संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का न्याय

बेशक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति का वह फैसला अशांत, आकुल और विक्षुब्ध करने वाला था। उन्होंने दुष्कर्म करने या उसकी कोशिश करने अथवा दुष्कर्म की मंशा की कानूनी व्याख्या की थी। यदि 688 जिला अदालतों में से किसी का फैसला ऐसा होता, तो बहुत चीखा-चिल्ली मचती और विरोध-प्रदर्शन भी होते। यह देश के 27 उच्च न्यायालयों में से एक के न्यायाधीश का फैसला था और करीब 4 महीने तक खूब चिंतन-मनन करने के बाद फैसला सुनाया गया था, लिहाजा सर्वोच्च अदालत को ज्यादा संवेदनहीन और अमानवीय लगा, नतीजतन विवादित हिस्से पर रोक लगा दी गई। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा था-पीडि़ता के निजी अंगों को पकडऩा और पायजामे का नाड़ा तोडऩा दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश नहीं मानी जा सकती। इस फैसले पर न्यायविदों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बहुत तल्ख प्रतिक्रियाएं जताई थीं। ‘वी द वुमेन ऑफ इंडिया’ की अर्जी पर सर्वोच्च अदालत को स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की न्यायिक पीठ ने कहा कि ‘यह मामला नाबालिग से दुष्कर्म का है, जो बेहद गंभीर है। खेद है कि फैसला देने वाले जज के खिलाफ कठोर शब्दों का प्रयोग करना पड़ रहा है। यह फैसला जज का असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाता है, लिहाजा इस पर रोक जरूरी है।’

केंद्र के सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने भी पीठ के फैसले से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि दुष्कर्म की तैयारी थी, दुष्कर्म नहीं किया गया, जज के फैसले में ऐसा कहा गया है। यह बेहद गंभीर टिप्पणी है। जस्टिस गवई ने यह भी कहा था कि पीडि़ता की मां की याचिका भी टैग की जाए। अदालत ने केंद्र, उप्र सरकार और पक्षकारों को नोटिस भेज कर जवाब मांगा है। बहरहाल सवाल है कि ‘दुष्कर्म’ का भाव क्या होता है? आरोपितों ने उस नाबालिग लडक़ी के निजी अंगों को क्यों पकड़ा था? पायजामे का नाड़ा क्यों तोड़ा या खोला था? और उस लडक़ी को पुलिया के नीचे क्यों ले जाना चाहते थे? इन सभी हरकतों में दुष्कर्म की नीयत अथवा मंशा साफ थी, लिहाजा एक आम आदमी के तौर पर हम इसे दुष्कर्म ही मानेंगे। आमतौर पर फैसले के ऐसे चरण में सर्वोच्च अदालत हस्तक्षेप नहीं करती और न ही रोक लगाती, लेकिन न्याय के नाम पर यह अनैतिक था और न्यायिक सिद्धांतों से परे था, लिहाजा विवादित हिस्से पर रोक लगानी पड़ी। वो तो लडक़ी जोर से चीखती रही, लिहाजा कुछ लोग उसे बचाने को वहां आ गए और आरोपित वहां से भाग गए, नतीजतन लडक़ी दुष्कर्म के दंश से बच गई। अलबत्ता दुष्कर्म हो सकता था। वर्ष 2021 में सर्वोच्च अदालत ने आरोपित पैतृक और स्त्री-द्वेषी रवैये के खिलाफ एक व्यापक चेकलिस्ट जारी की थी। खासकर न्यायिक फैसलों के संदर्भ में यह किया गया था, लेकिन अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। निचली अदालतों में स्थितियां काफी खराब हैं। सवाल हैं कि ऐसे मामलों में देश के आम नागरिक को अदालतों से इतर न्याय कहां से मिल सकता है? दुष्कर्म के काफी मामलों में विवाह को ही एक अंतिम उपाय माना जाता रहा है। क्या यही अंतिम विकल्प हो सकता है? लडक़ी बलात् दुष्कर्मी को अपना जीवन-साथी, पति कैसे स्वीकार कर सकती है? बहरहाल, एक नाबालिग लडक़ी के संदर्भ में सर्वोच्च अदालत ने जो फैसला दिया है, वह उदाहरण बनाया जाना चाहिए।

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