संपादकीय

यह तो होता रहा है…

डोनाल्ड ट्रंप की अस्थिर नीतियों की वजह से भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत अधर में लटक गई है। यह अनिश्चितता दोनों में से किसी भी देश के लिए ठीक नहीं। हालांकि अलास्का समिट में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के प्रति ट्रंप का नरम रवैया थोड़ी उम्मीद जरूर जगाता है।

असमंजस की स्थिति: ट्रेड डील के लिए अमेरिकी अधिकारियों को इसी 25 तारीख को भारत आना था, लेकिन मौखिक तौर पर बताया गया कि अब यह विजिट नहीं होगी। अभी तक नई तारीखों का ऐलान नहीं हुआ है, जिससे असमंजस बढ़ गया है। पहले माना जा रहा था कि अगस्त आखिर या सितंबर तक दोनों देश एक मिनी डील तक पहुंच जाएंगे। इसके लिए दोनों के बीच कई दौर की वार्ता भी हो चुकी है, लेकिन अब सबकुछ बिल्कुल थम जाना द्विपक्षीय रिश्तों के लिए सही नहीं।

संबंधों को नुकसान: व्यापारिक समझौते में क्यों अड़चन आ रही है, इस बारे में अब सभी को पता है, लेकिन भारत की चिंताओं को समझने और बातचीत के जरिये समाधान निकालने के बजाय ट्रंप दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। मौजूदा संकट इसलिए भी ज्यादा उलझ गया है, क्योंकि चीन की बढ़ती मनमानी को रोकने के लिए भारत को अहम साझेदार मानने के बावजूद अमेरिका आपसी संबंधों को नुकसान पहुंचाने वाले कदम उठा रहा है। हालांकि इतिहास पर नजर डालें, तो वॉशिंगटन के लिए यह नई बात नहीं लगती।

पुरानी आदत: 80 के दशक के आखिर में भी अमेरिका को व्यापार घाटे की चिंता सता रही थी और तब उसके निशाने पर जापान था। उसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार मिला कि अगर कोई देश अमेरिका के खिलाफ अनुचित व्यापार नीतियां अपनाता है, तो उस पर टैरिफ लगाया जा सके। लेकिन, यह अधिकार मिलने के बाद तत्कालीन US प्रेजिडेंट जॉर्ज एचडब्लू बुश ने जापान के साथ-साथ भारत और अमेरिकी सहयोगियों – यूरोप, दक्षिण कोरिया व ताइवान पर भी एक्स्ट्रा टैक्स लाद दिया। 1989 में जब उन्होंने भारत को टारगेट किया था, तब भी सरकार का यही कहना था कि वह किसी दबाव में नहीं झुकेगी।

इतिहास से सबक: अमेरिका फिर से इतिहास को दोहरा रहा है। ट्रंप चीन को सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लेकिन सबसे पहले समझौता उसी से किया। वहीं यूरोपीय संघ (EU) और भारत जैसे सहयोगियों के प्रति उनका रुख ज्यादा अड़ियल है। EU ने भले डील कर ली हो, पर उसके कई सदस्य देश इससे खुश नहीं हैं। ऐसे में भारत को ट्रंप प्रशासन से बात करते हुए अमेरिका के अतीत और आज के हालात, दोनों पर नजर रखनी होगी। यह डील अमेरिकी इकॉनमी के लिए भी उतनी ही जरूरी है, जितनी भारत के लिए।

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