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विभाजन की सिसकियां खारिज करने का कारण

इससे भी बड़ी बात थी कि इतनी बड़ी त्रासदी का पूरे देश के लोगों को पता भी नहीं था। दक्षिण भारत के लोग इसे नहीं जानते थे। पश्चिम और पूर्वी भारत में भी असम को छोडक़र बाकी स्थानों पर इस त्रासदी के बारे में छिटपुट खबरों के अलावा सन्नाटा था। इसलिए कांग्रेस सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता इस त्रासदी को किसी भी तरीके से ढकने की हो गई। यदि यह त्रासदी आधुनिक भारतीय इतिहास में दर्ज हो जाती, तो समाज विज्ञान के विद्वान इसकी चीरफाड़ और विश्लेषण करते। जाहिर है इस विश्लेषण से सहज ही कांग्रेस और मुस्लिम लीग पकड़ में आ जाते…

भारत विभाजन को लेकर दो प्रकार की पुस्तकें लिखी गई हैं। पहली श्रेणी में साहित्य की पुस्तकें हैं। उपन्यास, कहानियां, कविता या अन्य विधाओं में लिखी किताबें। इनमें यकीनन विभाजन के कारणों को लेकर साहित्यकार की अपनी दृष्टि ही प्रमुख रही है। इस प्रकार के साहित्यकारों में हिंदी भाषा में तीन उपन्यासकारों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यशपाल, भीष्म साहनी और वैद्य गुरुदत्त। यशपाल का झूठा सच, भीष्म साहनी का तमस और वैद्य गुरुदत्त का ‘देश की हत्या’ नामक उपन्यास हिंदी साहित्य की निधि हैं। पंजाबी में अमृता प्रीतम ने अपनी एक ही रचना ‘अज आंखों वारिस शाह नूं’ लिख कर विभाजन की टीस को रेखांकित कर दिया। विभाजन विभीषिका को लेकर दूसरी प्रकार की किताबें समाज विज्ञान की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। उन किताबों में विभाजन के कारण की मीमांसा प्रमुख है, विभीषिका कम है। समाज विज्ञान के पंडित शायद विभीषिका को रेखांकित करने से जानबूझ कर बचते रहे हैं। उस समय की सरकार की यह नीति का हिस्सा भी हो सकता है। सरकार दरअसल विभीषिका की चर्चा करने से बचती थी। यदि विभीषिका की चर्चा होती तो यकीनन समाज विज्ञान के पंडितों को उसकी जिम्मेदारी भी तय करनी पड़ती। यह जिम्मेदारी कम से कम तीन पक्षों के खाते में तो सीधे-सीधे आती थी। मुस्लिम लीग। मुस्लिम लीग को यह जिम्मेदारी लेने में दिक्कत भी नहीं थी। पाकिस्तान में उसको इसका परोक्ष रूप से लाभ ही होता। आखिर कितनी पार्टियां हैं, जो विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के एक भौगोलिक क्षेत्र को विभाजित कर एक नया देश बना सकती हैं? मुस्लिम लीग को यदि यह श्रेय मिलता है तो यह तो उसके लिए मैडल ही माना जाएगा।

दूसरे स्थान पर विभाजन विभीषिका की जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार के खाते में पड़ती है। लेकिन ब्रिटिश सरकार इस पर गौरव कर सकती है। दो सौ साल राज करने के बाद भी अपने साम्राज्यवादी हितों के लिए भारत को विभाजित करने में सफलता प्राप्त की। मजहब यूरोपीय देशों में राज्य या देश की नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन भारत में मजहब सदा व्यक्तिगत विषय होता था। उससे राज्य का कुछ लेना-देना नहीं था। ब्रिटिश नीतिकारों ने मजहब को पहचान का प्राथमिक आधार बना कर देश में लंबवत दरारें पैदा कर दीं और देश को ही विभाजित कर दिया। इस पर ब्रिटेन गर्व कर सकता था। विभाजन में तीसरी हिस्सेदारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की है जिसने पंद्रह अगस्त 1947 से पहले विभाजन के पक्ष में बाकायदा प्रस्ताव पारित कर मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार की नीति का समर्थन ही नहीं किया, बल्कि उसमें सहायता भी की। लेकिन कांग्रेस की जिम्मेदारी केवल भारत विभाजन का प्रस्ताव पास करने से ही समाप्त हो जाती। इस प्रस्ताव के पास हो जाने से दो रास्ते खुले थे। पहला रास्ता था भारत के, खासकर बंगाल और सप्त सिंधु/पंजाब के विभाजित होने का और दूसरा रास्ता था बचे हुए भारत की सत्ता पर कांग्रेस के अधिकार का। विभाजन केवल दो हिस्सों का हुआ था। बंगाल का और सप्त सिंधु/पंजाब क्षेत्र का। पूरे देश का विभाजन नहीं हुआ था। विभाजन के बाद इन दो क्षेत्रों में क्या परिणाम निकलेंगे, क्या इसका अंदाजा कांग्रेस को नहीं था? क्या कांग्रेस यह मान रही थी कि नक्शे पर नई रेखा खिंच जाएगी, एक देश के दो देश बन जाएंगे, लेकिन लोग अपने-अपने स्थानों पर ही बैठे रहेंगे? यदि विभाजन के परिणाम का अंदाजा कांग्रेस को नहीं था तो जाहिर है कि कांग्रेस कम से कम राष्ट्रीय राजनीतिक दल कहलवाने की हकदार नहीं थी। वह केवल कुछ अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों का क्लब मात्र था, जो भारत के लोगों की जमीनी सच्चाइयों से कटा हुआ था। लेकिन यहां एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है। विभाजन से पूर्व ही विभाजन उपरांत होने वाली विभीषिका के संकेत मिलने भी शुरू हो गए थे। बंगाल में मुस्लिम लीग द्वारा किया गया डायरेक्ट एक्शन इसका संकेत था। इस एक्शन में हजारों हिंदू मारे गए थे। नोआखली के दंगे भी इसका ही संकेत था।

