संपादकीय

अमेरिकी हमले के बाद मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ेगा

Tension in Middle East : अमेरिका ने जीबी 57ए/बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमओपी का इस्तेमाल किया. इसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है. इसमें धरती के अंदर 60 मीटर घुसने के बाद धमाका होता है और लक्ष्य समाप्त हो जाता है.

 अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले सोशल मीडिया साइट पर इसकी घोषणा की और बाद में राष्ट्र को संबोधित किया. जब ट्रंप व्हाइट हाउस से देश को संबोधित कर रहे थे, तब उनके साथ उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री खड़े थे. अमेरिका ने जीबी 57ए/बी मैसिव ऑर्डिनेंस पेनिट्रेट या एमओपी का इस्तेमाल किया. इसे बंकर बस्टर बम भी कहा जाता है. इसमें धरती के अंदर 60 मीटर घुसने के बाद धमाका होता है और लक्ष्य समाप्त हो जाता है.

ईरान का फोर्डो संयंत्र पहाड़ के अंदर 80 मीटर की गहराई में स्थित है और इसकी संरचना अत्यंत गुप्त और मजबूत है. नतांज राजधानी तेहरान से लगभग 250 किलोमीटर दक्षिण में स्थित ईरान का सबसे बड़ा यूरेनियम संवर्धन संस्थान माना जाता है. यहां से बड़े पैमाने पर यूरेनियम को उच्च स्तर तक संवर्धित करने के वाले सेंट्रीफ्यूज यूनिटों को ऑपरेट किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा एजेंसी का आकलन है कि ईरान ने यूरेनियम को 60 फीसदी तक संवर्धित किया है. परमाणु बम बनाने के लिए 90 फीसदी तक शुद्ध यूरेनियम चाहिए. इस्फाहान ईरान का ऐतिहासिक स्थल होने के साथ आधुनिक परमाणु विज्ञान का एक विशाल केंद्र और सबसे बड़ा न्यूक्लियर रिसर्च काॅम्प्लेक्स है. अगर ये तीनों नष्ट हो गये हैं, तो ईरान के लिए अगले कुछ दशक तक परमाणु कार्यक्रम खड़ा करना कठिन होगा.


अगर अमेरिका और इस्राइल का लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को समाप्त करना है, तो यह पूरा हो चुका है. अब यह स्पष्ट हो रहा है कि इस्राइल ने हमला अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बातचीत और समन्वय के साथ ही किया था. आरंभिक काम उन्हें करना था और बाद में अमेरिका को हस्तक्षेप कर उसे पूर्णता तक ले जाना था. प्रश्न है कि अब आगे होगा क्या? अमेरिका और इस्राइल, दोनों को मालूम है कि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद आयतुल्लाह खोमैनी या अयातुल्लाह अलखामेनेई तथा इनके तहत चलने वाले शासन का प्रमुख लक्ष्य इस्राइल को राष्ट्र के रूप में नष्ट करना है. खामेनेई ने पहले ही ट्रंप की चेतावनी पर समर्पण करने से इनकार करते हुए दोनों को सबक सिखाने की बात कही थी. अमेरिकी हमले के बाद ईरान के सरकारी टेलीविजन पर कहा गया कि अब क्षेत्र में हर अमेरिकी नागरिक और सैनिक उसका लक्ष्य है. हमले के बाद ईरान के तेवर और आक्रामक हैं. खामेनेई के प्रतिनिधि हुसैन शरियत मदारी ने बहरीन में अमेरिकी नौसैनिकों पर मिसाइल हमले के साथ अमेरिकी, ब्रिटिश, जर्मन और फ्रांसीसी जहाज के लिए होर्मुज जलडमरुमध्य बंद करने की बात कही. इस्राइल के हमले के जवाब में ईरान ने हमला करना जारी रखा है.

ईरान की हैसियत सीधे युद्ध की नहीं है. रूस और चीन ईरान की मदद कर सकते हैं. चीन ने हथियारों से उसकी मदद की भी है. अभी तक ईरान गाजा में हमास, लेबनान और सीरिया से हिज्बुल्लाह और यमन से हूतियों द्वारा इस्राइल से परोक्ष युद्ध लड़ता रहा है. हिजबुल्लाह और हमास की शक्ति काफी हद तक इस्राइल ने नष्ट कर दी है और हूतियों की भी स्थिति कमजोर कर दी गयी है. इस्राइल लंबे समय से युद्ध की तैयारी कर रहा था. उसने पहले इन तीन संगठनों को नष्टप्राय किया. आरंभ में ही उसने ईरान के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों और सेना के सभी अंगों के मुख्य सेनापतियों तथा रणनीतिकारों को समाप्त किया. ईरान के रक्षा स्थलों, रणनीति बनाने वाले केंद्रों, परमाणु संयंत्रों, आंतरिक सुरक्षा के प्रमुख स्थलों को हमले से ध्वस्त करने या कमजोर करने की कोशिश की तथा उसमें एक हद तक उसे सफलता मिली. दूसरे देश बयान देते रहे, लेकिन कोई ईरान के साथ लड़ने नहीं आया.

ट्रंप जब पिछले महीने पश्चिम एशिया गये थे, तो निश्चित रूप से उनका उद्देश्य ईरान पर संभावित हमले के समय यह सुनिश्चित करना रहा होगा कि कोई देश ईरान का सक्रिय समर्थन न करे. जिस ढंग की कट्टरता खामेनेई प्रशासन की है, वैसा जॉर्डन, मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि की नहीं है. ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को भोजन के लिए बुलाया तथा एक घंटे की जगह दो घंटे का समय दिया, तो उसके पीछे ईरान पर हमले के समय पाकिस्तान के इस्लाम के नाम पर सहयोग से दूर रखने की रणनीति ही थी. खामेनेई और ईरान के नेता इस्राइल को खत्म करने की चाहे जितनी बात करें, इस्राइल ने पहले भी ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों, शीर्ष सैन्य अधिकारियों को मौत के घाट उतारा, मिसाइल हमले किये, पर ईरान कभी सशक्त प्रत्युत्तर नहीं दे पाया. अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा प्रतिबंध ने उसे कुछ मायनों में कमजोर किया है. अमेरिका की उपस्थिति पूरे अरब में है और उसके 40 हजार जवान क्षेत्र में हैं.


तो होगा क्या? अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान, लीबिया आदि में सत्ता परिवर्तन का हश्र देखा है. इसलिए शायद सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी आदि के हश्र की पुनरावृत्ति से बचे. किंतु अमेरिका अगर खामेनेई की जगह किसी और को सत्ता हस्तांतरित करने का लक्ष्य रखता या तय करता है, तो कार्रवाई करनी होगी. कुल मिलाकर, भावी स्थिति के बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता. हमें आगे की घटनाओं पर दृष्टि रखनी पड़ेगी.

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