अस्थिर राजनीति की ओर

जिस प्रदेश में बार-बार उपचुनाव होने लगें और जहां विधानसभा की सदस्यता अदालत से विधानसभा अध्यक्ष की कचहरी तक नाच करे, वहां सामान्य परिस्थितियां नहीं हैं। हिमाचल अब तक अपनी सियासत की मजबूती, सहनशीलता, जवाबदेही, वचनबद्धता तथा दलगत संस्कृति के उच्च आयाम स्थापित करता रहा है, लेकिन अब जुबान, जिरह और जमीन बदल रही है। विधानसभा बार-बार बंट रही है और जनादेश भी सियासी बही खाते की अपंगता में शरीक हो रहा है। आप ऐसे तो न थे, आप यह कैसे हो गए, यह हिमाचल का मतदाता पूछ रहा है। वह कब तक सियासी जोर आजमाइश का मोहरा बना रहेगा। मात्र 68 सदस्यीय विधानसभा से नौ विधायकों की सदस्यता का खारिज होना, न प्रेरक है और न ही पूरक, बल्कि यह अस्थिरता रोग की निशानी दे गया। अब पुन: यही दस्तूर निर्दलीय विधायकों के कारण उपचुनाव की धौंकनी से अस्थिरता के अंगारों को हवा देगा। ये तमाम उपचुनाव दो पार्टियों के बीच का फासला नहीं, बल्कि सियासत का तियापांचा है जो सिर्फ अहंकार और स्वार्थ की मिट्टी से खेल रहा है। जब टुकड़े बंटने लगते हैं, तो क्या छोटा और क्या बड़ा, यहां सारा तमाशा, घात-प्रतिघात का है। कौन नेता, किसकी मुहर और किसकी बिकवाली से किसकी खता, सभी इस हमाम में नंगे हंै। लोगबाग पार्टियां बदल रहे हैं, क्योंकि पार्टियों में कब्जाधारी बदल रहे हैं। हिमाचल में सत्ता के जनक अपनी फौज और अपने युद्ध के मोर्चे तय कर रहे हैं। चुनावी राजनीति के फलक को तिरोहित करके जब सत्ता के लाभार्थी किसी भी गली-कूचे से सीधे सरकार के अलंकार बन जाएं, तो ये सीढिय़ां भी खेल तमाशा है। सियासत अब अनूठी कचहरी की तरह हमारे सामने सरकारें और सरकारों के तख्त परोसने लगी है। यहां जीत के प्रमाण से कहीं अधिक हार के तर्क हैं और इसलिए शक्तिशाली को हार कर भी जीत का ढिंढोरा पीट दे।
चार लोकसभा की सीटों से कहीं अधिक जोश उस जीत का है जो कांग्रेस के कुल छह विधायक गंवा कर चार नए चेहरे हासिल करने से पैदा हुआ। अब पुन: तीन उपचुनाव किसी के लिए बरसात-किसी के लिए सौगात, लेकिन इसके पीछे के हालात राजनीति में अस्थिरता का माहौल ही तो पैदा कर रहे हंै। अस्थिर राजनीति की परेशानी में जनता यह कैसे तय करे कि वह किसी को जीत दिला कर हार जाएगी या हरा कर परास्त होगी। क्या फर्क पड़ता कि कल के निर्दलीय आज के भाजपाई होकर चुनाव का शंखनाद करें या टोह लेती कांग्रेस कहीं आगे निकलकर भाजपा के किसी विक्षुब्ध नेता को हथिया ले। यही परिस्थितियां अचानक कुछ गुमशुदा नेताओं को सामने ले आती हैं, जबकि आम कार्यकर्ता चुनाव के मूड को पढ़ते-पढ़ते अपने मूड को कुर्बान कर देता है। देहरा उपचुनाव की बाहों में हथियार बना पहले ही निर्दलीय होशियार सिंह की संगत में भाजपा को देख रहा है, जबकि रमेश धवाला का पारा इतिहास की गवाही में सियासत को कसूरवार बना रहा है। कुछ बयान फरमाइश करते हुए या कांगे्रस के खालीपन को साधते हुए रमेश धवाला के आए, तो भाजपा के हाकिम उनका नाड़ी परीक्षण करने जुट गए। अब ज्वालाजी-ज्वालाजी रहेगी या ज्वालाजी से निकलकर कोई ज्वाला देहरा पहुंच जाएगी। विपिन सिंह परमार की मान मनोव्वल में दिल पिघल जाए तो भी गनीमत है वरना एक उपचुनाव की हस्ती में कई कुरुक्षेत्र हो जाएंगे। जरा सोचें जीवित नेताओं के स्वाभिमान के कारण बढ़ते उपचुनाव, हिमाचल की हस्ती में कितने विराम और कितने अनिश्चय लेकर आ रहे हैं। उपचुनावों के नाखून गंजे लोकतंत्र को लहूलुहान करके हमारे भविष्य को अस्थिर ही करेंगे, जबकि सुरक्षा कवच पहनकर भी सत्ता और विपक्ष, निहायत कमजोर और अमर्यादित होकर सिर्फ लुकाछिपी करते रहेंगे।


