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अत्यंत वृहद है महाकुंभ का मर्म…

महाकुंभ का आस्थावान अंग केवल इसलिए नहीं बनना है कि काया संगम में डुबकी लगाएगी और व्यक्ति का लोक-परलोक सुधर जाएगा, बल्कि आवश्यकता कुंभगत प्राकृतिक प्रभाव को आत्मसात करने की है, ताकि जीवन-मृत्यु के मध्य घूर्णन करते मानवीय अस्तित्व के अंतिम शीर्ष लक्ष्य की ओर उन्मुख होने का आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो। मनुष्य का जीवन केवल भौतिक संघर्ष द्वारा ही परास्त नहीं होता। यह वैचारिक एवं मानसिक संघर्ष द्वारा भी दुष्प्रभावित होता है…

कुंभ का शब्दार्थ है- घड़ा अर्थात कलश। कुंभ का जीवनार्थ है- काया व मन को पंचतत्त्वों के प्रत्यक्ष स्पर्श में लाकर आत्मसाधना की ओर अग्रसर होना। कुंभावधि में जल नामक तत्त्व गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर अमृतोन्मुखी हो उठता है। कुंभ के वृहद स्वरूप महाकुंभ में जलतत्त्व के अमृत संपर्क में आकर आत्ममुखी होने का अवसर है महाकुंभी आयोजन। गत तेरह जनवरी से प्रारंभ हुई यह आस्थायात्रा 26 फरवरी 2025 तक चलेगी। अ_ारह पुराणों से होते हुए चार वेदों तथा असंबद्ध रूप में 108 व मुख्यत: 13 उपनिषदों में समाहित पंचांग स्थिति (तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण/नभ, पृथ्वी, वायु, जल तथा अग्नि) द्वारा शुभाशुभ समय के निर्धारण के उपरांत नियत महाकुंभ आयोजन की पौराणिक कथा मूलत: विष्णु पुराण में पुरोल्लिखित हुई थी। इसके अनुसार, महर्षि दुर्वासा के श्राप द्वारा स्वर्ग ऐश्वर्य, धन, वैभव इत्यादि से रहित हो गया था। फलत: इन्द्रादि देवता शक्तिहीन हो गए। सहायतार्थ देवताओं ने भगवान विष्णु की शरणागति की। भगवान ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय बताया। भगवान ने उन्हें बताया कि मंथन से अमृत प्राप्त होगा, जिसका पान करके वे सभी अमर हो जाएंगे। असुर राजा बलि को देवताओं ने यह युक्ति बताई। वह भी अमरत्व के लोभवश समुद्र मंथन हेतु तैयार हो गया।

देवासुरों ने वासुकि नाग की रस्सी बनाकर मंदराचल पर्वत की सहायता से सागर मथना प्रारंभ किया। परिणामस्वरूप एक-एक कर 14 रत्न निकले। इनमें हलाहल विष, कामधेनु गाय, उच्चै:श्रवा अश्व, ऐरावत गज, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा नामक अप्सरा, देवी लक्ष्मी, वारुणी अर्थात मदिरा, चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धन्वन्तरि तथा अमृतकुंभ सम्मिलित थे। इसी अमृत का पान करने दानव परस्पर छल-बल करने लगे। इस पारस्परिक संघर्ष में वे अमृतकुंभ लेकर यहां-वहां दौड़े। दौड़ाभागी में कुंभ से अमृत की बूंदें छलककर प्रयागराज, नासिक, उज्जैन एवं हरिद्वार में गिर पड़ीं। जिस क्रम में वे जहां गिरीं, वहीं उस स्थान पर समयक्रमानुसार छह वर्ष में अद्र्धकुंभ एवं बारह वर्षों में एक बार कुंभ का आयोजन होता है। तत्कालीन देवासुरों के विशाल अस्तित्व के अनुरूप सृजित अमृत की बूंदें आज के युग के मानवों हेतु नदी के समान ही हैं। प्राय: 12 वर्ष के समयचक्र में होने वाले कुंभ की समयावधि में बृहस्पति, सूर्य व चंद्रमा एक साथ एक दिशा एक स्थिति में विद्यमान होते हैं, किंतु बृहस्पति जब मकर राशि में तथा सूर्य व चंद्रमा अन्य शुभ स्थानों पर विराजित होते हैं, तब महाकुंभ का धरायण होता है। खगोलीय एवं ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 12 कुंभ घटियों के बाद 144 वर्ष का योग बनता है। इस बार यही संयोग है। कलियुग में एक व्यक्ति की दो पीढिय़ों को ऐसा अवसर नहीं मिल पाता है। जिन व्यक्तियों की आयु इस समय तीस वर्ष से अधिक है, उनमें से अधिसंख्य के दादाओं और पिताओं के जीवनकाल में महाकुंभ की स्थिति उत्पन्न ही नहीं हुई। कुंभ के पौराणिक, प्राकृतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ असीमित हैं। इन अर्थों को व्यक्तिगत योग चेतना के माध्यम से ही अनुभव किया जा सकता है। कुंभ का मर्म पापमुक्ति एवं मोक्षप्राप्ति से भी गहन है। यदि व्यक्ति के अंदर प्राकृतिक उत्सव में संचित होकर जीवन के प्रति अंतर्दृष्टि खोलने की उत्कट इच्छा है तो उसके लिए महाकुंभ सर्वोत्तम अवसर है। प्रकृति के पंचतत्त्वों में से एक है नीर। प्रत्यक्ष दिखाई देतीं नीरवाहिनी नदियां गंगा, यमुना व अदृश्य रूप में विद्यमान सरस्वती के संगमस्थल के प्रति आस्था, कृतज्ञता एवं सम्मान प्रदर्शित करने का विशाल, भव्य व अद्भुत सम्मेलन संसार में कहां है! इस पावन समय में यह स्थल अलौकिक शोभा एवं सौंदर्य के साथ चमत्कृत है।

