लेख

शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी चिंताजनक…

शैक्षणिक संस्थानों की संख्या में वृद्धि के कारण गुणात्मक शिक्षा और प्रशिक्षण में गिरावट आई है, क्योंकि कई संस्थानों में उचित मान्यता और संकाय की कमी है। उदाहरण के लिए कई कॉलेज घटिया शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्नातक बेरोजगार हो जाते हैं। शिक्षित युवाओं में उच्च बेरोजगारी दर की समस्या का समाधान करने के लिए, भारत को कौशल विकास को बढ़ावा देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना होगा, श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा देना होगा, उद्यमशीलता का समर्थन करना होगा…

हाल ही में आई एक उच्च शिक्षा की रिपोर्ट के अनुसार देश में युवा स्नातकों के लिए बेरोजगारी दर 40 फीसदी तक पहुंच गई है। रिपोर्ट बताती है कि 20 से 29 आयु वर्ग के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं और केवल 7 फीसदी को ही स्नातक होने के एक साल के भीतर स्थायी नौकरी मिल पाती है। देश में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं और स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर बहुत कम लोगों को ही निश्चित वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ में पाया गया कि बेरोजगार के रूप में पंजीकरण कराने के एक वर्ष के भीतर केवल करीब सात प्रतिशत स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि स्नातक बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है। 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में 20 प्रतिशत है। आंकड़ों के अनुसार स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर केवल एक छोटा हिस्सा ही स्थायी वेतन वाली नौकरी हासिल कर पाता है। हाल के वर्षों में स्नातकों की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और बढ़ गई है। पिछले कुछ दशकों में युवा आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर भी बढ़ी है जिससे युवा स्नातकों की कुल संख्या में वृद्धि हुई है। इस स्थिति से उच्च बेरोजगारी दर के साथ बेरोजगार स्नातकों की संख्या भी बढ़ गई है। 2023 तक 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार थे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत ने शिक्षा से जुड़े कई अंतर को पाटने में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात भारत के विकास स्तर के अनुरूप है। शिक्षा तक पहुंच में लडक़ा-लडक़ी और जाति आधारित सामाजिक-आर्थिक बाधाएं कम हुई हैं, हालांकि इसके साथ रोजगार में प्रभावी बदलाव नहीं हुआ है।

पिछले चार दशक में युवाओं की शिक्षा के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी खास तौर पर बढ़ी है। हालांकि पुरुषों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है। यह 2017 के 38 प्रतिशत से घटकर 2024 के अंत तक 34 प्रतिशत रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष अपने परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए कमाने के अवसर तलाशने लगते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है। प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढक़र 2021 में 45 हो गई, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है। इसके बावजूद क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं और शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। निर्धारित मानकों के मुकाबले निजी और सरकारी कॉलेजों में शिक्षक-छात्र अनुपात काफी अधिक है। यह भी कहा गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ खासकर निजी संस्थानों में गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं। उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ प्रतिशत से बढक़र 2017 में 15 प्रतिशत हो गई है, लेकिन आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं। महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों, मसलन इंजीनियरिंग व मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक रहती है। आज पहले से अधिक युवा शिक्षित और जागरूक हैं और वे कुछ करने के इच्छुक हैं, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। देश में युवाओं (15-29 वर्ष) की उच्च शिक्षा तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, रोजगार से जुड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। स्नातक युवाओं को आय के मामले में लाभ मिलता है और उनकी शुरुआती कमाई गैर-स्नातकों के मुकाबले लगभग दोगुनी होती है।

इसके बावजूद 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के वेतन में वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है। इसमें सामने आया कि युवा तेजी से कृषि क्षेत्र से हटकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। आज शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी एक गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है। आज का युवा, जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बेरोजगारी के संकट का सामना कर रहा है, यह समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक चुनौती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कई बार शिक्षा प्रणाली ऐसे कौशल नहीं सिखाती जो नौकरी के बाजार की मांग के अनुसार हों। सैद्धांतिक ज्ञान अधिक होता है, जबकि व्यावहारिक अनुभव की कमी होती है। आर्थिक विकास की गति धीमी होने के कारण कंपनियां नई भर्ती कम कर देती हैं। वैश्विक आर्थिक संकट भी इस पर असर डालता है। ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग के कारण कुछ क्षेत्रों में नौकरियां कम हो रही हैं, जबकि नए तकनीकी क्षेत्रों में कौशल की आवश्यकता है। कुछ युवा उच्च वेतन वाली नौकरियों की उम्मीद में होते हैं और छोटे पैमाने की नौकरियों को स्वीकार नहीं करना चाहते, जिससे बेरोजगारी की स्थिति बनती है। सरकारी नीतियां और समर्थन : कभी-कभी सरकार की नीतियां रोजगार सृजन में प्रभावी नहीं होतीं या उनका क्रियान्वयन कमजोर होता है। सुझाव है कि शिक्षा प्रणाली में बदलाव कर व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को शामिल करना चाहिए, उद्यमिता को बढ़ावा देना और स्टार्टअप्स के लिए समर्थन देना आवश्यक है। युवा को कौशल विकास कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। राज्य सरकारों को रोजगार सृजन के लिए प्रभावी नीतियां बनानी चाहिए। भारत में युवा बेरोजगारी चिंताजनक रूप से उच्च बनी हुई है, जिसमें शिक्षित युवा, बेरोजगार कार्यबल का 83 फीसदी हिस्सा हैं।

स्नातकों और डिप्लोमा धारकों की बढ़ती संख्या के बावजूद यह कठोर वास्तविकता बनी हुई है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों के बीच का अंतर एक महत्वपूर्ण बेमेल को उजागर करता है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। शैक्षणिक संस्थानों की संख्या में वृद्धि के कारण गुणात्मक शिक्षा और प्रशिक्षण में गिरावट आई है, क्योंकि कई संस्थानों में उचित मान्यता और संकाय की कमी है। उदाहरण के लिए कई कॉलेज घटिया शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्नातक बेरोजगार हो जाते हैं। शिक्षित युवाओं में उच्च बेरोजगारी दर की समस्या का समाधान करने के लिए, भारत को कौशल विकास को बढ़ावा देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना होगा, श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा देना होगा, उद्यमशीलता का समर्थन करना होगा और लैंगिक असमानताओं को दूर करना होगा। इन समाधानों को लागू करने से भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को आर्थिक विकास के एक शक्तिशाली इंजन में बदल पाना जरूरी है जिससे शिक्षित युवाओं के लिए एक उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित होगा और एक अधिक समावेशी और मजबूत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।-डा. वरिंद्र भाटिया

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