संपादकीय

ट्रंप का विचित्र रवैया, भारत के लिए कूटनीतिक कौशल दिखाने का समय

 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ और अपने मित्र देशों के नेताओं तथा अर्थशास्त्रियों के तर्कों को दरकिनार कर पहले भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया और फिर रूस से तेल खरीदने को तूल देकर और इतने ही प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। अब उन्होंने भारत के साथ होने वाली व्यापार वार्ता से किनारा करने की भी बात कह दी। इस वार्ता के लिए एक अमेरिकी दल इसी माह के अंत में दिल्ली आने वाला था।

ट्रंप की चिढ़ का मूल कारण भारत-पाकिस्तान के बीच तथाकथित संघर्ष विराम कराने के उनके दावे पर भारत का सहमत न होना है। वे अपने इस फर्जी दावे को कई बार दोहरा चुके हैं कि आपरेशन सिंदूर इसलिए थमा, क्योंकि उन्होंने दखल दिया था और दोनों देशों को एक बड़े युद्ध से बचाया था। भारत उनके दावे को सही नहीं मान रहा।

प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में साफ कर दिया कि आपरेशन सिंदूर रोकने के बारे में विश्व के किसी भी नेता ने कुछ नहीं कहा। इसके बाद ट्रंप और अधिक बौखला गए और अब वे भारत के खिलाफ न केवल टैरिफ बढ़ाते जा रहे हैं, बल्कि वर्षों की मेहनत से बनाए गए दोनों देशों के संबंधों को नष्ट करने का भी काम कर रहे हैं। उनके दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी वाशिंगटन गए थे तो दोनों नेताओं ने यह तय किया था कि एक अंतरिम व्यापार समझौता शीघ्र कर लिया जाएगा, लेकिन अब भारत से चिढ़े हुए ट्रंप पाकिस्तान की तारीफ कर रहे हैं।

उन्होंने भारत को चिढ़ाने के मकसद से ही पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर को अमेरिका बुलाकर भोज कराया और उनकी तारीफ भी की। इसके बदले में मुनीर ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की जरूरत जताई। पता नहीं उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलेगा या नहीं, लेकिन यह साफ है कि वे यह पुरस्कार पाने के लिए कुछ ज्यादा ही बेचैन हैं। इसका एक प्रमाण यह है कि वे विभिन्न देशों के छोटे-बड़े टकराव को रोकने के लिए मध्यस्थता करते रहते हैं। वे अपने को शांति का मसीहा साबित करने पर तुले हैं, लेकिन सब जानते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने में नाकाम हैं।

ट्रंप अपनी खीझ निकालने के लिए यह कह रहे हैं कि भारत रूस से तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध में रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मदद कर रहा है। ट्रंप भारत को टैरिफ किंग बताकर अपनी शर्तों के हिसाब से व्यापार समझौता करना चाहते हैं और दबाव बनाने के लिए रूस से तेल खरीद को तूल देने में लगे हुए हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए कि रूस भारत को तेल बेचे बगैर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रख सकता है, क्योंकि वह चीन के साथ अन्य देशों को भी तेल बेच रहा है और यह किसी से छिपा नहीं कि ट्रंप का चीन पर कोई जोर नहीं चल पा रहा है।

सच तो यह है कि जो ट्रंप भारत पर रूस से तेल खरीदने का आरोप लगा रहे हैं, वे यह नहीं देखना चाहते कि खुद अमेरिका उससे यूरेनियम और उर्वरक खरीद रहा है। इसके अतिरिक्त तथ्य यह भी है कि यूरोपीय देश रूस से गैस खरीद रहे हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि ट्रंप के दोहरेपन को दुनिया के कई जाने-माने लोगों के साथ-साथ खुद उनके देश के लोग बेनकाब कर रहे हैं। ट्रंप की दोहरी नीतियों और मनमाने फैसलों से पूरा विश्व परेशान है। अब तो विश्व के प्रमुख देश इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि जैसे-तैसे ट्रंप के शेष कार्यकाल को झेलना पड़ेगा।

अभी ट्रंप ने फार्मा और आइटी कंपनियों को टैरिफ वार से मुक्त कर रखा है, लेकिन भारत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उनकी निगाहें इन कंपनियों पर टेढ़ी नहीं होंगी। मनमानापन दिखा रहे ट्रंप कुछ भी कर सकते हैं। अब तो यह भी स्पष्ट हो रहा है कि वे भारत की आर्थिक एवं सैन्य शक्ति बढ़ती हुई नहीं देखना चाहते और इसीलिए उस पाकिस्तान को पुचकार रहे हैं, जो अमेरिका को कई बार धोखा दे चुका है। ट्रंप के विचित्र रवैये को देखते हुए भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपने कूटनीतिक कौशल के जरिये उनसे पार पाने की और कारगर रणनीति बनाए।

अच्छा होता कि भारत दूसरी बार राष्ट्रपति बने ट्रंप के बदले रवैये को देखते हुए कूटनीतिक चतुराई दिखाता और उनके अहं को तुष्ट करने के बारे में सोचता। तब शायद ट्रंप इतना गर्जन-तर्जन नहीं कर रहे होते और अमेरिका से अंतरिम व्यापार समझौता भी हो गया होता। इस पर विचार होना चाहिए कि क्या ट्रंप के मामले में आवश्यक कूटनीतिक चतुराई नहीं दिखाई जा सकी? अब तो कूटनीतिक कौशल पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके साथ ही भारत को अपने उद्योगों की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने पर भी जोर देना होगा।

ट्रंप के भारत विरोधी रवैये ने हमारे समक्ष एक अवसर खड़ा कर दिया है। आगे चलकर ट्रंप के टैरिफ युद्ध की चपेट में कुछ और देश भी आ सकते हैं। जो भी हो, भारत के लिए यही उचित है कि वह यह स्पष्ट करता रहे कि वह उनके आगे नहीं झुकेगा। ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिका के कृषि और डेरी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोल दे। इसके लिए मोदी सरकार बिल्कुल भी तैयार नहीं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी कि भारत अपने किसानों, मछुआरों और डेरी उत्पादकों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इन वर्गों के हितों की रक्षा के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोई कीमत चुकानी पड़ी, तो वे इसके लिए तैयार हैं। यह साफ नहीं कि व्यक्तिगत नुकसान से उनका आशय क्या है, लेकिन इसकी अनदेखी न की जाए कि अमेरिका दूसरे देशों के चुनावों में दखल देता रहा है। अमेरिका से सावधान रहने के साथ भारत को अपने किसानों के हितों की रक्षा करनी होगी और इस पर भी ध्यान देना होगा कि भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए? इस मामले में सबसे बड़ी विडंबना कुछ किसान नेताओं का किसान हित विरोधी रवैया है। वे जानबूझकर कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण में रोड़ा अटका रहे हैं।

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