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हिंदी समाचार पत्रों की कोई भाषा नीति नहीं, हिंदी और हमारा बड़बोलापन

विडंबना यह है कि चोटी के भाषा वैज्ञानिकों, लिपि विज्ञानियों, तकनीकी विशेषज्ञों, लेखकों, शिक्षकों के सहयोग से निर्मित संस्तुतियां अपनायी नहीं जा रहीं. परिणाम स्वरूप शब्दों की वर्तनी में नितांत अनुशासनहीनता पायी जाती है. लेखकों में मत वैभिन्य है. हिंदी समाचार पत्रों की कोई भाषा नीति नहीं है. अति उत्साही एंकर-पत्रकार हिंदी में अंग्रेजी को बरतना अपना मूल अधिकार समझते हैं. इसके पक्ष में वे विचित्र तर्क भी देते हैं.हिंदी का अमृत काल तो पूरा होने को है. पर संविधान ने हिंदी के प्रचार-प्रसार का दायित्व जिसे सौंपा है, उससे कोई नहीं पूछता कि इतने सारे आयोजनों के बाद भी सफलता मिली कितनी है.

Hindi Diwas 2024 : जब से होश संभाला, मुख्य रूप से हिंदी को ही बिछाता-ओढ़ता हूं, हिंदी का ही खाता-पीता हूं, यद्यपि कभी किसी भाषा से विद्वेष-वैमनस्य नहीं रहा. जब भी सितंबर आता है, तो मैं कुछ अधिक बेचैन हो जाता हूं. कथित रूप से हिंदी प्रेमी समाज और संस्थाओं के लिए यह त्योहार का मास होता है. अपनी-अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा, हिंदी मास के नाम से आयोजन होते हैं. हिंदी के महत्व के बारे में एक-सी बातें दुहरायी जाती हैं, एक-से संकल्प लिये जाते हैं. इसलिए इस वर्ष मैंने सोचा था कि हिंदी दिवस पर न किसी आयोजन का हिस्सा बनूंगा, न इस पर कुछ कहूंगा. पर जब बड़े-बड़े प्रण टूट जाते हैं, तब यह तो एक मामूली आदमी का सोचना था. जब मन की बात कहने की स्वतंत्रता दी गयी तथा आदर भरा अनुरोध मिला, तो टाला नहीं गया.

देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है. हिंदी का अमृत काल तो पूरा होने को है. पर संविधान ने हिंदी के प्रचार-प्रसार का दायित्व जिसे सौंपा है, उससे कोई नहीं पूछता कि इतने सारे आयोजनों के बाद भी सफलता मिली कितनी है. प्रगति का लेखा-जोखा आंकड़ों से पुष्ट करने का रिवाज है और संबद्ध मंत्रालय कभी भी बता सकता है कि किस मद में कितने और कहां खर्च हुए, लेकिन उसका वास्तविक प्रतिफल क्या रहा, यह पता कैसे लगे! सरकार की विज्ञप्तियां विचित्र हिंदी में होती हैं. अनेक अन्य महत्वपूर्ण कार्य के निष्पादन भी ठीक से बरते नहीं जा रहे हैं. यों कहें कि अभी उनका अधिक प्रचार नहीं है और लोग लाभ नहीं उठा पा रहे हैं.


केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने एक अनूठी वेबसाइट प्रारंभ की है, जो संविधान स्वीकृत सभी 22 आधिकारिक भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली उपलब्ध कराती है. अभी तक इस पोर्टल पर लगभग 22,00,000 शब्दों वाली कुल 322 शब्दावलियां उपलब्ध हैं. यह संख्या अभी और बढ़ेगी क्योंकि निजी संस्थानों से भी अनुरोध किया गया है कि वे अपने कार्य को इस मंच पर साझा कर सकते हैं. शिक्षा मंत्रालय के ही अंतर्गत केंद्रीय हिंदी निदेशालय शब्दकोश निर्माण, पत्राचार से हिंदी शिक्षण, हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रोत्साहन, अहिंदी भाषी हिंदी लेखकों को सम्मानित करना जैसी अनेक गतिविधियों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण कार्य साठ के दशक से कर रहा है- हिंदी की मानक वर्तनी का निर्माण और उसमें सतत संशोधन. देवनागरी लिपि के मानकीकरण की परिशोधित नवीनतम नियमावली केंद्रीय हिंदी निदेशालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है. विडंबना यह है कि चोटी के भाषा वैज्ञानिकों, लिपि विज्ञानियों, तकनीकी विशेषज्ञों, लेखकों, शिक्षकों के सहयोग से निर्मित संस्तुतियां अपनायी नहीं जा रहीं. परिणाम स्वरूप शब्दों की वर्तनी में नितांत अनुशासनहीनता पायी जाती है. लेखकों में मत वैभिन्य है. हिंदी समाचार पत्रों की कोई भाषा नीति नहीं है. अति उत्साही एंकर-पत्रकार हिंदी में अंग्रेजी को बरतना अपना मूल अधिकार समझते हैं. इसके पक्ष में वे विचित्र तर्क भी देते हैं.


हिंदी क्षेत्र हिंदी को लेकर कुछ विकट मानसिक स्थिति से गुजर रहा है. इस मसले पर हम भावनाओं के अतिरेक में अजीब-अजीब बातें कह जाते हैं, जो सच नहीं होतीं, जैसे ‘हिंदी संसार की सबसे बड़ी भाषा है’, वह ‘संसार की एकमात्र भाषा है, जो पूर्णतः वैज्ञानिक है’, ‘हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है’, ‘हम सब भारतीयों की मातृभाषा है’ इत्यादि. सच तो यह है कि हम हिंदी वालों से अपना ही खेत नहीं संभाला जा रहा है. एक-दो वाक्यों में हिंदी जानने वाले को रोजगार में प्राथमिकता देने की बात कह दी जाती है. प्राथमिकता बाध्यता नहीं है और भाषा के मामले में किसी भी लोकतांत्रिक देश में बाध्यता हो नहीं सकती. परिणाम यह कि दिशाहीनता और अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है. हम एक-दूसरे को दोष देने के लिए तत्पर रहते हैं. तो क्यों न हिंदी दिवस-सप्ताह-पखवाड़ा-मास में हम हिंदी वाले ही कुछ ऐसा करें कि देश के साथ-साथ हिंदी का भी भला हो और हिंदी वालों का भी.-सुरेश पंत

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