भाजपा को हाल की घटनाओं से सबक लेने का समय

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के लिए ‘एक फूल से बहार नहीं आती’ वाली कहावत बिल्कुल सही बैठती है लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए इसे मामूली समझकर नजरअंदाज करना बड़ी गलती होगी। उपचुनाव के नतीजे, जिसमें पार्टी की अपनी सरकार वाले राज्य की दतिया सीट पर हार भी शामिल है, निश्चित रूप से उस पार्टी के लिए एक झटका है, जो हाल के दिनों में लगातार जीत हासिल कर रही थी। जरूरी नहीं कि विधानसभा उपचुनाव लोगों का आम मूड दिखाए लेकिन आम तौर पर रुझान सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में होता है, खासकर तब, जब केंद्र में भी उसी पार्टी की सरकार हो। जाहिर है, वोटर मानते हैं कि सत्ताधारी पार्टी के विधायक को चुनने से उनके इलाके और सरकारी मदद चाहने वाले लोगों को फायदा होगा।
पटना के बीचों-बीच और उस राज्य में उपचुनाव का नतीजा, जहां भाजपा ने कुछ ही महीने पहले बड़ी जीत हासिल की थी, निश्चित रूप से भाजपा के लिए शर्मनाक होगा। सत्ताधारी पार्टी के लिए यह और भी शर्मनाक है क्योंकि यह उपचुनाव उसके नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की खाली की गई सीट पर हुआ था। पार्टी ने पिछले 3 दशकों से इस सीट पर कब्जा बनाए रखा था और नबीन ने लगातार 5 बार यहां जीत हासिल की थी। दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। उसने जिन 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर उसे हार मिली और 236 सीटों पर तो उसकी जमानत तक जब्त हो गई। पार्टी को सिर्फ 3 फीसदी वोट मिले, जबकि प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा था।
जंतर-मंतर पर छात्रों के ऐतिहासिक आंदोलन , जो पटना समेत दूसरे शहरों में भी फैल गया था, के कुछ ही दिनों बाद आए उपचुनाव के नतीजों पर निश्चित रूप से युवाओं के असंतोष का असर पड़ा। छात्रों पर बेरहमी से लाठीचार्ज और पैलेट गन चलाने से वे और भी नाराज हो गए थे। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के काफी देर से इस्तीफे और सरकार व छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत से आखिरकार आंदोलन पर रोक तो लगी लेकिन साफ है कि इस मामले में अभी आखिरी बात नहीं हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन घटनाओं को लेकर गंभीर रूप से ङ्क्षचतित थे और उन्होंने उन लोगों को माफ करके अच्छा किया, जिन्होंने उन्हें अपशब्द कहे थे। गाली-गलौच को सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन उन्हें सजा देना या परेशान करना भी सही रास्ता नहीं था। उनके स्वागत-योग्य दखल ने यह माना कि ऐसी हरकतों से मुकद्दमा चलाकर या जबरदस्ती से नहीं, बल्कि बातचीत और संबंधित लोगों तक पहुंचकर ही निपटा जा सकता है।
हालांकि, उनका संदेश उनकी पार्टी के कुछ कार्यकत्र्ताओं और समर्थकों तक नहीं पहुंचा। उनमें से कुछ ने आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ जहरीला अभियान छेड़ दिया है। वे खास तौर पर महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बना रहे हैं और उन्हें बलात्कार की धमकी दे रहे हैं। इनमें से कुछ छात्रों की संपर्क जानकारी जान-बूझकर लीक कर दी गई, जिससे उन पर शारीरिक हमले का खतरा बढ़ गया है। एक 15 साल की लड़की को कैमरे पर माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया और लगातार मिल रही धमकियों के कारण उसे अपना घर छोडऩा पड़ा। एक वायरल वीडियो में पार्टी का एक नेता आंदोलन में शामिल छात्रों को धमकी देता हुआ दिखाई दिया।
प्रधानमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इन गैर-जिम्मेदार ट्रोलर्स तक सही संदेश पहुंचाने के लिए आगे आना चाहिए। युवाओं की तरफ से किसी और विरोध-प्रदर्शन से बचने के लिए उन्हें रोकना जरूरी है। इसी तरह, कानून लागू करने वाली एजैंसियों को भी आंदोलन में शामिल छात्रों की फाइलें या रिकॉर्ड बनाने से बचना चाहिए। पार्टी कई वजहों से मुश्किल में फंस गई है, जिनमें छात्रों का आंदोलन, उपचुनावों में हार, राम मंदिर और कुछ अन्य मंदिरों में ‘चंदा चोरी’ के सबूत और अंदरूनी कलह शामिल हैं। उसे फिर से सोचना होगा और बिना किसी पूर्वाग्रह के यह विश्लेषण करना होगा कि क्या गलत हो रहा है। इसके लिए उसे सबसे पहले अपना अहंकार छोडऩा होगा और लोगों तथा उनके प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के और रास्ते खोलने होंगे।-विपिन पब्बी



