व्यापार

सोने में रिकॉर्ड तेजी की ये है सबसे बड़ी वजह, अमेरिका से सीधा कनेक्शन? 

 शादियों के सीजन में सोने की कीमतें दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही हैं। हालांकि, इसका कारण अंतरराष्ट्रीय है। सोने की कीमतों का ग्राफ देखें, जो साल भर में ग्लोबल मार्केट में 70% और भारत में 76% चढ़ गया है।

साल भर पहले की तुलना में दुनिया अभी थोड़ी शांत दिख रही है। पूर्वी यूरोप में यूक्रेन का मोर्चा पहले जैसा ही है, लेकिन पूर्वी एशिया में ताइवान और पश्चिमी एशिया में फिलिस्तीन का मोर्चा ठंडा माना जा सकता है। लेकिन, सतह के नीचे बहुत गहरी बेचैनी, कुछ बहुत बुरा घटित हो जाने का डर वैश्विक अर्थव्यवस्था को सता रहा है। उसका बुखार नापना हो तो सोने की कीमतों का ग्राफ देखें, जो साल भर में ग्लोबल मार्केट में 70% और भारत में 76% चढ़ गया है। बीच में सोने-चांदी में एक बड़ी गिरावट भी आई, लेकिन अभी हालात वापस पहले जैसे हो गए हैं।

इतिहास से तुलना

अतीत में ऐसा कुछ भीषण बदलावों के समय ही देखा गया है। 1974 में डॉलर की कीमत स्थिर रखने वाला ब्रेटन-वुड्स समझौता खत्म होने पर, 1979-80 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद खाड़ी क्षेत्र की उथल-पुथल के वक्त और 2010 में अमेरिकी वित्त प्रणाली के हिल जाने से पैदा हुई महामंदी के प्रभाव में। ऐसी कोई विश्वव्यापी उथल-पुथल तो अभी कहीं देखी नहीं जा रही है, फिर सोने की कीमतें रॉकेट का मुकाबला क्यों कर रहीं?

डॉलर की कीमत

मामले का दूसरा पहलू डॉलर की कीमत गिरने का है। डॉलर का बाजार भाव दुनिया की बाकी ताकतवर मुद्राओं-पाउंड, यूरो, येन, युआन (रेनमिनबी) वगैरह के एक बास्केट के बरक्स नापा जाता है। 2025 में डॉलर 10% के आसपास सस्ता हुआ है। ध्यान रहे, अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी अच्छी हालत में है। फिर डॉलर का वजन कम होने की क्या वजह हो सकती है? अमेरिकी राष्ट्रपति (Donald Trump) इसे अपने लिए समस्या नहीं मानते, क्योंकि सस्ता डॉलर अमेरिकी निर्यात के लिए अच्छा है, पर विश्व अर्थव्यवस्था के लिए यह चिंता की बात है।

बदलता ट्रेंड

IMF का हाल में जारी आंकड़ा बताता है कि 1999 में दुनिया के सारे केंद्रीय बैंकों के खजाने (फॉरेन एक्सचेंज) का 71% हिस्सा डॉलर या अमेरिकी बॉन्ड्स का था, जो 2024 आते-आते 58.5% रह गया। केंद्रीय बैंकों की प्रवृत्ति अभी अपने खजाने में सोने का हिस्सा बढ़ाने की है। अन्य शक्तिशाली मुद्राएं भी ज्यादा रखने लगे हैं।

भारत पर असर

  • महंगा सोना, सस्ता डॉलर इतना भी अच्छा नहीं
  • डॉलर मजबूत होता तो रुपया और नीचे जाता
  • मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़कर 17% हुआ
  • दुनियाभर के राष्ट्रीय बैंक डॉलर से जा रहे दूर

सोने का स्टॉक

पिछले एक साल में डॉलर निकालकर सोना बढ़ाने की प्रवृत्ति और तेज हुई है, हालांकि इसका ऑफिशियल डेटा अगले साल ही मिलेगा। ऐसे आंकड़े लगातार आ रहे हैं कि दुनिया के लगभग सारे ही केंद्रीय बैंक कोरोना के बाद से अपना सोने का स्टॉक तेजी से बढ़ा रहे हैं। सोना महंगा होने की सबसे बड़ी वजह यही है। लेकिन, जैसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए सोने की ज्यादा खरीदारी ठीक नहीं होती, वैसे ही विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी इसके अपने नुकसान हैं। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि जो राष्ट्रीय धन अर्थव्यवस्था को हरकत में रखने के काम आना चाहिए, वह लॉकरों में जमा होने लगा है।

ट्रंप की चेतावनी

IMF के इस डेटा ने डी-डॉलराइजेशन वाली उस बहस को फिर से तेज कर दिया है, जिसका किस्सा खत्म करने के लिए डॉनल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी। उन्होंने ब्रिक्स देशों को चेताया था कि डॉलर से दूर हटे तो 100% टैरिफ लगा देंगे। इस धमकी से न सही, ट्रंप और पूतिन की आपसी समझदारी से ही ब्रिक्स की डी-डॉलराइजेशन पहलकदमी फिलहाल रुक गई है। लेकिन, IMF की मानें तो ऐसा होगा जरूर।

ट्रंप की पॉलिसी

विश्लेषक फिलहाल सोने की गरमी और डॉलर की नरमी की अकेली वजह ट्रंप की तुनकमिजाजी को बता रहे हैं, जो बात-बात पर टैरिफ की धमकी देते हैं। लेकिन, मामला इससे ज्यादा गहरा है। देशों के आर-पार मुद्रा की आवाजाही की अंतरराष्ट्रीय प्रणाली SWIFT का नियंत्रण पूरी तरह से अमेरिका के हाथ में रहा है। सबसे पहले 2014 में रूस के खिलाफ इसका दंडात्मक उपयोग बराक ओबामा ने किया। फिर 2017 में ट्रंप ने इसको चीन के खिलाफ आजमाने की धमकी दी, और 2022-23 में जोसफ बाइडन ने रूस को इससे बाहर ही कर दिया।

भारत को फायदा

नतीजा जाहिर है। दुनिया में मुद्रा की आवाजाही की दोहरी व्यवस्था बन गई, जिसका नुकसान डॉलर की साख को हुआ। स्विफ्ट से जो धंधे डॉलर में ही होने थे, वे अभी दूसरी मुद्राओं में हो रहे हैं। रही बात भारतीय अर्थव्यवस्था की, तो डॉलर की कीमत गिरना, विश्व व्यापार में उसका दखल कम होना और दूसरी तरफ सोने का महंगा होना इसके लिए अब तक फायदेमंद साबित हुआ है। यह सब न होता तो विश्व बाजार में रुपये का हाल और भी बुरा होता। अमेरिकी धौंस के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले एक साल में बढ़ा है और सोने का हिस्सा इसमें 14 से बढ़कर 17% हो गया है। इसकी अकेली वजह सोने का महंगा होना ही है।

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