चुनावी बिगुल बजने से पहले बिछने लगी बिसात

लोकसभा चुनाव का बिगुल शायद मार्च के मध्य में बजे, पर बिसात बिछनी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा तो हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं, पर नीतीश कुमार और जयंत चौधरी के अलगाव से बिखराव के कगार पर दिख रहे विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की गाड़ी भी पटरी पर वापस लौट रही है। सपा और ‘आप’ के साथ कांग्रेस का सीट बंटवारा हो चुका है तो तृणमूल कांग्रेस से बातचीत निर्णायक दौर में बताई जा रही है। महाराष्ट्र में भी राहुल गांधी और शरद पवार में संवाद से सब कुछ तय हो जाने के दावे किए जा रहे हैं।
दरअसल मोदी की भाजपा को अपनी सरकार की ‘हैट्रिक’ में जिन-जिन राज्यों में मुश्किलें पेश आ सकती थीं, वहां ऐसी पेशबंदी की गई कि चुनाव से पहले ही पासा पलटता दिखे। ऐसे राज्य मुख्यत: 3 थे-महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश। पिछले लोकसभा चुनाव का समीकरण टूट जाने से 48 सीटों वाले महाराष्ट्र और 40 सीटों वाले बिहार में भाजपा या एन.डी.ए. की सीटें घट जाने की आशंका थी, तो उनकी भरपाई के लिए उत्तर प्रदेश में अपना समीकरण और मजबूत बनाना जरूरी था।
सेंधमारी से शुरूआत : इसकी शुरूआत ‘हैट्रिक’ का नारा देने और ‘इंडिया’ बनने से भी बहुत पहले महाराष्ट्र में शिवसेना में विभाजन के जरिए उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार गिराने से हुई। सरकार गिरने के बाद उद्धव और अघाड़ी का फोकस असली-नकली शिवसेना पर रहा, पर कमजोर कड़ी की भाजपाई रणनीतिकारों की तलाश वहीं नहीं रुकी। अगला टार्गेट बनी मराठा दिग्गज शरद पवार की एन.सी.पी. भतीजे अजित पवार पर भरोसा कर एक बार अपने हाथ झुलसा चुकी भाजपा ने इस बार एन.सी.पी. में निर्णायक टूट के आप्रेशन को खुद अंजाम दिया।
चेहरा महत्वाकांक्षी अजित ही बने, जो शरद पवार द्वारा उत्तराधिकार के लिए बेटी सुप्रिया सुले को आगे करने से ठगा-सा महसूस कर रहे थे। यह ऑप्रेशन मुख्यमंत्री बनाए गए एकनाथ शिंदे के साथ बगावत करने वाले शिवसेना विधायकों पर लटकती अयोग्यता की तलवार के मद्देनजर भी जरूरी था। राजनीतिक दलों के असली-नकली होने का असली फैसला जनता की अदालत में होता है। शिवसेना और एन.सी.पी. के बारे में अंतिम निर्णय के लिए भी निगाहें लोकसभा चुनाव पर लगी रहेंगी, लेकिन विभाजन से उद्धव ठाकरे और शरद पवार की ताकत कम तो हुई है। विपक्ष की ताकत में कमी भाजपा को अनुमानित नुकसान की कितनी भरपाई कर पाएगी यह देखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ठाकरे के साथ होने पर एन.डी.ए. ने पिछले चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। ‘इंडिया’ गठबंधन में सीट बंटवारा सौहार्दपूर्वक हो जाता है, तो तय है कि प्रकाश आंबेडकर के वंचित अघाड़ी के साथ आ जाने से उसके हौसले बुलंद होंगे।
एक तीर से कई निशाने : महाराष्ट्र के बाद बिहार बेहद संवेदनशील था। पिछली बार जब नीतीश साथ थे, तो एन.डी.ए. 40 में से 39 सीटें जीतने में सफल रहा था। उनके विपक्षी दलों के साथ चले जाने से समीकरण गड़बड़ाता दिख रहा था। ‘इंडिया’ के सूत्रधार बन नीतीश देश भर में घूम रहे थे, उससे भी कुछ असहज माहौल बन रहा था। इसलिए नीतीश को ही वापस अपने पाले में लाकर एक तीर से कई निशाने साधे गए। पहला बड़ा संदेश तो यही गया कि जो विपक्षी एकता के सूत्रधार थे, वही पाला बदल कर इधर आ गए।
