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आरक्षण पर ‘सुप्रीम’ सवाल

सर्वोच्च अदालत की एक न्यायिक पीठ ने ओबीसी के उन बच्चों को लगातार आरक्षण देने पर सवाल उठाया है, जिनके परिवार शैक्षिक और आर्थिक रूप से उन्नत, समृद्ध हो चुके हैं। जिनके माता-पिता दोनों ही आईएएस अधिकारी हैं अथवा सरकार में उच्च पदों पर हैं या उनकी संयुक्त आय ‘मलाईदार तबके’ (क्रीमी लेयर) की अधिकृत, अधिकतम सीमा से अधिक है। अर्थात जिन माता-पिता की साझा सालाना आय 8 लाख रुपए से अधिक है, उनके बच्चों को आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए? न्यायिक पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह भी की है-शैक्षिक और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। यदि आरक्षण हमेशा जारी रहा, तो हम कभी भी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे। दरअसल आरक्षण आज अपने सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक मायने खो चुका है और इसे ‘राजनीतिक हथियार’ बना दिया गया है। संविधान तय करने वाले हमारे पुरखों ने अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए 10 साल के आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन वीपी सिंह के प्रधानमंत्री काल के दौरान आरक्षण के दायरे में ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) को भी लाया गया। उसके बाद करीब 50 फीसदी आरक्षण आज भी जारी है। कुछ राज्यों ने आरक्षण की अधिकतम सीमा पार करने और मुसलमानों को भी आरक्षण देने का जुगाड़ कर लिया है। वे सर्वोच्च अदालत के फैसले का भी उल्लंघन कर रहे हैं। संविधान लागू हुए भी 76 साल से अधिक वक्त बीत चुका है। आज शीर्ष अदालत को फिर सवाल उठाना पड़ा है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने जो सवाल उठाया है, उसे देश की राजनीतिक व्यवस्था नजरअंदाज कर देगी, क्योंकि वह आरक्षण की समीक्षा तक के पक्ष में नहीं है। 2024 का लोकसभा चुनाव याद कीजिए। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और विपक्ष के कुछ दलों ने संविधान की एक प्रतीकात्मक पुस्तिका लहराते हुए फर्जी नेरेटिव फैला दिया था कि भाजपा सरकार संविधान को बदलने जा रही है, लिहाजा उसने 400 सीट का लक्ष्य तय किया है। यदि संविधान बदलेगा, तो भाजपा आरक्षण भी समाप्त कर सकती है, क्योंकि संघ परिवार मानसिक और वैचारिक तौर पर आरक्षण-विरोधी है। प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को विश्वास दिलाने के खूब प्रयास किए कि न तो संविधान बदलेगा और न ही आरक्षण समाप्त होगा। आरक्षण आज भी जारी है। अंतत: नतीजा यह हुआ कि चुनाव में भाजपा को सामान्य बहुमत भी नहीं मिला और वह 240 सीट पर ही ठहर गई। उप्र में भाजपा लक्ष्य से 50 फीसदी से भी कम सीटें जीत पाई और सपा के 37 सांसद जीत कर लोकसभा पहुंचे।

कांग्रेस को भी ‘रुंगे’ में 6 सीट मिल गईं। ऐसा ही नेरेटिव अब फिर शुरू किया जा सकता है। ‘आरक्षणवादी विपक्ष’ सर्वोच्च अदालत के सवाल की भी राजनीतिक, चुनावी व्याख्या कर सकता है। आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विषमताओं, विसंगतियों से लडऩे और एक सामाजिक, शैक्षिक समानता का न्याय देने के विचार से की गई थी। एक औसत आईएएस, आईपीएस अधिकारी को करियर की शुरुआत में ही ‘इन हैंड सैलरी’ 95,000-1 लाख रुपए से अधिक मिलती है। नौकरी के अनुभव और वरिष्ठता क्रम में यह वेतन 2 लाख रुपए या उससे अधिक माहवार हो जाता है। सरकारी आवास और वाहन की सुविधाएं अलग हैं। ऐसे अधिकारियों का सत्ता के गलियारों में ‘भौकाल’ अलग किस्म का होता है। ऐसे माता-पिता का बच्चा जब किशोर होता है और 10वीं कक्षा तक पहुंचता है, तो गणना कर लीजिए कि ऐसे अधिकारी माता-पिता की सालाना आय कितनी ‘मलाईदार’ होगी? तो ऐसे बच्चों को ‘पिछड़ा’ मान कर, सामाजिक विपन्न, वंचित मान कर, क्या आरक्षण की सुविधा देनी चाहिए? न्यायिक पीठ का मानना है कि यदि अगली पीढ़ी भी आरक्षण मांगती रहेगी, तो समाज कभी इस व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पाएगा। दरअसल 1992 के ऐतिहासिक ‘इंदिरा साहनी’ फैसले से ‘क्रीमी लेयर’ की व्यवस्था अस्तित्व में आई थी। यह मुद्दा अनिवार्य भी है, लेकिन उससे ज्यादा संवेदनशील भी है। शीर्ष अदालत को अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस मुद्दे पर फैसला सुनाना चाहिए अथवा भारत सरकार को निर्देश देना चाहिए। सिर्फ आईएएस, आईपीएस की ही नहीं, बल्कि भारत सरकार के कई विभागों में निदेशक स्तर के भी अधिकारी हैं, जिनके पास ‘दलित’ या ‘आदिवासी’ के प्रमाण-पत्र हैं, जीवन में खूब सम्पन्नता है, कारों में घूमते हैं और महंगे मकानों में रहते हैं, लेकिन उनके बच्चों को भी आरक्षण प्राप्त है? इस संबंध में कोई तर्कसंगत नीति बननी चाहिए।

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