राजनीति

कथित फर्जी बाबाओं का जाल

देश में गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव के कारण कथित फर्जी बाबाओं की दुकान अच्छा फलफूल रहा है। सरकारों के पास लोगों की इन समस्याओं का इलाज नहीं है। ऐसे में बाबा बरगला कर लोगों से अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। इनमें भी खास बात यह है कि भगदड़ जैसे हादसों में मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग होते हैं…

हाथरस में एक सत्संग समारोह में हुआ, दर्दनाक हादसा बताता। दरअसल धार्मिक आयोजन में अव्यवस्था या फर्जी बाबाओं की हेराफेरी तक सीमित नहीं है यह घटनाक्रम। यह हादसा देश के विकास की तस्वीर की हकीकत भी बयान करता है। हाथरस में भगदड़ में मरने वालों में ज्यादातर दलित और गरीब तबके के लोग शामिल हैं। पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं, घरेलू समस्या और रोजगार नहीं मिलने से होने वाली परेशानियों का समाधान फर्जी बाबाओं के जरिए तलाश किया जाता है। सरकारी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का दमन देश के पिछड़े तबके लिए कोढ़ में खाज साबित हुआ है। इस हालत ने देश में फर्जी बाबाओं को पनपने का मौका दिया है। ज्यादातर बाबाओं की पृष्ठभूमि भी गरीब तबके की रही है। इसी का फायदा जालसाजी करके बाबाओं ने उठाया है। आम लोगों की दुख-तकलीफ जब शासन-प्रशासन से दूर नहीं हो पाती, तब उन्हें लगता है कि चमत्कारिक ढंग से बाबा इसे दूर कर सकते हैं, क्योंकि स्वयंभू बाबा दैवीय शक्तियों की सिद्धियां प्राप्त करने का दुष्प्रचार करते रहे हैं। ऐसे मिथ्या और कपटी प्रचार से बाबा दुखी लोगों को आकर्षित करने में कामयाब हो जाते हैं। पर्याप्त प्रचार के बाद जब भक्तों की संख्या हजारों में हो जाती है, तब बाबाओं की तरफ कोई निगाह उठा कर भी नहीं देख सकता। भक्तों की फौज के दम पर बाबा हर तरह की गैर कानूनी हरकतें करने से बाज नहीं आते।

इस देश में लोगों की हालत की दारुण हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2001 में जयराम दास उर्फ रामजी बाबा को पुलिस ने अपनी एक शिष्या सुधा शर्मा की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ से पता चला कि बाबा अपने दरबार में आने वाली खास तौर से निस्संतान औरतों को संतान के नाम पर दुष्कर्म करता था। इस बाबा ने सैकड़ों औरतों से दुष्कर्म किया। बाबा के झांसे का शिकार हुई ज्यादातर औरतें ओबीसी वर्ग से थी। पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलने और घरेलू समस्याओं से जूझती अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी औरतों को गिरफ्तारी के बाद बाबा के कांडों की जानकारी मिल गई। इसके बावजूद अस्पताल में भर्ती बाबा से मिलने के लिए ऐसी औरतों का मेला लग गया। यह स्थिति बताती है कि जागरूकता और आधुनिक तो दूर, सामान्य सुविधाएं भी आम लोगों से काफी दूर हैं। ऐसी ही हालत का फायदा देश में दूसरे बाबा भी उठाते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि शासन-प्रशासन को इनकी गैरकानूनी हरकतों और भक्ति की आड़ में लोगों से अपना उल्लू सीधा करने की जानकारी नहीं होती। ज्यादातर मामलों में नेता और अफसर ही इन बाबाओं के समक्ष हाथ जोड़े खड़े होते हैं। ऐसे में किसी की क्या मजाल फर्जीवाड़े और अपराधों की जानकारी होने के बावजूद बाबाओं का कोई कुछ बिगाड़ सके। बाबाओं के पिछलग्गु भक्तों के रैले से सारे नेता सहमे रहते हैं। डर वोट बैंक का होता है। अफसर ऐसे बाबाओं की आपराधिक कुंडली मौजूद होने के बावजूद कार्रवाई करने से कतराते हैं। उन्हें नेताओं का डर लगा रहता है और नेताओं को बाबाओं का, क्योंकि बाबाओं के पास भक्तों के हुजूम के तौर पर उन्हें वोट बैंक नजर आता है।

