाशक की शर्त तो रीढ़विहीन होने की थी, जो वह पूरी नहीं कर सका और इस तरह पहलवान के जीवन की पुस्तक अप्रकाशित ही रह गई।

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