इस शुभघड़ी में तीनों सरिताओं के अमृतमय नीर द्वारा क्षयमान शरीर को चेतना प्रदान कर, मंगल स्नान कर और निज क्षमता से ध्यान धर कर व्यक्ति के मन में मौन होने, आध्यात्मिक होने का जो विचारबल प्रस्फुटित होता है, वास्तव में वही महाकुंभ का वास्तविक प्रसाद है, जिसे प्राप्त करने करोड़ों की संख्या में श्रद्धालुजन माहभर तक प्रयागराज में एकत्र होते रहेंगे। यह विचित्र एवं आश्चर्यचकित करने वाला अनुभव है कि दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या एक करोड़ भी नहीं है, किंतु महाकुंभ में अब तक इस लेख के लिखे जाने तक पंद्रह करोड़ से अधिक श्रद्धालु संगम वारिप्रवाह में आस्था की डुबकी लगा चुके हैं। महाकुंभ विशुद्ध धार्मिक, आध्यात्मिक, प्राकृतिक एवं दार्शनिक आयोजन है। इसमें किसी भी अनावश्यक बाह्य विचार की आवश्यकता है ही नहीं। यह आत्मज्ञान प्राप्ति का प्राकृतिक उत्स है। यह वही अनुभव कर सकता है, जो रिक्त मन से कुंभ का भागीदार बनता है। पूर्वाग्रह से मुक्त होकर तथा उदार हृदय के साथ इस उत्सव का आत्मसाक्षात्कार करने पर निश्चय ही स्वर्गसम अनुभूतियां प्राप्त होती हैं। करोड़ों-करोड़ देशी-विदेशी लोगों की विशुद्ध आस्था को उनके पवित्र आचरण, अप्रतिम हाव-भाव, पंचतत्त्वों के प्रति उनकी सर्वांगीण भंगिमा के माध्यम से भलीभांति अनुभूत किया जा सकता है। इस पौराणिक संयोजन द्वारा श्रद्धालुओं में इतना आत्मिक प्रभाव उत्पन्न होता है कि वे भौतिक व प्रकट जीवन के कष्टकंटकों को भी पुष्पस्पर्श समझने लगते हैं। महाकुंभ द्वारा प्रज्वलित आत्मदीप्ति में जीवन की वास्तविकता वही देख सकता है तथा इससे स्थायी मुक्ति की अभिलाषा भी वही वरण कर सकता है, जो आस्थावान होकर संगम तट के अंश-अंश को अंगीकार करता है। यह दुर्लभ गति अप्रतिम है। इस गति में प्रवाहित होने का आत्मभाव विराट है। यह अपरिभाषित है। यह केवल और केवल अनुभव के वशीभूत है।

महाकुंभ के पौराणिक उपक्रमों- जैसे शाही स्नान, अखाड़ा स्नान, साधु-संतों के स्नान, मौनी अमावस्या एवं बसंत पंचमी के स्नान के सामानांतर इस मेले में उपस्थित होकर जो तटस्थ प्राकृतिक ऊर्जा सामान्य व्यक्ति को प्राप्त हो रही है, उसकी प्रेरणा अöुत है। महाकुंभ का आस्थावान अंग केवल इसलिए नहीं बनना है कि काया संगम में डुबकी लगाएगी और व्यक्ति का लोक-परलोक सुधर जाएगा, बल्कि आवश्यकता कुंभगत प्राकृतिक प्रभाव को आत्मसात करने की है, ताकि जीवन-मृत्यु के मध्य घूर्णन करते मानवीय अस्तित्व के अंतिम शीर्ष लक्ष्य की ओर उन्मुख होने का आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो। मनुष्य का जीवन केवल भौतिक संघर्ष द्वारा ही परास्त नहीं होता। यह वैचारिक एवं मानसिक संघर्ष द्वारा भी अधि सीमा तक दुष्प्रभावित होता है। इन दोनों ही संघर्षों में आत्मबल बृहद सहायक भूमिका में होता है। आत्मबल का जीवंत एवं शाश्वत स्रोत अध्यात्म है। अध्यात्म की श्रेष्ठ उपलब्धियां जिन माध्यमों से साकार होती हैं, महाकुंभ की पारंपरिक उत्सवधर्मिता उनमें सर्वश्रेष्ठ है। साधु-संतों, ऋषियों-मुनियों की अंतर्दृष्टि में महाकुंभ त्याग, तपस्या, साधना, ध्यान, भक्ति, आस्था, प्रकृति के प्रति गहन समर्पण, लोक-समाज के लिए व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार दायित्व भावना के उदय तथा अंतत: जीवन-मृत्यु के अबूझ कालचक्र से स्थायी मुक्ति प्राप्त करने का आध्यात्मिक उपाय है। कुंभ एक गहन आध्यात्मिक विस्तार है। महाकुंभ का मर्म अत्यंत वृहद है।-विकेश कुमार बडोला

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