इन दंगों के तो महात्मा गांधी प्रत्यक्षदर्शी थे। 15 अगस्त 1947 से पहले पंजाब में मुस्लिम लीग की सरकार नहीं थी, क्योंकि चुनावों में फंसे बहुमत नहीं मिला था। पंजाब में सरकार कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और अकाली दल की थी। इस सरकार को गिराने के लिए लाहौर समेत पूरे पंजाब में जो तांडव हिंदू-सिख के खिलाफ मुस्लिम लीग ने बाकायदा घोषणा करके किया था, उसे तो कांग्रेस देख ही नहीं रही थी, बल्कि उसकी भुक्तभोगी थी। उसके बावजूद विभाजन के बाद की त्रासदी को टालने के लिए उसने विभाजन से पहले ही शांतिपूर्ण तरीके से जनसंख्या की अदला-बदली की व्यवस्था क्यों नहीं की? शायद अंबेडकर ने इसीलिए इस कांग्रेस के बारे में सही कहा था कि कांग्रेस देश के लिए नहीं लड़ रही थी बल्कि ब्रिटिश सरकार से सत्ता के लिए सौदेबाजी कर रही है। इस सौदेबाजी की जल्दी में उसने विभाजन के बाद की विभीषिका की चिंता नहीं की। विभाजन से पूर्व जनसंख्या की अदला बदली का सुझाव अंबेडकर और भाई परमानंद ने दिया भी था। लेकिन इससे नेहरु की सेक्युलरिजम की अवधारणा खंडित होती थी। कांग्रेस की इस सौदेबाजी में दस लाख लोगों ने बंगाल और सप्त सिंधु/पंजाब क्षेत्र में अपनी जान गंवाई।

कितने विस्थापित हुए, इसकी चर्चा सरकार नहीं करती थी। इससे भी बड़ी बात थी कि इतनी बड़ी त्रासदी का पूरे देश के लोगों को पता भी नहीं था। दक्षिण भारत के लोग इसे नहीं जानते थे। पश्चिम और पूर्वी भारत में भी असम को छोडक़र बाकी स्थानों पर इस त्रासदी के बारे में छिटपुट खबरों के अलावा सन्नाटा था। इसलिए कांग्रेस सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता इस त्रासदी को किसी भी तरीके से ढकने की हो गई। यदि यह त्रासदी आधुनिक भारतीय इतिहास में दर्ज हो जाती, तो समाज विज्ञान के विद्वान इसकी चीरफाड़ और विश्लेषण करते। जाहिर है इस विश्लेषण से सहज ही कांग्रेस और मुस्लिम लीग पकड़ में आ जाते। लेकिन 1947 में भारत में बची मुस्लिम लीग अपनी आगामी योजना के तहत मोटे रूप में कंग्रेस में ही शामिल हो गई थी। सरदार पटेल ने इसके संकेत भी दिए और किसी स्तर पर इसका विरोध भी किया। परंतु जवाहर लाल नेहरु मुस्लिम लीग के कांग्रेस में समा जाने को ही सेक्युलरिजम का सर्वोत्तम उदाहरण मान रहे थे। अब यदि विभाजन के बाद बंगाल व पंजाब में हुई विभीषिका पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनती तो कांग्रेस कटघरे में दिखाई देती। भारत सरकार सात दशकों बाद जागी है। अब नए सिरे से विभाजन विभीषिका पर चर्चा होने लगी है। इस संबंध में विभाजित क्षेत्रों से पलायन कर आए लोगों से साक्षात्कार किए जा रहे हैं। उनसे उस समय की हालत के बारे में जानकारियां हासिल की जा रही हैं। इतिहास के विद्यार्थियों के लिए ये प्राथमिक स्रोत हैं। लेकिन उस समय के भुक्तभोगी अब बहुत कम बचे हैं। फिर भी इतिहास को जितना संभाला जा सके, वही पूंजी है। यह भी तथ्य है कि महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देने का सुझाव दिया था।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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