बाबाओं से नाराजगी लेने का मतलब है वोट बैंक को नाराज करना। यही वजह रही हाथरस कांड में 116 लोगों की मौत के बावजूद हरि सरकार उर्फ भोले बाबा का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं किया गया। बाबा के सेवादारों के नाम दर्ज किए गए। पुलिस जब तक मजूबर न हो जाए, बाबाओं के कारनामों पर कार्रवाई करने से कतराती रहती है। ऐसे मामलों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जब अपराधों की जानकारी होने के बावजूद पुलिस के बाबाओं के खिलाफ कार्रवाई करने में हौसले पस्त हो गए। आसाराम ने अपने धर्म की दुकान गुजरात के अहमदाबाद से शुरू की। धर्म का सहारा लेकर इन्होंने अरबों का साम्राज्य खड़ा किया है। साल 2013 से यह नाबालिग शिष्या से रेप के आरोप में जेल में बंद हैं। इन पर आरोप है कि यह आशीर्वाद देने के नाम पर नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण और बलात्कार करते थे। हालांकि अब तक इन पर आरोप सिद्ध नहीं हो पाया है। नाबालिग शिष्या से रेप के आरोप में आसाराम जोधपुर जेल में बंद हैं। इसी तरह खुद को देवी बताने वाली सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां का विवादों से पुराना नाता रहा है। यह भक्तों की गोद में बैठने तक के पैसे लेती हैं। चार अप्रैल 1965 में पंजाब के जिले गुरदासपुर के दोरंगला गांव में जन्मीं सुखविंदर कौर पति की खराब आर्थिक हालत के चलते मुंबई में दूसरों के घरों में काम करती थीं। महज 10वीं तक पढ़ी राधे मां की 17 साल उम्र में शादी हुई थी। कुछ साल पहले इन्होंने खुद को महंत घोषित कर दिया था। इन पर खुदकुशी के लिए उकसाने जैसे गंभीर मामले चल रहे हैं।

सिरसा के डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम हाल ही में हत्या के मामले में सजा पाए हैं। 15 अगस्त 1967 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे राम रहीम 1990 में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बने। यह खुद को रॉकस्टार बाबा के रूप में प्रस्तुत करते रहे। इन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया है। पत्रकार और सेवादार की हत्या के आरोप में गुरमीत जेल में हैं। रियलिटी शो बिग बॉस में अपनी बेहूदा हरकतों के चलते ओम बाबा सुर्खियों में आए। टाडा आम्र्स एक्ट केस के चलते ओमजी स्वामी पांच साल जेल में सजा काट चुके हैं। साल 1972 में उन्होंने साधु का रूप धारण किया। इन पर चोरी, ठगी जैसे आरोप हैं। टीवी चैनलों पर निर्मल बाबा काफी लोकप्रिय रहे। ये ऊटपटांग उपाय बताकर लोगों की समस्याएं सुलझाने का दावा करते थे। निर्मल बाबा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके हैं और इन पर आय से अधिक संपत्ति समेत कई मामले दर्ज हैं। निर्मल बाबा कहते हैं कि उनकी संस्था के बैंक खाते में पैसे जमा कराने से दुख दूर होते हैं। मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली के रहने वाले असीमानंद का असली नाम नब कुमार है।

वह 1990 से 2007 के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी संस्था वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत प्रचारक प्रमुख रहे। यह अजमेर दरगाह में 2007 में हुए विस्फोट मामले में आरोपी रहे। स्वामी असीमानंद को अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामलों में 19 नवंबर 2010 को उत्तराखंड के हरिद्वार से गिरफ्तार किया गया था। देश में गरीबी, बेरोजगारी होने और सार्वजनिक सुविधाओं व पर्याप्त शिक्षा का अभाव ऐसे फर्जी बाबाओं की दुकान चलाने के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। सरकारों के पास लोगों की इन समस्याओं का इलाज नहीं है। ऐसे में बाबा बरगला कर लोगों से अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। इनमें भी खास बात यह है कि भगदड़ जैसे हादसों में मरने वाले ज्यादातर गरीब और वंचित तबके के लोग होते हैं। उन्हें लगता है कि बाबा के पास जादू की छड़ी है, जिससे उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा। इसके विपरीत बाबा धार्मिक आस्था के नाम पर न सिर्फ खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि गैरकानूनी धंधों में भी लिप्त हैं। शासन और प्रशासन पर इनके भारी रसूख का प्रभाव होने के चलते इनके खिलाफ तब तक कार्रवाई नहीं होती, जब तक पानी सिर से न गुजर जाए।

योगेंद्र योगी

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