नाबालिग लड़कियों की शादी का सच

जब भारत में 1929 में ही नाबालिग शादी को प्रतिबंधित किया जा चुका है। जाहिर है, कानून अपनी जगह रहा और समाज अपने ढंग से चलता रहा। हालांकि इस आधार पर कानूनी व्यवस्थाओं को निरर्थक नहीं करार दिया जा सकता। इसका उदाहरण असम है, जहां इसी रिपोर्ट के मुताबिक हालात में आश्चर्यजनक सुधार लाए जा चुके हैं। वहां 2021-22 में हुई नाबालिग लड़कियों की शादी की संख्या 3,225 थी, जो 2023-24 में घटकर 627 हो गई। यह कामयाबी कानून को सख्ती से लागू करने का परिणाम है।
इस बीच देश में हर साल होने वाली नाबालिग लड़कियों की शादी पर हाल में आई रिपोर्ट न केवल हैरान करती है बल्कि इस मुद्दे को गंभीरता से लेने और इस पर नए सिरे से काम करने की जरूरत भी रेखांकित करती है। अगर आजादी के आठवें दशक में भी देश में हर मिनट तीन नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है, तो यह स्थिति स्वीकार करने लायक नहीं हो सकती।
ये आंकड़े चुभने स्वाभाविक हैं। लेकिन ज्यादा चिंता की बात यह है कि हमने जाने-अनजाने इस सचाई पर परदा पड़े रहने का इंतजाम कर दिया था। चाहे नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट हो या समय-समय पर सरकार की ओर से जारी किए जाने वाले अन्य आंकड़े, कोई भी ठीक-ठीक यह नहीं बताता कि हर साल कितनी नाबालिग लड़कियों को गैरकानूनी ढंग से शादी के बंधन में डाल दिया जाता है।
ऐसा भी नहीं कि ये आंकड़े इस मामले में पूरी तरह चुप्पी बनाए रखते हैं। मिसाल के तौर पर NCRB की बात करें तो यह 2018 से 2022 के बीच 3,863 नाबालिग शादी दर्ज होने की सूचना देता है। यह संख्या हकीकत से कितनी दूर है इसका अहसास तब हुआ जब सिविल सोसाइटी संगठनों के नेटवर्क ‘चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया’ से जुड़ी रिसर्च टीम ‘इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन’ ने 2011 की जनगणना से जुड़े आंकड़ों के साथ NCRB और नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019-21) की सूचनाओं को मिलाकर उनका विश्लेषण किया। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 16 लाख नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है।
यह स्थिति तब है जब भारत में 1929 में ही नाबालिग शादी को प्रतिबंधित किया जा चुका है। जाहिर है, कानून अपनी जगह रहा और समाज अपने ढंग से चलता रहा। हालांकि इस आधार पर कानूनी व्यवस्थाओं को निरर्थक नहीं करार दिया जा सकता। इसका उदाहरण असम है, जहां इसी रिपोर्ट के मुताबिक हालात में आश्चर्यजनक सुधार लाए जा चुके हैं। वहां 2021-22 में हुई नाबालिग लड़कियों की शादी की संख्या 3,225 थी, जो 2023-24 में घटकर 627 हो गई। यह कामयाबी कानून को सख्ती से लागू करने का परिणाम है।
असम की कामयाबी का मतलब यह नहीं कि हर मामले में समाज को कानून के डंडे से हांका जा सकता है या हांका जाना चाहिए। फिर भी याद रखना जरूरी है कि नाबालिग लड़कियों की शादी पर प्रभावी रोक न केवल मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी ला सकती है बल्कि लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और जेंडर इक्वलिटी हासिल करने में भी मदद कर सकती है। जाहिर है, सरकारी तंत्र और सिविल सोसाइटी को साथ मिलकर इस लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने में देर नहीं करनी चाहिए।



