दो लक्ष्य असाध्य, ‘विकसित’ देश अभी सपना है

दो लक्ष्य फिलहाल असाध्य लगते हैं। एक, देश की प्रति व्यक्ति आय 15 लाख रुपए सालाना तक पहुंचाना। दूसरा, ‘गरीबी मुक्त गांव’ बनाना। यानी जिस गांव में कोई गरीब न हो और गरीबी के हालात भी न हों। फिलहाल देश की प्रति व्यक्ति आय औसतन 2 लाख रुपए सालाना है। कुछ 1.75 लाख रुपए के करीब मानते हैं। यानी 7-8 गुना आमदनी बढ़ानी होगी। इन्ही दो लक्ष्यों के कारण 2047 तक भारत को ‘विकसित देश’ के रूप में देखना फिलहाल एक सुखद सपना है।
किसी वर्ग के लिए यह संकल्प और महत्वाकांक्षा भी है। कोई स्वतंत्र देश 100 साल में ही ‘विकसित’ श्रेणी में आ जाए, यह बेहद दुर्लभ लक्ष्य है। लक्ष्य दुर्लभ ही हुआ करते हैं। यह अभियान प्रधानमंत्री मोदी ने ही शुरू किया था और उसे निरंतर भी बनाए रखा। अब तो नीति आयोग के स्तर पर ‘दृष्टिकोण पत्र’ भी बना लिया गया है। उसमें दो लक्ष्य फिलहाल असाध्य लगते हैं। एक, देश की प्रति व्यक्ति आय 15 लाख रुपए सालाना तक पहुंचाना। दूसरा, ‘गरीबी मुक्त गांव’ बनाना। यानी जिस गांव में कोई गरीब न हो और गरीबी के हालात भी न हों। फिलहाल देश की प्रति व्यक्ति आय औसतन 2 लाख रुपए सालाना है। कुछ 1.75 लाख रुपए के करीब मानते हैं। यानी 7-8 गुना आमदनी बढ़ानी होगी। आकलन है कि 2047 तक देश की जीडीपी 30 ट्रिलियन डॉलर होनी चाहिए। फिलहाल भारत की जीडीपी करीब 3.75 ट्रिलियन डॉलर है। यानी 8-9 गुना जीडीपी बढ़ानी होगी। यह उस देश के संदर्भ में असंभव-सा लगता है, जिसके 80 करोड़ से अधिक लोगों को ‘मुफ्त अन्न’ बांटा जा रहा है। जहां अब भी 20-22 करोड़ लोग गरीबी-रेखा के तले जीने को अभिशप्त हैं। यह संभव हो सकता है कि अंबानी, अडानी सरीखे उद्योगपतियों की आय के आधार पर जीडीपी का आकलन किया जाए। अधिकांश भारतीय गरीब हैं अथवा निम्न मध्यवर्गीय हैं। उनकी आमदनी ‘कुबेरपतियों’ की आय के किसी विशेष मद के मद्देनजर मान ली जाए। भारत की आर्थिक असमानता बेनकाब न हो और 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य भी हासिल कर लिया जाए। दरअसल भारत का गांव आज भी जर्जर और बेहाल है। कुछ गांवों को चमका दिया जाता है, लेकिन उस ‘चमकदार परत’ के नीचे का यथार्थ क्या है, शायद नीति आयोग भी नहीं जानता। ‘दृष्टिकोण पत्र’ में उल्लेख किया गया है कि गरीबी मिटाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिल कर 24 घंटे 7 दिन शुद्ध पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली की उपलब्धता पर काम करें।
युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने और उद्यमी बनाने के लिए उन्हें कौशल विकास के प्रशिक्षण देने सहित अन्य कदम उठाए जाएं। हमारी सलाह है कि प्रधानमंत्री, उनकी सरकार, सत्तारूढ़ी मुख्यमंत्री और नीति आयोग की अलग-अलग गंभीर समितियां बनाई जाएं। वे आम आदमी की तरह राजधानी दिल्ली के ही ग्रामीण और गरीब इलाकों के सर्वेक्षण कर लें। देश का यथार्थ सामने आ जाएगा कि ‘विकसित’ वाला दर्जा हासिल करना कितनी दूर है? बेशक पंजाब के 97 फीसदी से ज्यादा घरों तक पेयजल उपलब्ध है और इस संदर्भ में वह प्रथम स्थान पर है, लेकिन 33.5 फीसदी पेयजल की स्थिति के साथ बिहार सबसे नीचे है। 2022 में भारत में 61.5 फीसदी ग्रामीण आबादी को पाइप जल आपूर्ति के जरिए अपेक्षाकृत सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल मिल रहा था। आज कुछ स्थिति सुधरी होगी! नीति आयोग ने भी इसी गर्मियों में, राजधानी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में, पानी के लिए तरसती, लड़ती और आक्रोशित आबादी को देखा होगा! देश के पिछड़े, अनधिकृत और गरीब इलाकों में सामान्य पानी की उपलब्धता की कल्पना की जा सकती है। देश के जीडीपी का कितना फीसदी हिस्सा भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जा रहा है, नीति आयोग केवल बजट के आवंटनों को ही देख ले। ‘दृष्टिकोण पत्र’ में ‘विकसित भारत’ के सामाजिक संकेतकों का भी आकलन किया गया है। मसलन-2047 में भारतीयों की औसत आयु 84 साल होगी। अभी यह उम्र 71 साल है। कुल प्रजनन दर तब गिर कर 1.8 रहनी चाहिए, जो अभी 2.03 है। इसके मायने ये नहीं हैं कि देश की आबादी कम होगी। हमारी आबादी तब 165 करोड़ के करीब होगी। उसमें 112 करोड़ लोग कामकाजी आयु वर्ग के होंगे। इतनी आबादी को रोजगार और नौकरी मुहैया कराने के संसाधन कितने होंगे, क्या इस पक्ष पर विचार किया जा रहा है? जिस तरह कुछ मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार किया, उससे सवाल उठते हैं कि केंद्र और राज्यों में सामंजस्य कैसे होगा, नीति क्रियान्वयन कैसे होगा व निवेश कैसे बढ़ेगा?



