संपादकीय

प्रतीकों की लड़ाई

उपराष्ट्रपति पद के लिए अब दोनों तरफ से उम्मीदवारों का ऐलान हो चुका है। NDA के सीपी राधाकृष्णन के मुकाबले I.N.D.I.A. ब्लॉक ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी. सुदर्शन रेड्डी को उतारा है। संख्या बल में NDA यानी सत्ता पक्ष का पलड़ा भले भारी सही, लेकिन यह लड़ाई आंकड़ों से ज्यादा प्रतीकात्मक है। विपक्ष ने एक मजबूत कैंडिडेट उतारकर संदेश देने का प्रयास किया है कि वह किसी मोर्चे पर सरकार को फ्री हैंड नहीं देने जा रही।

दोनों नाम दक्षिण से: राधाकृष्णन तमिलनाडु से आते हैं, जबकि सुदर्शन रेड्डी तेलंगाना से। दोनों चेहरों का दक्षिण भारत से होना संयोग नहीं हो सकता और इसी वजह से यह चुनाव और भी दिलचस्प हो जाता है। BJP के लिए दक्षिण अब भी मुश्किल जगह है, जबकि विपक्ष के लिए ऐसा मैदान, जहां उसने मजबूत चुनौती पेश की है। उपराष्ट्रपति चुनाव उसी सियासी लड़ाई का विस्तारित रूप है। जिस तरह से TDP ने राधाकृष्णन के समर्थन का ऐलान किया है, उसका असर दिखने भी लगा है।

मौका और चुनौती: अगर सौ फीसदी वोटिंग होती है, तो दोनों सदनों में मिलाकर चुनाव में जीत के लिए 394 वोट चाहिए होंगे। NDA के पास 422 का संख्याबल है। हालांकि उपराष्ट्रपति का चुनाव गुप्त मतदान द्वारा होता है और सदस्य पार्टी विप से नहीं बंधे होते। सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए यह मौके के साथ चुनौती भी है। दोनों तरफ से अपने समर्थन का दायरा बढ़ाने की कोशिश होगी। खासतौर पर दक्षिण से आने वाले क्षेत्रीय दलों पर नजरें होंगी।

वैचारिक टकराव: उपराष्ट्रपति का पद किसी पार्टी का नहीं होता। इसकी गरिमा को देखते हुए अगर सर्वसम्मति से किसी को चुना जाता, तो ज्यादा अच्छा रहता। हालांकि अभी की राजनीतिक परिस्थितियों में ऐसी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती। देश में पिछले कुछ बरसों से जिस तरह का माहौल है, उसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष ज्यादातर मौकों पर दो विपरीत ध्रुवों पर नजर आए हैं। जिन मामलों में सदन में सहमति की मांग थी, वहां भी सहमति नहीं दिखी, तो यह चुनाव तय ही था। हालांकि लोकतंत्र में वैचारिक लड़ाई भी महत्वपूर्ण है।

अहम जिम्मेदारी: उपराष्ट्रपति पद के इर्द-गिर्द हाल में बहुत हलचल देखने को मिली है। जगदीप धनखड़ जिन परिस्थितियों में और जैसे गए, उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। उम्मीद है कि यह चुनाव बेहतर माहौल में और इस पद के सम्मान को देखते हुए उसके हिसाब से लड़ा जाएगा। जीत जिसकी भी हो, उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं को आगे ले जाने की अहम जिम्मेदारी होगी।

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