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संसद का काम कानून बनाना है,शारीरिक ताकत दिखाने की जगह नहीं…

संसद में धक्का-मुक्की और हिंसा के बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ  दर्ज एफ.आई.आर. की क्राइम ब्रांच जांच करेगी, संसद का काम कानून बनाना है, इसलिए ङ्क्षहसा से जुड़े कानूनी पहलुओं पर जानकारी और बहस जरूरी है। सांसदों के साथ धक्का-मुक्की में सबसे बड़ा धक्का नई संसद को लगा है, जिसे लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है। इस घटना के बाद स्पीकर ओम बिरला ने संसद के सभी द्वारों पर सांसदों और पाॢटयों के विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है। स्पीकर के पास संसद परिसर में व्यवस्था, अनुशासन और प्रशासन के सभी अधिकार हैं। इसलिए पुलिस, महिला आयोग और एस.सी.एस.टी. आयोग की सक्रिय भूमिका से संसद का अधिकार क्षेत्र सीमित हो सकता है। नए बी.एन.एस. कानून की संगीन धाराओं में दर्ज एफ.आई.आर. में गंभीर चोट पहुंचाने, दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालने, धमकाने और आपराधिक बल प्रयोग जैसे संगीन अपराध शामिल हैं।

केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने कहा है कि संसद शारीरिक ताकत दिखाने की जगह नहीं है। अगर राहुल गांधी की तर्ज पर अन्य सांसद भी शारीरिक हिंसा करें तो फिर क्या होगा जबकि कांग्रेस के सांसदों के आरोप के अनुसार भाजपा सांसदों के हाथों में डंडे थे लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के नेता खरगे से दुव्र्यवहार और मारपीट की शिकायत पर अभी तक एफ.आई.आर. दर्ज नहीं हुई। वी.आई.पी. एफ.आई.आर. और सी.सी.टी.वी. फुटेज : आम जनता के मामलों में पीड़ित व्यक्ति या परिवार ही पुलिस में शिकायत और एफ.आई.आर. दर्ज कराते हैं लेकिन संसद मामले में दोनों पक्षों की तरफ से अन्य सांसदों ने एफ.आई.आर. दर्ज कराई। वी.आई.पी. एफ.आई.आर. का बढ़ता चलन लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है।

आरोपी व्यक्ति की आपराधिक मानसिकता के अनुसार ही क्रिमिनल मामलों में एफ.आई.आर. दर्ज होनी चाहिए। राहुल गांधी के खिलाफ हत्या के प्रयास की शिकायत भी दर्ज हुई थी। यह अच्छा हुआ कि दिल्ली पुलिस ने एफ.आई.आर. में वह धारा दर्ज नहीं की। कुछ दिनों पहले बेंगलुरु के ए.आई. इंजीनियर अतुल सुभाष ने आपराधिक मामले से पीड़ित होकर आत्महत्या कर ली थी। सांसदों की तर्ज पर निचले स्तर पर एफ.आई.आर. का प्रचलन बढ़ा तो देश में आपराधिक मुकद्दमों की बाढ़ आ जाएगी।आम मामलों में सी.सी.टी.वी. फुटेज मीडिया को जारी हो जाते हैं। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है। इसलिए संसद ङ्क्षहसा से जुड़े सभी सी.सी.टी.वी. फुटेज जारी होने चाहिएं जिससे लोकतंत्र के मंदिर में माननीयों के अभद्र आचरण को दोबारा होने से रोका जा सके। 

शुरूआती दौर में अपराधियों के सहयोग से विधायक और सांसद चुनाव जीतते थे। ‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्मों में बताया गया है कि कैसे अपराधी ही संसद में पहुंचने लगे। वर्ष 2006 में जद (यू) और आर.जे.डी. सांसदों के बीच और साल-2009 में सपा के अमर सिंह और भाजपा के आहलूवालिया के बीच हाथापाई हुई थी। फरवरी 2014 में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून पर चर्चा के दौरान सांसदों ने सदन में मिर्च स्प्रे फैंका था। इन घटनाओं से साफ है कि शालीन बहस की बजाय संसद हुड़दंग और आपराधिक घटनाओं का अखाड़ा बनती जा रही है। ङ्क्षहसा कर रहे सांसदों के माननीय होने पर भी लोग सवाल खड़े करने लगे हैं लेकिन राज्यों में विधायिकाओं का सालाना लेखा-जोखा बनाने में कुछ अच्छी बातें भी सामने आ रही हैं।

ईज ऑफ  लिविंग और छोटे मुकद्दमों की वापसी : राजस्थान सरकार ने पशुवध, पहली बार खनन चोरी, मोटर वाहन कानून के उल्लंघन से जुड़े लघु प्रकृति के मामलों को वापस लेने के लिए राष्ट्रीय लोक अदालत में अर्जी दी है। महीनों से चल रहे छोटे मामले जिनमें आरोपी नियमित हाजिरी लगा रहे हैं, भी वापस होंगे। इनमें सार्वजनिक स्थान में जुआ खेलना, धूम्रपान, तम्बाकू, पशुवध और उग्र सवारी से जुड़े जैसे मामले शामिल हैं। कोरोना काल में लॉकडाऊन के उल्लंघन के लिए महामारी और आपदा प्रबंध कानून के तहत दर्ज लाखों मामलों को खत्म करने के लिए दिल्ली स्थित सैंटर फार अकाऊंटेबिलिटी एंड सिस्टमिक चेंज संस्था ने अनेक प्रयास किए थे। सी.ए.एस.सी. की लीगल रिसर्च के अनुसार राज्यों के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशकों को सूचित किया गया कि आई.पी.सी. की धारा-188 के तहत पुलिस सीधी एफ.आई.आर. दर्ज नहीं कर सकती। सी.ए.एस.सी. के प्रयासों से कई राज्यों में उन छुटपुट मुकद्दमों की वापसी के बाद अब राजस्थान में हो रही पहल काबिले तारीफ  है।

‘ईज ऑफ  लिविंग’ और ‘ ईज ऑफ  डूइंग’ बिजनैस को सफल बनाने के लिए मध्य प्रदेश विधानसभा में जनविश्वास विधेयक को पारित कर दिया गया है। इसके अनुसार 5 विभागों के 8 अहम कानूनों के 47 प्रावधानों के अनुसार थूकने, धुआं करने, गंदगी फैलाने, नाली पर कब्जा करने जैसे छोटे मामलों पर पैनल्टी की कार्रवाई होगी। इससे प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ाने के साथ अदालतों का बोझ कम होगा। बड़ी कम्पनियों और विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए सरकारें ‘ईज ऑफ  डूइंग बिजनैस’ का ङ्क्षढढोरा पीटती हैं। आम जनता को पुलिस और प्रशासन के दमन से बचाने के लिए ‘ईज ऑफ लिविंग’ के तहत गरीबों और आम जनता को भी राहत जरूरी है। इससे सही मायने में लोगों को सामाजिक न्याय मिलेगा, जो संविधान निर्माता डा. आम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)

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