स्वास्थ्य

दांतों का दोस्त और धरती का दुश्मन है आपका रोजाना इस्तेमाल होने वाला टूथब्रश

डेस्क: दांतों की नियमित सफाई, फ्लॉसिंग और छह महीने में एक बार दंत चिकित्सक से दांतों की जांच कराना… ये सभी दांतों की सफाई के लिए जरूरी कदम माने जाते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये दैनिक आदतें अनजाने में पृथ्वी पर माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को बढ़ावा दे रही हैं। शोध से पता चला है कि टूथपेस्ट, फ्लॉस, टूथब्रश और दंत चिकित्सकों द्वारा उपयोग की जाने वाली सामग्री के माध्यम से हर दिन माइक्रोप्लास्टिक के अरबों कण जल प्रणाली में पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि प्लास्टिक माइक्रोबीड पर कई देशों में प्रतिबंध लग चुका है, लेकिन आज भी कई टूथपेस्ट में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद होते हैं।

 
टूथब्रश इस तरह पहुंचा रहा नुकसान

 टूथब्रश दैनिक जीवन का उपयोगी हिस्सा है, लेकिन ये भी इस संकट में योगदान दे रहे हैं। सामान्य उपयोग के दौरान उनके नायलॉन ब्रिसल के छोटे-छोटे कण टूटकर पानी के माध्यम से जल प्रणाली में प्रवेश कर जाते हैं। ये कण मलजल में प्रवेश करते हैं, उपचार प्रणालियों से गुजरते हैं और अंततः समुद्री खाद्य श्रृंखलाओं में पहुंच जाते हैं, जहां इन्हें प्लवक, शंख, मछली खा जाते हैं और अंततः यह मनुष्य के शरीर में पहुंच जाते हैं। इसके अलावा, दांतों की ‘‘रेजिन-बेस्ड कंपोजिट फिलिंग” के भी पर्यावरणीय दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। ब्रिटिश डेंटल जर्नल में प्रकाशित 2022 की समीक्षा में बताया गया कि ये प्लास्टिक फिलिंग समय के साथ टूटकर माइक्रोप्लास्टिक और रसायनिक अवयवों को छोड़ती हैं, जो अंततः अपशिष्ट जल के माध्यम से पर्यावरण में पहुंचते हैं।


माइक्रोप्लास्टिक से आ सकता है हार्ट अटैक

 डेंटल प्रक्रियाओं जैसे ड्रिलिंग या पॉलिशिंग के दौरान बनने वाली महीन प्लास्टिक धूल भी चिंताजनक है। ये कण जल प्रणाली के माध्यम से फैलते हैं और इनके टूटने से और भी ज्यादा रसायन निकल सकते हैं। ऐक्रेलिक डेंचर, माउथगार्ड, नाइटगार्ड और क्लियर अलाइनर भी निरंतर उपयोग से सूक्ष्म प्लास्टिक कण छोड़ते हैं। ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण जल प्रणाली में जाते हैं और किसी न किसी तरह चक्रीय व्यवस्था से होते हुए हमारे शरीर में पहुंचते हैं।  2024 के एक चिकित्सा अध्ययन में धमनी की परत में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए, और उन रोगियों में दिल का दौरा या स्ट्रोक का जोखिम अधिक पाया गया।


ये है इसका समाधान

 ऐसा नहीं है कि इस समस्या का समाधान नहीं है।  यह ध्यान देना होगा कि निर्माता अब प्राकृतिक तत्वों जैसे सिलिका या क्ले वाले टूथपेस्ट बना रहे हैं। यह भी खास बात है कि 15 से अधिक देशों में माइक्रोबीड पर प्रतिबंध लग चुका है। इसके अलावा कुछ डेंटल क्लीनिक एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर जैसी तकनीकों का परीक्षण कर रहे हैं। अब उपभोक्ताओं के पास भी विकल्प हैं। टूथपेस्ट टैबलेट, बांस के ब्रश, प्राकृतिक रेशों वाले फ्लॉस और मेटल ब्रेसेज़ जैसे पर्यावरण अनुकूल विकल्प अब उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नवाचार और जागरूकता के माध्यम से ही हम दंत चिकित्सा को प्लास्टिक संकट से बचाते हुए अपनी मुस्कान को सुरक्षित रख सकते हैं। 

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