संपादकीय

अर्थव्यवस्था ने पहली तिमाही में दिखाई ताकत, लेकिन जोखिम अभी भी

जून तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी जो पांच तिमाहियों में उच्चतम है। सकल मूल्य वर्धन को अर्थव्यवस्था का बेहतर संकेतक माना जाता है और उसमें 7.6 फीसदी की वृद्धि

आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुमानों ने अर्थव्यवस्था के जानकारों और पूर्वानुमान लगाने वालों को चौंकाया है। गत सप्ताह जारी आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि जून तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी जो पांच तिमाहियों में उच्चतम है। सकल मूल्य वर्धन को अर्थव्यवस्था का बेहतर संकेतक माना जाता है और उसमें 7.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस तिमाही के लिए 6.5 फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया था। बहरहाल, इस स्तर की वृद्धि को बरकरार रखना या रिजर्व बैंक के पूरे वर्ष के 6.5 फीसदी के लक्ष्य को हासिल करना विपरीत कारोबारी माहौल में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था के लगभग सभी हिस्सों ने वृद्धि को बल दिया। कृषि क्षेत्र पिछले वर्ष की समान अवधि के 1.5 फीसदी की तुलना में 3.7 फीसदी की दर से बढ़ा। विनिर्माण क्षेत्र ने 7.7 फीसदी की दर से वृद्धि दर्ज की जबकि गत वर्ष की समान अवधि में यह 7.6 फीसदी की दर से बढ़ा था। सेवा क्षेत्र भी पिछले साल की तुलना में तेज गति से बढ़ा जबकि खनन और उत्खनन में कमी आई। निर्माण क्षेत्र में मंदी आई।

उच्च वृद्धि को एक हद तक सरकारी व्यय से मदद मिली जो इस तिमाही में 7.4 फीसदी बढ़ा। गत वर्ष की पहली तिमाही में आम चुनाव के कारण सरकारी व्यय सीमित था। यह सरकारी खातों में भी नजर आया। केंद्र सरकार ने पहली तिमाही में वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का लगभग एक-चौथाई हिस्सा खर्च किया, जबकि पिछले वर्ष इसी तिमाही में यह केवल लगभग 16 फीसदी था।

पहली तिमाही के आंकड़े उत्साह बढ़ाने वाले हैं जबकि यहां से हालात कठिन हो सकते हैं। वृद्धि के समक्ष सबसे बड़ा जोखिम अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्कों का है। अनुमान बताते हैं कि करीब 66 फीसदी भारतीय निर्यात को 50 फीसदी या उससे अधिक शुल्क का सामना करना होगा। वृद्धि पर इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि यह शुल्क कितने लंबे समय तक लागू रहता है।

अगर इस स्तर का शुल्क कुछ तिमाहियों तक भी लागू रहा तो यह रोजगार और घरेलू मांग को प्रभावित करना शुरू कर देगा। सरकार जहां इसके असर को कम करने को लेकर काम कर रही है, वहीं मांग को पहुंचे संभावित नुकसान की भरपाई मुश्किल होगी। ऐसे में आने वाली तिमाहियों में वृद्धि मोटे तौर पर भारत-अमेरिका रिश्तों में सुधार पर निर्भर होगी।

इसके अलावा, वर्तमान तिमाही की वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि कई परिवार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में संभावित कटौती की उम्मीद के चलते अपने खरीदारी के फैसले टाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, कारों सहित कई वस्तुओं पर जीएसटी दरों में कमी की संभावना है। हालांकि, इसका असर केवल एक तिमाही तक सीमित रह सकता है, क्योंकि जैसे ही जीएसटी दरें समायोजित होंगी, मांग फिर से बढ़ जाएगी।

मांग से जुड़ी चिंताओं के अलावा एक और बड़ी समस्या है नॉमिनल वृद्धि की कमी। वर्तमान कीमतों पर, पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि केवल 8.8 फीसदी रही। चूंकि आने वाली तिमाहियों में महंगाई दर कम रहने की संभावना है, ऐसे में नॉमिनल वृद्धि इसी स्तर पर या इससे भी कम रह सकती है।

ऐसे में राजकोषीय लक्ष्यों को हासिल करना कठिन हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, आगामी जीएसटी समीक्षा से राजस्व पर भी असर पड़ सकता है, कम से कम अल्पकालिक रूप में। ऐसे में सरकार को कई उभरती चुनौतियों का समाधान करना होगा। यह एक चुनौतीपूर्ण वित्तीय वर्ष साबित हो सकता है, जिसमें सरकार को बेहद सतर्कता से कदम उठाने होंगे।

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