केंद्रीय बजट, पर्वतीय राज्यों की अनदेखी

पर्वतीय राज्यों की आर्थिक विडंबनाओं तथा अति वन भूमि के अनुपयोगी आवरण के कारण जो आवश्यक, उदार व वांछित सहायता मिलती रही है, उस पर अब वित्तायोग की कुंडलियां सख्त होती जा रही हैं। नतीजतन हिमाचल पर कर्ज बोझ का भयावह आंकड़ा एक लाख करोड़ छूने को आतुर है। प्रदेश हरित राज्य बनने की कोशिश में पिछले एक साल से प्रयासरत है, लेकिन केंद्र के मोहल्ले में हमारे ये कदम पहुंच नहीं पा रहे।
अमूमन केंद्रीय बजट की धाक पर राज्य की मिन्नतें या डबल इंजन सरकार के चरित्र में नए पोशाक की अभिलाषा रहती है, लेकिन हिमाचल ने फिर राजनीतिक पाप कर लिए। कम से कम यह तो महसूस नहीं हुआ कि हिमाचल ने अपने चारों सांसदों को केंद्र की गठबंधन सरकार को सौंप दिया है। बजट की सारी शेखियां और उम्मीदें गठबंधन धर्म में शरीक होकर आंध्र और बिहार की तश्तरियों में जो परोस रही हैं, वह कहां सामान्य तौर पर हमें मिलेगा। अचानक आंध्र प्रदेश पुनर्गठन एक्ट की धाराओं ने शहद में भीगना सीख लिया, जबकि पंजाब पुनर्गठन के कानूनी अधिकार आज भी हिमाचल की अर्थव्यवस्था को गौण कर रहे हैं। बजट पूर्व मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा और मुलाकातों के केंद्रबिंदु में रखे गए सारे तर्क पुन: पस्त हो गए। वहां हिमाचल का पानी, हिमाचल की जवानी नहीं, बल्कि पर्यावरण व देश के प्रति वफादारी भी पूरी तरह नजरअंदाज हुई है। यह दीगर है कि कहने को हिमाचल का नाम बजट की आपदा में लिपट कर आ गया, जब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आश्वासन दिया कि पिछले नुक्सान के नए मजमून दुरुस्त होंगे। सहायता के आश्वासन और भी ढूंढे जा सकते हैं, जहां केंद्रीय योजनाओं में आबंटन होगा। मसलन कृषि, जनजातीय गांव, वैकल्पिक ऊर्जा, आवासीय व्यवस्था और सौ साप्ताहिक हाट में कुछ तो रहा होगा, लेकिन केंद्रीय आश्वासन में पर्यटन जैसा क्षेत्र हिमाचल के लिए खामोश है।
जाहिर है गठबंधन के प्रेम में बिहार का पर्यटन जीत रहा है, वरना कांगड़ा एयरपोर्ट विस्तार की फाइल पर केंद्र सरकार का हाथ दिखाई देता। सरकार इस परियोजना के भू-अधिग्रहण के लिए केंद्र से 3500 करोड़ की फरियाद कर रही है, लेकिन खामोशियां अटूट बाधाएं बनकर तनी हैं। पर्वतीय राज्यों की आर्थिक विडंबनाओं तथा अति वन भूमि के अनुपयोगी आवरण के कारण जो आवश्यक, उदार व वांछित सहायता मिलती रही है, उस पर अब वित्तायोग की कुंडलियां सख्त होती जा रही हैं। नतीजतन हिमाचल पर कर्ज बोझ का भयावह आंकड़ा एक लाख करोड़ छूने को आतुर है। प्रदेश हरित राज्य बनने की कोशिश में पिछले एक साल से प्रयासरत है, लेकिन केंद्र के मोहल्ले में हमारे ये कदम पहुंच नहीं पा रहे। इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद तथा चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना के लिए सस्ती दरों पर ऋण या पर्यावरणीय सुरक्षा के एवज में ग्रांट मिलती तो राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल की आपत्तियों का समाधान भी निकल आता। प्रदेश सौर ऊर्जा के बड़े प्लांट व रूफटॉप सोलर एनर्जी के विकल्प में आगे बढऩा चाहता है, लेकिन यह हसरत केंद्र की मदद से ही पूरी होगी। जगत प्रकाश नड्डा के विभाग और अनुराग ठाकुर के प्रचार से निकली कई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं की राह पर अभी अंधेरा ही दिखाई दे रहा है। खास तौर पर ऊना-हमीरपुर रेल परियोजना के ढोलक अब तक के तमाम बजटों की तरह, इस बार भी उदास हैं।
दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर पर्वतीय राज्यों की भौगोलिक व आर्थिक स्थिति का सही-सही मूल्यांकन करने के लिए एक स्वतंत्र पर्वतीय विकास मंत्रालय की आवश्यकता के पैरोकार ही पैदा नहीं हुए और हम सियासत के किनारे बनकर भी डूबते रहे भ्रम के समुद्र में। कहने को प्रधानमंत्रियों के साथ हमारे दिल के रिश्ते रहे हैं, लेकिन केवल एक बार औद्योगिक पैकेज के अदाकार अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा कभी सपने साकार नहीं हुए। एक अदद कनेक्टिविटी या पर्यटन पैकेज से हिमाचल अपने आर्थिक जख्म ठीक कर सकता था, लेकिन इस बार तो कहने को भी कोई आशा नहीं। यह दीगर है कि मध्यमवर्गीय हिमाचल आयकर के नए फार्मूले में कोई सुकून ढंूंढ ले या इंटर्नशिप के लिफाफे को देखकर पढ़ा-लिखा बेरोजगार लाभार्थी बन जाए।