दूसरा, नीतीश ने जिस तरह कांग्रेस पर प्रहार किए, उससे भी भाजपा का व्यापक लक्ष्य सधा। नीतीश के पाला बदल कर फिर भाजपा के साथ सरकार बना लेने के बाद ‘इंडिया’ में जैसा सन्नाटा पसरा, उससे भी पुष्टि हुई कि तीर एकदम निशाने पर लगा। मल्लिकार्जुन खरगे से लेकर जयराम रमेश तक ने नीतीश पर जो भी आरोप लगाए, वे ‘इंडिया’ के भविष्य पर लगते सवालिया निशान को मिटाते नहीं दिखे।
‘इंडिया’ उस झटके से उभर पाता, उससे पहले ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक और ऑप्रेशन को अंजाम दे दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती के अलग चुनाव लडऩे के ऐलान को पहला ऑपरेशन मान लें तो रालोद प्रमुख जयंत चौधरी का ‘इंडिया’ से अलगाव दूसरा बड़ा ऑप्रेशन रहा। इसका संकेत पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को ‘भारत रत्न’ की घोषणा से मिला, जिसकी पुष्टि जयंत के इस ट्वीट से हो गई ‘दिल जीत लिया’।
वापस पटरी पर ‘इंडिया’ : नीतीश के बाद जयंत चौधरी के झटके से लगा था कि ‘इंडिया’ इतिहास की बात है, क्योंकि 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस तो क्रमश: 13 और 7 सीटों वाले पंजाब और दिल्ली में ‘आप’ भी अलग चुनाव लडऩे की बात कह चुकी थी, लेकिन 21 फरवरी को सपा और कांग्रेस के बीच अचानक हुए सीट बंटबारे के बाद समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस 17 सीटों पर मान ही गई, जिस सपा को विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में एक भी सीट देने लायक नहीं समझा था, उसे अब खजुराहो लोकसभा सीट दे दी गई।
अब ‘आप’ और कांग्रेस में दिल्ली ही नहीं, बल्कि गुजरात, गोवा, हरियाणा और चंडीगढ़ में भी सीट बंटवारा हो गया है। ‘आप’ ने दिल्ली में कांग्रेस को 3 सीटें दी हैं तो बदले में गुजरात में उसे 2 सीटें मिल गई हैं। इन दोनों राज्यों में अब भाजपा के लिए क्लीन स्वीप आसान नहीं होगा। गोवा की दोनों और चंडीगढ़ की एकमात्र सीट कांग्रेस को मिली हैं। पंजाब में दोनों दलों ने गठबंधन न करना बेहतर समझा है। अगर ममता बनर्जी असम और मेघालय में सीट मिलने पर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को 2 सीटों से ज्यादा देने पर मान जाती हैं, तो वहां भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हालांकि वाम मोर्चा की भूमिका पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा।
विश्वसनीयता उन मुद्दों पर जनमत जगाने और जनादेश हासिल करने के लिए भी अहम् है, जिन पर ‘इंडिया’ चुनाव में मोदी सरकार को घेरना चाहेगा। सीट बंटवारा आसान नहीं होगा, लेकिन वैसी अराजकता वहां नजर नहीं आती, जैसी नवंबर में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद ‘इंडिया’ में नजर आई। लोकसभा चुनाव की घोषणा दूर नहीं है, पर ‘इंडिया’ पी.एम. फेस तो दूर, संयोजक और सांझा न्यूनतम कार्यक्रम तक तय नहीं कर पाया है।-राजकुमार सिंह



