संपादकीय

तुलसी को तुलसीदास बनाने वाली विस्मृत

रत्नावली का भी स्मारक बनना चाहिए। अयोध्या जी के राम मंदिर में जहां तुलसीदास जी विराजमान होंगे, वहां रत्नावली क्यों नहीं? वैसे भी हमारे देश में तो यह माना ही जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं, पर रत्नावली केवल पूजा की ही अधिकारी नहीं, अपितु वह तो तुलसीदास जी को गृहस्थ आश्रम की मोहमाया से मुक्त करके गोस्वामी तुलसीदास बनाने वाली है। यह देश को याद रखना होगा और आज तक जो सम्मान हम रत्नावली को नहीं दे सके अब देना ही चाहिए। हम कृतज्ञ हैं मैथिलीशरण गुप्त जी के जिन्होंने भगवान बुद्ध की पत्नी यशोधरा और लक्ष्मण पत्नी उर्मिला को अपने काव्य द्वारा गौरवान्वित किया, जन-जन तक पहुंचाया। अब रत्नावली की ओर भी किसी महाकवि की लेखनी और धर्म गुरुओं का ध्यान जाना ही चाहिए…

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस जैसे महान महाकाव्य की रचना करके हर घर में सरल भाषा में राम नाम पहुंचा दिया। गोस्वामी तुलसीदास जी के लिए एक महाकवि ने लिखा : सुरतिय, नरतिय, नागतिय अस चाहती सब कोय, गोद लिए हुलसी फिरें तुलसी सो सुत होय।। अर्थात देवता, मानव आदि सभी वर्णों, जातियों की महिलाएं बड़ी प्रसन्नता के साथ गोद में अपने-अपने बालक को लेकर अर्थात जन्म देने की प्रक्रिया पूरी करते हुए बहुत हुलसित रहती हैं, क्योंकि सबकी यही चाह होती है कि तुलसी जैसा पुत्र हो। यहां हुलसी का अर्थ प्रसन्न भी है और हुलसी तुलसीदास जी की माता का नाम भी है। सभी माताएं तुलसी जैसा पुत्र पाने की अभिलाषा के साथ ही हर्षित होकर गर्भ धारण करतीं, प्रसव पीड़ा सहतीं और योग्य संतान पाकर हर्षित होती। हर मां तुलसीदास जी जैसी संतान पाकर बहुत ज्यादा गौरवान्वित अनुभव करतीं, पर तुलसी तो कई पैदा हुए, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास तो एक ही बन सका और वह पूरे विश्व में जहां-जहां भारतीय समाज, सनातनी, हिंदू बसे हैं वहां तक रामचरितमानस घरों की शोभा बन चुका है और दैनिक जीवन में भी रामचरितमानस के दोहे, चौपाइयां गाता, दोहराता है। रघुकुल रीत सदा चला आई, प्राण जाई पर वचन न जाई। यह भारतीय जीवन का आदर्श बन गया, यद्यपि आज राजनीति में वचन का कोई महत्व नहीं रहा, पर राम जी में था, राम राज्य में था। हम भारतीय कृतज्ञ हैं। कृतज्ञता हमारे चरित्र, संस्कृति का स्वभाव है, प्रमुख गुण है, पर आज तक मैं यह नहीं समझ पाई कि जिस रत्नावली जी के कारण तुलसी तुलसीदास बन गए, उस रत्नावली को समाज और देश क्यों भूल गया। सभी जानते हैं कि तुलसीदास जी के माता-पिता ने उसे गंडमूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण त्याग दिया था। उसका पालन-पोषण पहले एक धाय द्वारा और बाद में गुरु के आश्रम में हुआ।

गुरुजी से विद्या प्राप्त करने के पश्चात तुलसीदास जी ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और रत्नावली उनकी अर्धांगिनी बनी। रत्नावली एक विदुषी थीं, जिनका जन्म सम्वत् 1577 विक्रमी में जनपद कासगंज के सोरों शूकरक्षेत्र अन्तर्वेदी भागीरथी गंगा के पश्चिमी तटस्थ बदरिया (बदरिका/बदरी) नामक गांव में हुआ था। विदुषी रत्नावली के पिता का नाम पंडित दीनबंधु पाठक एवं माता दयावती थीं। विदुषी रत्नावली का पाणिग्रहण सम्वत् 1589 विक्रमी में सोरों शूकरक्षेत्र निवासी पंडित आत्माराम शुक्ल के पुत्र पंडित तुलसीदास जी के साथ हुआ। सम्वत् 1604 विक्रमी में जब रत्नावली मात्र 27 वर्ष की ही थीं, तब एक बार तुलसीदास जी रत्नावली के मायके ही उसके पास पहुंच गए। आज के युग में यह असाधारण नहीं लगता। निश्चित ही उस युग में इसे उचित नहीं माना जाता होगा। विदुषी रत्नावली ने अपने पति से कहा : लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ। धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥ अस्थि चर्म मय देह मम तामे जैसी प्रीति। तैसी जौ श्री राम महं होति न तौ भवभीति॥ इस घटना से तुलसीदास जी की मानो अंतर्चेतना एक नई चमक से भर गई और उसी समय तुलसीदास घर से वाराणसी पहुंच गए। उन्हें श्री नरहरिदास जैसे महान गुरु मिल गए और लौह पारस संयोग से तुलसी तुलसीदास बने। युगों युगों के लिए अमर हो गए। हर घर पहुंच गए। तुलसीदास जी के मंदिर बने। उनकी आरती हो रही है। वैष्णव परंपरा के अनुसार ही भोग भी लगते हैं और भक्ति का वरदान भी तुलसीदास जी से ही मांगा जा रहा है।

