संपादकीय

मणिपुर का विभाजन यथावत

प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर को भारत माता के मुकुट का ‘सुशोभित रत्न’ माना है। उन्होंने हिंसा को न केवल दुर्भाग्यपूर्ण माना है, बल्कि आने वाली पीढिय़ों से घोर अन्याय भी करार दिया है। प्रधानमंत्री ने शांति और स्थिरता का आह्वान किया है, क्योंकि यही विकास का रास्ता है। बेशक प्रधानमंत्री के कथन उचित हैं, क्योंकि देश के नेता को तनावग्रस्त, हिंसक, विभाजक समुदायों को ऐसी ही तसल्ली देनी चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्रालय भी बीते दो सालों में मणिपुर के मैतेई और कुकी समुदायों को मेज पर लाया है और उनमें संवाद का सिलसिला शुरू कराया है। संवाद की सफलता अभी दूर की कौड़ी है, क्योंकि कुकी-जो समुदाय के 10 विधायकों ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन देकर स्पष्ट किया है कि दोनों समुदाय एक छत के नीचे, साथ-साथ, नहीं रह सकते, लिहाजा उन्हें संघशासित क्षेत्र बना दिया जाए और विधानसभा भी दी जाए। दोनों अच्छे पड़ोसी की तरह रह सकते हैं। प्रधानमंत्री ने अभी कोई आश्वासन नहीं दिया है, लेकिन जिन 10 विधायकों ने ज्ञापन दिया है, उनमें 7 भाजपा विधायकों के हस्ताक्षर हैं। प्रधानमंत्री मोदी, अंतत:, मणिपुर गए, यह स्वागतयोग्य है। विपक्ष की आलोचना अपनी जगह है। प्रधानमंत्री की व्यस्तता चौतरफा होती है, लेकिन उनकी सरकार ने मणिपुर के तनाव और ज्वाला को अनदेखा कभी नहीं किया। खुद गृहमंत्री अमित शाह कई दिन मणिपुर में डेरा डाले रहे। जो अधिकारी गृह सचिव होते थे, उन्हीं अजय भल्ला को मणिपुर का राज्यपाल बनाया गया। वह समस्याओं को बारीकी से समझते हैं। फिर भी सवाल किए जा सकते हैं कि 2023 की जातीय हिंसा, मार-काट, बलात्कार, महिलाओं का नग्न प्रदर्शन, हथियारों की लूट और अवैध जमावड़े के खौफनाक परिदृश्य के बाद ही प्रधानमंत्री को अब समय क्यों मिला? यकीनन मणिपुर के जातीय तनाव और हत्यारी हिंसा में 260 लोग मारे गए। 1500 से अधिक घायल हुए। करीब 60,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

सैकड़ों गांव जला दिए गए। हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में हैं। चुराचांदपुर जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी, 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रवास के बाद, दूसरे प्रधानमंत्री हैं। अलबत्ता 2014-22 के दौरान प्रधानमंत्री मोदी 7 बार पूर्वोत्तर राज्यों में गए और उनके सरोकारों को साझा किया। बेशक पूर्वोत्तर, शेष देश के साथ उसका जुड़ाव और चौतरफा विकास मोदी सरकार की गंभीर प्राथमिकताओं में शामिल रहे हैं। सबसे ताजा उदाहरण यह है कि मिजोरम को राजधानी एक्सप्रेस टे्रन के जरिए नई दिल्ली से जोडऩा गौरवमय प्रयास है और पहाड़ी राज्यों को रेलमार्ग से जोडऩे की क्रांतिकारी पहल भी है। ऐसा ही एक कठिन और दुर्लभ प्रयास कश्मीर में भी किया गया है, लेकिन ऐसी संभावनाएं हिमाचल में साकार नहीं हो पा रही हैं। बहरहाल मणिपुर का मुद्दा फिलहाल घोर संवेदनशील है। 2023 में मणिपुर उच्च न्यायालय ने मैतेई समुदाय को ‘अनुसूचित जनजाति’ का दर्जा देने पर विचार करने का जो फैसला सुनाया था और जिसके बाद मैतेई-कुकी समुदाय एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे, वह मुद्दा आज भी यथावत है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना पड़ेगा कि वह दोनों समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के पक्ष में हैं अथवा किसी और समाधान पर विचार कर रहे हैं! दोनों समुदायों के बीच विभाजन की रेखा इतनी गहरी खिंच चुकी है कि कोई सामान्य समाधान स्वीकार्य नहीं होगा। मणिपुर में मैतेई आबादी 53 फीसदी है। जिन इलाके में वे बसे हुए हैं, उसे घाटी कहते हैं। कुकी पहाडिय़ों में रहते हैं। पूर्वोत्तर के इस सूबे में आज उग्रवाद उतना नहीं है, जितना कांग्रेस सरकारों के दौरान होता था, लेकिन म्यांमार का अफीम माफिया जिस स्तर पर मणिपुर में सक्रिय है, वह उग्रवाद से भी बदतर है। हालांकि प्रधानमंत्री ने 8500 करोड़ रुपए की परियोजनाओं के शिलान्यास किए हैं। केंद्र की ओर से 3000 करोड़ रुपए का विशेष पुनर्वास पैकेज भी घोषित किया है। विस्थापितों और पीडि़तों के लिए 500 करोड़ के पैकेज की घोषणा की है। प्रधानमंत्री के सामने मणिपुर की समस्या पेचीदा है।

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