एक दौर की शान, आज बना खंडहर… दिल्ली का पहला मॉल अंसल प्लाजा बन गया है ‘भूतिया शहर’,

क्या आप जानते हैं देश की राजधानी दिल्ली का पहला मॉल कौन सा था. अगर नहीं तो आपको बता दें कि दिल्ली का पहला आधुनिक शॉपिंग मॉल अंसल प्लाजा था. यह माल आज भी अपनी जगह मौजूद है, लेकिन अब यहां पर सन्नाटा रहता है. लोग इसे भूतिया घर कहते हैं. इमारत काफी हद तक जर्जर हो गई है. आज यहां पर जाने से लोग कतराते हैं. ऐसा क्यों चलिए बताते हैं आपको. अंसल प्लाजा देश की राजधानी दिल्ली का पहला मॉल है. यह मॉल साल 1999 में दक्षिण दिल्ली (एंड्रयूज़ गंज के पास) में खुला था. उस समय यह दिल्ली का पहला बड़ा, मल्टी-ब्रांड, एयर-कंडीशन्ड शॉपिंग मॉल माना जाता था. यहां पर रिटेल स्टोर्स, फूड कोर्ट, सिनेमा और ओपन-एयर प्लाज़ा जैसी सुविधाएं थीं. यह माल आज भी अपनी जगह मौजूद है, लेकिन अब यहां पर वैसी रौनक नहीं है.
यहां पर काम करने वाले सबसे बुजुर्ग गार्ड ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि वह उद्घाटन के समय काफी छोटे थे. तभी से यहां पर गार्ड की नौकरी कर रहे हैं. एक वक्त ऐसा था. जब यहां पर कदम रखने लायक भी जगह नहीं होती थी. दिन भर चहल-पहल होती थी. यहां पर लोग आकर बैठते थे. उस जमाने का यह इकलौता मॉल आया था, जिसने दिल्ली में मॉल कल्चर को बढ़ावा दिया था. पहली बार लोगों ने मॉल कल्चर देखा था.
गार्ड ने यह भी बताया कि 1999 में पहली बार यहां पर मैकडॉनल्ड्स आया था. जो कि यहां का डेटिंग स्पॉट बन गया था. इसके अलावा एम्फीथिएटर था. जहां पर इवेंट्स होते थे और पहली बार यहां पर लोगों ने लाइव कंसर्ट देखे थे. यहां पर म्यूजिक वर्ल्ड था. जहां कैसेट और सीडी की दुनिया थी. अभी सब कुछ गायब हो चुका है. यहां सिर्फ मैकडॉनल्ड्स बचा हुआ है. इसकी वजह से ही थोड़ी बहुत जनता यहां आ जाती है. वरना यहां पर हमेशा सन्नाटा पसरा रहता है.
अंसल प्लाजा देखने में बेहद खूबसूरत है. इसके पीछे एक बड़ा सा पार्क है. एक मॉल से दूसरे मॉल के अंदर जाने के लिए यानी इसके आमने-सामने दो बिल्डिंग हैं और अंदर जाने के लिए बाहर से ही एक फ्लाईओवर बना है. यानी आपको एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग में जाने के लिए रास्ते का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा. बल्कि दोनों मॉल एक दूसरी बिल्डिंग से फ्लाईओवर के जरिए जुड़े हुए हैं. इस वजह से यह दोनों एक दूसरे को बेहद खास बनाते हैं.
लेकिन जैसे-जैसे वक्त बदला वैसे-वैसे दिल्ली के पहले मॉल ने अपनी रौनक खो दी. अब यह बिल्डिंग अंदर से काफी जर्जर हो चुकी है और यहां पर अब दिनभर सन्नाटा पसरा रहता है. अब यहां पर सिर्फ स्पा सेंटर चलते हैं. एक दो रेस्टोरेंट है. इसके अलावा यहां पर अब कुछ भी नहीं बचा है. अब यहां पर जल्दी कोई जाता नहीं है.
यहां पर बेसमेंट पार्किंग भी है, जो एक वक्त पर पूरी तरह से फुल रहती थी, लेकिन अब पार्किंग खाली पड़ी हुई है. मॉल के अंदर सन्नाटा है. रेस्टोरेंट खाली पड़े हुए हैं और पहले जैसी चहल-पहल अब यहां पर नहीं है, क्योंकि यह दिल्ली के ऐसी जगह पर मौजूद है. जहां जल्दी शाम और रात के वक्त लोग जाने से डरते हैं. इसीलिए लोगों ने इसे भूतिया घर का नाम दे दिया है, लेकिन असल में यह भूतिया घर नहीं है. यह सिर्फ अपनी पुरानी रौनक खोने की वजह से अब वीरान पड़ा हुआ है.
यहां पर काम करने वाले लोगों का मानना है कि राजधानी दिल्ली के इस पहले मॉल के बर्बाद होने के पीछे बड़ी वजह यह है कि अब यहां पर एक से बढ़कर एक शानदार मॉल खुल चुके हैं. पहले यह एक मात्र ऐसी जगह थी जो पिकनिक स्पॉट भी थी और मॉल कल्चर था, लेकिन अब विकास के चलते यह मॉल सन्नाटे में रहता है. एक्सीलेटर चलते नहीं है. जो दुकाने हैं उन पर ताला लगा हुआ है. 2016 में इसे रीलॉन्च किया गया था, लेकिन वह भी फेल हो गया.
अब इस जगह पर सिर्फ काम करने वाले मजदूर, सड़क पर घूमते हुए कुत्ते और स्पा सेंटर में काम करने वाले लोग ही नजर आते हैं. आम पब्लिक, आम जनता अब यहां पर नहीं जाती है. बहुत कम अब यहां पर कभी कभार लोग नजर आ जाएंगे. वरना यहां पर ज्यादातर सन्नाटा रहता है. देश का पहला मॉल अब जर्जर हो चुका है और जिस मॉल ने दिल्ली वालों को मॉल कल्चर से रूबरू कराया अब वह अपना अस्तित्व बचाते हुए नजर आ रहा है.