तुलसीदास का हनुमान चालीसा हर श्रद्धालु के लिए रक्षा कवच है, पर एक यक्ष प्रश्न है : उसका उत्तर मिलना तो दूर, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। हम शेष सनातन जी को याद करते हैं, नरहरिदास जी को प्रणाम करते हैं जिन्होंने तुलसी को विद्या दी और तुलसीदास ने रामचरितमानस, विनय पत्रिका, दोहावली जैसे महान ग्रंथों की रचना की, पर रत्नावली को क्यों याद नहीं किया जाता। वास्तविक गुरु तो रत्नावली है। रत्नावली अगर पति को राम भक्ति की याद न करवाती और अपने शरीर को हड्डी मांस का संयोग कहकर ही तुलसीदास को रघुनाथ से प्रीति का संदेश न देती तो तुलसी तुलसीदास कैसे बनते। क्यों यह कहा जाता कि हर मां हुलसित फिरे, क्योंकि तुलसीदास जैसा पुत्र चाहती है। यह संभवत: अपने देश का एक स्वभाव हो गया। यह तो सभी कहते हैं कि हर महान पुरुष के पीछे एक महान नारी रहती है। वह मां भी हो सकती है जीजाबाई की तरह, वह पत्नी भी हो सकती है कालिदास की पत्नी की तरह। वह विदुषी भी हो सकती है मंडनमिश्र की पत्नी की तरह और भगवान बुद्ध की यशोधरा जैसी। आज के युग में भी चाफेकर बंधुओं की मां, वीर सावरकर की पत्नी, रामप्रसाद बिस्लिम की बहन, चंद्रशेखर आजाद की मां और दुर्गा भाभी जैसी अनेक वीरांगनाएं विस्मृति के अंधेरों में खो चुकी हैं। कोई विरला ही उन्हें याद करता है। यह ठीक है कि मां जीजाबाई का नाम अधिक लिया जाता है, पर किसी ने आज तक यह नहीं कहा कि वेदों की महान विदुषियां 26 महिलाएं ऋषि थीं। वेद मंत्रों की रचना भी की और उनकी संसार को अद्भुत देन थी। सत्य तो यह है कि महारानी झांसी लक्ष्मीबाई, झलकारी, चन्नमा, अहिल्या बाई होल्कर जैसी कुछ भारत की बेटियां जो नेतृत्व करती हुईं स्वयं सेनापति बनकर शत्रुओं से लोहा लेती रही, उनके अतिरिक्त महिमामयी महिलाओं का महिमामंडन बहुत कम किया गया।

आज जब हमारे प्रधानमंत्री जी ने भगवान श्रीरामजी के भव्य मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा समारोह में बहुत धार्मिक अनुष्ठान किए, गोस्वामी तुलसीदास जी का भी गुणगान किया जा रहा है, मेरा यह निवेदन है कि तुलसीदास जी के साथ ही उनकी गुरु रत्नावली को भी सभी मंदिरों में स्थान मिलना चाहिए। रत्नावली का भी स्मारक बनना चाहिए। अयोध्या जी के राम मंदिर में जहां तुलसीदास जी विराजमान होंगे, वहां रत्नावली क्यों नहीं? वैसे भी हमारे देश में तो यह माना ही जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं, पर रत्नावली केवल पूजा की ही अधिकारी नहीं, अपितु वह तो तुलसीदास जी को गृहस्थ आश्रम की मोहमाया से मुक्त करके गोस्वामी तुलसीदास बनाने वाली है। यह देश को याद रखना होगा और आज तक जो सम्मान हम रत्नावली को नहीं दे सके अब देना ही चाहिए। हम कृतज्ञ हैं मैथिलीशरण गुप्त जी के जिन्होंने भगवान बुद्ध की पत्नी यशोधरा और लक्ष्मण पत्नी उर्मिला को अपने काव्य द्वारा गौरवान्वित किया, जन जन तक पहुंचाया। अब रत्नावली के लिए भी तो किसी महा कवि की लेखनी और धर्म गुरुओं का ध्यान जाना ही चाहिए। रत्नावली के ऋण से मुक्त होना हमारा कत्र्तव्य है। उसने हमें गोस्वामी तुलसीदास दिए, हम रत्नावली को तुलसी की गुरु का सम्मान दें। यह समय की मांग है।

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