राष्ट्रीय

दुनिया भर में गए प्रतिनिधिमंडलों का उद्देश्य स्पष्ट है

इस समय सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधिमंडल 7 समूहों में दुनिया के अलग-अलग 33 देशों की यात्राओं पर है। इसके साथ विदेश मंत्रालय के कुछ पुराने और अनुभवी राजनयिक भी हैं। स्वाभाविक ही आवश्यकता अनुसार विदेश मंत्रालय की ओर से भी प्रतिनिधि हैं और यात्रा से संबंधित देशों का दूतावास भी पूरी तरह इनके साथ लगा है। 3 जून तक  प्रतिनिधिमंडल विदेश यात्रा पर रहेगा। सामान्य तौर पर इसका लक्ष्य यही बताया गया है कि ‘ऑप्रेशन सिंदूर’ और उसके पूर्व पहलगाम हमले को केन्द्र में रखते हुए पाकिस्तान की दुर्नीतियों, संपूर्ण आतंकवादी विषयों पर भारत का पक्ष  सविस्तार रखने के साथ उन्हें अपने पक्ष से सहमत कराने की भी कोशिश होगी। हालांकि विपक्ष के सांसद इसमें शामिल हैं किंतु जिस तरह की आवाजें उठीं वह इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के संदर्भ में भी भारत की अपरिहार्य आंतरिक राजनीतिक एकता के विपरीत था। 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अपने ‘एक्स’ हैंडल पर लंबा -चौड़ा पोस्ट करते हुए इसे प्रधानमंत्री की विदेश नीति और कूटनीति  की सफलता का प्रतिबिंब बता दिया। उन्होंने कहा कि आज उन्हें मजबूर होकर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजना पड़ रहा है। कांग्रेस,  तृणमूल आदि पाॢटयों की समस्या यह भी थी कि हमसे बिना पूछे हमारे सांसदों को क्यों शामिल किया गया और जिन्हें हम नहीं चाहते थे वे उसमें शामिल क्यों हैं? इस विषय पर 2 राय हो सकती हैं पर सरकार को भी यह अधिकार होना चाहिए कि ऐसे मामलों में सूक्ष्मता से योग्यता के आधार पर सांसदों का चयन कर उन्हें विदेश भेजा जाए और चूंकि सभी सांसद उनकी पार्टियों के ही हैं इसलिए समस्या नहीं होनी चाहिए। हमारे देश में अत्यंत कठिन समय में भी ऐसे राजनीतिक विवेक की अपेक्षा हम नहीं कर सकते। बहरहाल इस विषय को छोड़ आगे बढ़ते हैं। देशों के चयन की दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों में से चीन को छोड़ अमरीका, फ्रांस ब्रिटेन और रूस शामिल हैं। साथ ही 10 अस्थायी सदस्यों में पाकिस्तान और सोमालिया को छोड़ अन्य 8 अल्जीरिया, डेनमार्क, दक्षिण कोरिया, सियरा लियोन, गुयाना, पनामा, स्लोवेनिया और ग्रीस भी शामिल हैं।  

सऊदी अरब पाकिस्तान का भी मित्र देश है लेकिन उसने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ होने की बात कही थी। ओ.आई.सी. देश जम्मू-कश्मीर पर बीच-बीच में भारत विरोधी प्रस्ताव पारित कर देते हैं। इस संगठन ने ‘ऑप्रेशन सिंदूर’ के विरुद्ध भी बयान जारी किया था। तो यह आवश्यक है कि उनसे भी संपर्क करके अपनी बात बताई जाए। यह सोच ही निराधार है कि ‘ऑप्रेशन सिंदूर’  विषय पर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भारत का पक्ष कमजोर है इसलिए हमें प्रतिनिधिमंडल भेजना पड़ रहा है। ‘ऑप्रेशन सिंदूर’  के बीच, उसके पहले तथा बाद में भी हमारी कूटनीति एक क्षण के लिए रुकी नहीं।

संपूर्ण विश्व में विदेश मंत्री , विदेश सचिव,अन्य अधिकारी व स्वयं प्रधानमंत्री बातचीत करते रहे। विश्व के किसी प्रमुख देश ने भारत की कार्रवाई का न विरोध किया और न एक प्रतिकूल बयान दिया। विश्व के प्रमुख देशों का चरित्र है कि जब आतंकवादी हमले होंगे वे इसके विरुद्ध बयान जारी करेंगे, साथ होने की भी घोषणा करेंगे किंतु जब आप साहस के साथ पराक्रम और पुरुषार्थ दिखाते हुए सीमा पार कर कार्रवाई करेंगे तो  कोई सक्रिय साथ देने नहीं आएगा। कुछ देशों की छाती फटेगी और ‘युद्ध रोकिए-युद्ध रोकिए’ की आवाज उठेगी। वही हुआ है। 

भारत का संकल्प अटूट है। प्रधानमंत्री ने स्वयं ‘ऑप्रेशन सिंदूर’  को अखंड प्रतिज्ञा कहा है। भारत की घोषणा दो टूक है, आतंकवादी कार्रवाई युद्ध मानी जाएगी, पाकिस्तान के साथ न व्यापार होगा, न बातचीत और उसने आतंकवाद नहीं रोका तथा सैन्य दुस्साहस किया तो हम इससे ज्यादा शक्ति से कार्रवाई करेंगे। 

इस यात्रा के उद्देश्यों को समझने की दृष्टि से कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा न्यूयार्क में दिए गए विस्तृत वक्तव्य की कुछ बातों का उल्लेख प्रासंगिक है।थरूर की ये पंक्तियां देखिए- ‘‘अब हम इस बात के लिए दृढ़ संकल्पित हैं कि इस मामले में कोई नया निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। हमने सब कुछ आजमा लिया है, अंतर्राष्ट्रीय डोजियर, शिकायतें…सब कुछ आजमा लिया गया है। पाकिस्तान इंकार करता रहा है, किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया, कोई गंभीर आपराधिक मुकद्दमा नहीं चलाया गया, उस देश में आतंकी ढांचे को खत्म करने का कोई प्रयास नहीं किया गया, और सुरक्षित पनाहगाहें बनी रहीं…आप (पाकिस्तान) ऐसा करें, आपको यह वापस मिलेगा और हमने इस आप्रेशन (ऑप्रेशन सिंदूर) के साथ यह दिखा दिया है कि हम इसे सटीकता के साथ कर सकते हैं। विशिष्ट आतंकवादी ठिकानों, मुख्यालयों और लांच पैडों पर बहुत सटीक और सोची-समझी कार्रवाई की गई।’’इस तरह किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रतिनिधिमंडल भेजने के पीछे भारत की वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली कार्रवाइयों के लिए व्यापक आधार बनाना है जिसमें पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भी स्थिति पैदा हो।-अवधेश कुमार  

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