सिर्फ बीमारी नहीं, महिलाओं के लिए सामाजिक कलंक बन रही है टीबी; 10% मामलों में टूट रहीं शादियां

नई दिल्ली। टीबी केवल एक संक्रमणजनित रोग ही नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संकट भी है, जो खासकर महिलाओं को बहुत ही साइलेंट तरीके से प्रभावित करता है। हर वर्ष लाखों महिलाओं की मृत्यु का कारण बनने वाली यह बीमारी उनके दैनिक जीवन के संघर्ष को बहुत मुश्किल कर देती है। आइए इस बारे में डॉ. सूर्यकान्त (एचओडी, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, केजीएमयू, लखनऊ) से जानें।
960 महिला टीबी रोगियों पर एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि लगभग 69 प्रतिशत महिलाएं टीबी की गंभीरता और उपचार के महत्व को समझती हैं। स्वास्थ्य जागरूकता में सुधार तो हुआ है, पर अभी भी बड़ी संख्या में महिलाएं इस बीमारी को छिपाने के लिए मजबूर हैं।
इसके पीछे समाज का भय, रिश्तों के टूटने का डर और सम्मान खोने की चिंता होती है। इससे न केवल मानसिक दबाव बढ़ता है, बल्कि वे जरूरी सहयोग से भी वंचित रह जाती हैं। टीबी से ग्रसित महिलाओं लगभग 44 प्रतिशत सामाजिक गतिविधियों से दूरी बना लेती हैं। ऐसा वे तिरस्कार से बचने के लिए करती हैं। टीबी का सबसे गंभीर प्रभाव महिलाओं के वैवाहिक जीवन पर पड़ता है, लगभग 18 प्रतिशत महिलाओं को अपने जीवनसाथी या ससुराल पक्ष से अस्वीकृति का सामना करना पड़ा।
चौंकाने वाली बात है कि लगभग 10 प्रतिशत मामलों में टीबी के कारण विवाह टूट गया। वहीं, 40 प्रतिशत महिलाओं को विवाह से वंचित कर दिया गया, क्योंकि समाज उन्हें ‘बीमार’ और ‘अयोग्य’ मानता है। इस अध्ययन ने समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी उजागर किया है। पुरुष टीबी रोगियों को जहां परिवार विशेषकर उनकी पत्नियों से पूरा सहयोग मिलता है, वहीं महिला रोगी इससे वंचित रह जाती हैं।
केवल दवा नहीं, सोच में बदलाव भी जरूरी
टीबी उन्मूलन के लिए केवल चिकित्सा उपचार पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामाजिक स्तर पर बदलाव आवश्यक है। महिलाओं के लिए विशेष रूप से लैंगिक संवेदनशील कार्यक्रमों की आवश्यकता है, ताकि वे अकेला महसूस न करें।
विश्व में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ रोगी टीबी से ग्रसित होते हैं जिसमें से 28 लाख भारत में होते है। टीबी शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है। फेफड़े की टीबी को पल्मोनरी टीब और शरीर के अन्य हिस्से की टीबी को एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी कहा जाता है। भारत में टीबी के मरीजों में करीब 80 फीसदी में पल्मोनरी से संबंधित होते हैं।
टीबी रोग के लक्षण
इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और कई हफ्तों तक बने रह सकते हैं।
- लगातार खांसी, दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक खांसी आना।
- खांसी में बलगम आना।
- खांसी में खून आना।
- सांस लेने या खांसते समय सीने में दर्द महसूस होना।
- सांस फूलना।
- लंबे समय बुखार रहना, जो शाम को बढ़ जाता है।
- रात में पसीना आना
- दिनभर थकान और कमजोरी महसूस होना।
- भूख नहीं लगना
- वजन में कमी
क्या है टीबी से बचाव के उपाय
दो हफ्ते से ज्यादा खांसी या अन्य टीबी के लक्षण है तो बलगम की जांच और सीने का एक्स-रे कराना चाहिए। बलगम में टीबी के जीवाणु के लिए माइक्रोस्कोप से तथा मालिक्युलर जांच (सीबी नेट या ट्रूनाट) जांचें की जाती है। ये सभी जांचें सरकारी अस्पतालों तथा स्वास्थ्य केन्द्रों में निश्शुल्क की जाती हैं।
किन्हें अधिक खतरा
टीबी रोगी के संपर्क में रहने, कुपोषण, एचआइवी, मधुमेह, महिलाओं में कम उम्र में गर्भधारण और बार-बार गर्भधारण, पर्दा प्रथा, लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाना, वायु प्रदूषण, धूमपान तथा अन्य नशे, साफ-सफाई की कमी, गंदी और घनी आबादी में रहने जैसे कारण से टीबी का खतरा बढ़ता है।
कैसे होता है इसका उपचार
टीबी पूरी तरह से ठीक होने योग्य बीमारी है, बशर्ते कि इसका सही समय पर और पूरी तरह इलाज किया जाए। इसका उपचार छह से नौ महीने तक चलने वाली दवाओं के माध्यम से किया जाता है। इसका पूरा कोर्स लेना जरूरी होता है, अन्यथा बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो सकते हैं और मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर टीबी) हो सकती है, जिसका इलाज और भी कठिन हो जाता है। एमडीआर टीबी का उपचार लगभग दो वर्ष तक चलता है और इन दवाओं के साइड इफैक्ट्स भी ज्यादा होते हैं।
सही आदतों का करें विकास
- व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखें और खांसते या छींकते समय रूमाल या टिशू का उपयोग करें। संक्रमित व्यक्ति को मास्क पहनना चाहिए, ताकि बैक्टीरिया अन्य लोगों तक न पहुंचे।
- संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
- धूमपान, दारू-शराब तथा अन्य नशा, लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना आदि भी टीबी रोग को गंभीर बनाते हैं, इन सब से दूर रहना चाहिए।
- डायबिटीज, फेफड़े की समस्या, कैंसर, हार्ट की बीमारी आदि भी का भी समुचित उपचार किया जाना चाहिए, जिससे कि टीबी का खतरा कम हो सके।



