संपादकीय

तीसरी ताजपोशी

नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं। जिस दौर में यह प्रतिष्ठा और स्वीकृति जवाहर लाल नेहरू को मिली थी, तब कांग्रेस का ही वर्चस्व था। तीनों बार कांग्रेस को बहुमत हासिल हुआ था। आज स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक दलों का प्रभाव है, लिहाजा जनादेश भी विभाजित और खंडित आते हैं। बेशक मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन उनकी पार्टी भाजपा को बहुमत हासिल नहीं हुआ है। वह 240 सीटें ही जीत सकी है। मोदी भाजपा-एनडीए संसदीय दल के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री बने हैं। गठबंधन को 293 सीटें मिली हैं। विविधता का ऐसा गठबंधन चमत्कार से कम नहीं है, लिहाजा लगातार तीसरी बार की ताजपोशी भी चमत्कार है। सवाल और संदेह उठाए जा रहे हैं कि चंद्रबाबू नायडू की तेलुगूदेशम पार्टी (टीडीपी) और नीतीश कुमार का जद-यू आखिर कब तक मोदी सरकार का समर्थन करते रहेंगे? वे दोनों दल आंध्रप्रदेश और बिहार में भाजपा गठबंधन में हैं। आंध्र के नए जनादेश में प्रधानमंत्री मोदी के आह्वानों और संबोधनों का भी योगदान है, नतीजतन नायडू 12 जून को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। बेशक नायडू 2019 में विपक्षी गठबंधन का एक हिस्सा थे और नीतीश ने 2023 तक विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को लामबंद करने की कोशिशें कीं, लेकिन यह उनका ‘राजनीतिक अतीत’ था। अब वे पूरी तरह मोदी और भाजपा के साथ हैं। आम चुनाव भी साथ-साथ लड़े हैं।

वे परस्पर पूरक हैं, क्योंकि आंध्र और बिहार को केंद्र सरकार से जो आर्थिक मदद चाहिए, वह मोदी सरकार ही दे सकती है। आंध्र पर 3.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है और उसे अपनी नई राजधानी बनानी है। हालांकि मोदी सरकार के पहले कालखंड के दौरान नायडू की ऐसी ही मांगों के कारण केंद्र से खटपट हुई थी। आज टीडीपी 16 सांसदों के साथ एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और भाजपा की सरकार उसके भरोसे है। हमें नायडू की राजनीतिक शख्सियत के एक और पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए कि वह बेहिसाब सियासी मोल-तोल के अभ्यस्त हैं। बहरहाल प्रधानमंत्री मोदी ने अगले दशक के लिए सुशासन, समग्र विकास और आम आदमी की जिंदगी में सुधार के लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन कुछ विरोधाभास ऐसे हैं कि सुशासन के लिए जरूरी आर्थिक नीतियां प्रभावित हो सकती हैं। आंध्र-बिहार को विशेष दर्जा, अग्निवीर योजना, मुस्लिम आरक्षण और तुष्टिकरण, जातीय जनगणना, समान नागरिक संहिता आदि आर्थिक मुद्दे नहीं हैं, लेकिन इनके कारण सुशासन, समावेशी, समन्वय की दशा और दिशा जरूर प्रभावित होगी। यदि ये प्रभाव और दबाव प्रधानमंत्री मोदी को महसूस करने पड़ते हैं, तो सरकार और सुशासन के इकबाल पर सवाल उठाए जा सकते हैं। यह यक्ष-प्रश्न देश के सामने है कि ऐसे विरोधाभासी गठबंधन वाली सरकार कब तक चलेगी? आंध्र और बिहार दोनों ही विपन्न राज्य हैं। उन्हें केंद्र सरकार की विशेष आर्थिक मदद की दरकार है। राज्यों को ‘विशेष दर्जा’ दिया जाए, यह मुद्दा और मांग दोनों ही राज्यों में प्रबल है।

इस संदर्भ में वित्त आयोग और नीति आयोग की अपनी सीमाएं हैं। नायडू और नीतीश की विवशता यह भी है कि उन्हें अनुभव है कि यदि विपक्षी गठबंधन में शामिल हुआ जाए, तो कांग्रेस नेतृत्व की सरकार उन्हें आर्थिक मदद नहीं देगी, बल्कि मध्यावधि चुनाव के आसार ज्यादा बन जाएंगे, लिहाजा दोनों नेता फिलहाल मोदी सरकार के साथ ही रहना चाहते हैं। नायडू और नीतीश जानते हैं कि गठबंधन को लेकर देश उन पर शक कर रहा है, क्योंकि मानसिक तौर पर वे भाजपा-विरोधी राजनीति के पक्षधर रहे हैं, लिहाजा वे आगामी 5 साल भाजपा के साथ गठबंधन में रहने की गारंटी दे रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का आकलन गुजरात के मुख्यमंत्री काल या बहुमत वाले प्रधानमंत्री से नहीं किया जाना चाहिए। अब नया दौर है और मोदी संगठन के माहिर नेता रहे हैं। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं, लिहाजा वह सत्ता की वर्णमाला बखूबी जानते हैं। मोदी पार्टी संगठन से सरकार में आए हैं और लगातार 23 साल से सत्तारूढ़ हैं। यह अनुभव सामान्य नहीं है। वह बिखरे हुए संगठन को एकजुट करना जानते हैं। फिलहाल एनडीए के सभी घटकों ने उनके नेतृत्व में भरोसा जताया है। पारी की शुरुआत हुई है। उसके साथ-साथ ही विश्लेषण करना चाहिए। बेहतर होगा कि नई सरकार मध्यम वर्ग के लिए भी कुछ करे।

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