संपादकीय

दिल्ली चुनाव में आतंकी

अफजल गुरु एक खूंखार आतंकवादी था। वह 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर आतंकी हमले का मास्टर माइंड था। सर्वोच्च अदालत ने बाकायदा सुनवाई के बाद उसे ‘अपराधी’ करार दिया और मौत की सजा सुनाई। उस दौर में एक जमात ऐसी थी, जो अफजल गुरु को माफ करने की पक्षधर थी। सार्वजनिक तौर पर ज्ञापन तैयार कर राष्ट्रपति से अनुरोध किए गए। अंतत: कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए-2 सरकार के दौरान अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। उसी के साथ वह अध्याय समाप्त हो जाना चाहिए था, लेकिन कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती उस आतंकवाद को ‘मासूम’ मानते रहे और फांसी को ‘गलत फैसला’ ठहराते रहे। अफजल गुरु के जिस्मानी अवशेष उसके परिजनों को सौंपने तक की पैरोकारी करते रहे। आश्चर्य और विडंबना है कि दिल्ली चुनाव में अफजल गुरु एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरा है। क्या आतंकवाद और उसके समर्थन पर भी जनादेश मांगा या दिया जा सकता है? ध्यान रहे कि बीते वर्ष से दिल्ली के स्कूलों को ई-मेल के जरिए ऐसी धमकियां मिलती रही हैं, जिनमें बम विस्फोट का खौफ फैलाया जाता रहा है। दिल्ली में 400 स्कूलों को ऐसी धमकियां दी जा चुकी हैं। दिल्ली पुलिस ने जांच के बाद कुछ रहस्योद्घाटन किए, जिनमें अफजल का नाम सामने आया। पुलिसिया जांच का निष्कर्ष यह है कि वे धमकियां एक नाबालिग, 12वीं कक्षा के छात्र ने दी थीं। उसने ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया, जो साइबर की महत्वपूर्ण जानकारी रखने वाला शख्स ही कर सकता था। पुलिस ने जांच के दौरान आरोपित नाबालिग की पारिवारिक पृष्ठभूमि को भी खंगाला, तो यह तथ्य सामने आया कि उसके पिता एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं। एनजीओ के एक राजनीतिक दल से पुराने और प्रगाढ़ संबंध रहे हैं। इस एनजीओ ने अफजल गुरु को फांसी देने का विरोध किया था। दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी के माता-पिता ने भी एक ज्ञापन पर बाकायदा दस्तखत कर फांसी की सजा का विरोध किया था। खुद आतिशी और उनके माता-पिता भी किसी एनजीओ से जुड़े रहे हैं।

नाबालिग वाले एनजीओ और आतिशी परिवार के एनजीओ के बीच क्या कोई ‘साझा सूत्र’ है? पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का बुनियादी काम एनजीओ का ही है। उनके एनजीओ का प्रबंधन आजकल किसके हाथों में है, हमें नहीं पता, लेकिन एनजीओ के जरिए और सूचना के अधिकार के लिए केजरीवाल ने जो काम किए थे, उनके लिए उन्हें ‘मैगसेसे अवार्ड’ से नवाजा गया था। उसे ‘एशिया का नोबेल पुरस्कार’ माना जाता है। सवाल है कि किसी ने ज्ञापन के जरिए अफजल गुरु या याकूब मेमन की सजा का विरोध किया हो, तो क्या वे भी आतंकी करार दिए जा सकते हैं? क्या वह उनकी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ नहीं है? यदि एनजीओ और राजनीतिक दल के बीच कोई ‘आतंकी सूत्र’ है, तो दिल्ली पुलिस ने उसे बेनकाब क्यों नहीं किया? राजनीतिक दल के नाम का खुलासा क्यों नहीं किया? अब भाजपा ‘आप’ के आतंकी सूत्रों पर सवाल उठा रही है। क्या आरोपित छात्र वाला एनजीओ और राजनीतिक दल ‘आप’ ही है? यह चुनाव की संवेदनशीलता का दौर है। एक-एक आरोप चुनाव की दिशा और दशा बिगाड़ सकता है। यह निष्पक्ष चुनाव भी नहीं माना जा सकता। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि पुलिस जांच में यह भी पाया गया कि एनजीओ पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों में शामिल रहा है। सवाल है कि पुलिस ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की? पुलिस ने जिस तथ्य का सार्वजनिक खुलासा किया ही नहीं, उसके बारे में सुधांशु त्रिवेदी कैसे जानते हैं? अलबत्ता पुलिस का इतना जरूर कहना है कि एनजीओ की राजनीतिक पार्टी से निकटता एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है, जिसका मकसद सार्वजनिक अशांति फैलाना हो सकता है! कमाल की बात है कि पुलिस सार्वजनिक अशांति की आशंका जता रही है, लेकिन एनजीओ और पार्टी के नाम का खुलासा नहीं कर रही है।

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