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बगावत की चिंगारी को बुझा कर बहुमत की ज्वाला पैदा करना कोई अमित शाह से सीखे

देखा जाये तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चुनावी शैली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह रणनीति को तीन आयामों में रचते हैं— संगठन, समाज, और संदेश। यही भाजपा का वह मॉडल है जिसने उसे बार-बार कठिन इलाकों में जीत दिलाई है।

बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्ट्राइक रेट का 90% से ऊपर रहना संगठनात्मक पराक्रम का भी परिणाम है। चुनाव से पहले के हालात पर गौर करें तो नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी को खत्म करना सबसे बड़ी चुनौती थी। साथ ही गठबंधन के घटक दलों के बीच सीट बँटवारे और सबको साथ लेकर चलने की चुनौती भी थी। ऐसे में अमित शाह ने यह जिम्मेदारी अपने हाथ में ली। बिहार में अमित शाह ने 4–5 महीने पहले ही मोर्चा संभाल लिया था। अमित शाह के कमान संभालने के बाद भाजपा और सहयोगियों के बीच कई दौर की वार्ता हुई। अमित शाह JD(U), LJP (RV), RLSP और HAM को एक मंच पर लेकर आये। सीट-दर-सीट जातीय समीकरण का सटीक विश्लेषण किया गया और संभावित विवादों को समय रहते शांत किया गया। यह वह काम है जो सामान्यतः चुनाव घोषित होने के बाद शुरू होता है लेकिन अमित शाह ने महीनों पहले इसकी नींव तैयार कर दी थी।

देखा जाये तो अमित शाह का चुनावी अभियान केवल मंच के भाषणों तक सीमित नहीं होता। उनकी शैली हमेशा जमीनी संरचना को मजबूत करने पर आधारित होती है। 5 जिला स्तरीय संगठन बैठकें, 5 क्लस्टर स्तर की बैठकें, 35 विशाल रैलियाँ, 1 महत्त्वपूर्ण रोड शो और और हर दौरे पर कोर ग्रुप के साथ बैठकें की गयीं। इस दौरान अमित शाह लगातार एक ही बात दोहराते रहे कि “बूथ जीते बिना चुनाव नहीं जीता जाता।” उनका यह फोकस बालू की दीवार को भी कंक्रीट का किला बना देता है। अमित शाह की निगरानी में बिहार में भाजपा का बूथ नेटवर्क तगड़ा हुआ और परिणाम सामने आया— प्रचंड जनादेश।

इसके अलावा, बिहार के दरभंगा जिले की अलिनगर विधानसभा सीट अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों का केंद्र बन गई थी जब भाजपा ने यहाँ से लोकप्रिय मैथिली लोकगायिका मैथिली ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर एक साहसी राजनीतिक दांव खेला था। हालांकि यह दांव जितना आकर्षक था, उतना ही जोखिमभरा भी क्योंकि ज़मीनी स्तर पर तुरंत असंतोष की लहर उठी। वर्षों से पार्टी के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे और कई ने बगावत की चेतावनी दे दी। स्थिति ऐसी थी कि यह प्रयोग भाजपा के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता था। लेकिन राजनीति में संकट वहीं खत्म होता है जहाँ अमित शाह का प्रवेश होता है। चुनावी अभियानों के महारथी, संघटनात्मक इंजीनियरिंग के सिद्धहस्त और आधुनिक भारतीय राजनीति के अजेय रणनीतिकार, अमित शाह ने एक बार फिर दिखा दिया कि उन्हें यूँ ही भाजपा का ‘चाणक्य’ नहीं कहा जाता।

हम आपको बता दें कि अलिनगर उन सीटों में से थी जिन्हें भाजपा पारंपरिक रूप से “अनुकूल” नहीं मानती। मैथिली ठाकुर जैसे युवा चेहरे को उतारना प्रधानमंत्री मोदी के उस बड़े प्रयोग का हिस्सा था जिसमें वह पार्टी में युवाओं, कलाकारों और नई पीढ़ी को निर्णायक भूमिका में लाना चाहते हैं। लेकिन पुराने कार्यकर्ताओं की नाराज़गी ने स्थिति को नाजुक बना दिया। यहीं अमित शाह ने अपनी विशिष्ट शैली में कमान संभाली। उन्होंने थकान को दरकिनार करते हुए एक के बाद एक फोन कॉल किए, हर ‘आक्रोशित’ नेता को शांत किया, हर असंतुष्ट कार्यकर्ता को सुना और धीरे-धीरे बगावत की आग को पूरी तरह शांत कर दिया। यह वही हस्तक्षेप था जिसने मैथिली ठाकुर के लिए रास्ता साफ किया।

पार्टी के दिल्ली और पटना दोनों ही धड़ों में यह स्वीकार किया गया कि अलिनगर की ऐतिहासिक जीत अमित शाह की अथक मेहनत और उनके अद्वितीय संकट प्रबंधन क्षमता का परिणाम थी। बात सिर्फ अलिनगर की भी नहीं है क्योंकि रूठों को मनाने और असंतुष्टों को समझाने का काम अमित शाह ने पूरे बिहार में किया। उन्होंने बगावत की चिंगारी को बुझा दिया और बहुमत की ज्वाला पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनाव प्रचार के पूरे अभियान के दौरान अमित शाह ने अलग-अलग महत्वपूर्ण बैठकों, संवादों और रणनीतिक हस्तक्षेपों के माध्यम से न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति राजनीतिक सद्भावना को भी सार्थक दिशा दी।

देखा जाये तो अमित शाह की चुनावी शैली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह रणनीति को तीन आयामों में रचते हैं— संगठन, समाज, और संदेश। यही भाजपा का वह मॉडल है जिसने उसे बार-बार कठिन इलाकों में जीत दिलाई है। देखा जाये तो चुनाव सिर्फ प्रचार से नहीं जीते जाते। चुनाव जीते जाते हैं संयम, संवाद, रणनीति और समय पर लिए गए सटीक निर्णयों से। यह जीत बताती है कि असंतोष चाहे कितना भी गहरा हो, संगठनात्मक नियंत्रक की भूमिका में अमित शाह अतुलनीय हैं। युवा चेहरों को आगे लाने का मोदी–शाह मॉडल सिर्फ प्रयोग नहीं, यह भविष्य की राजनीति का रोडमैप है। भाजपा अब सिर्फ परंपरागत समीकरणों पर नहीं, बल्कि नए सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगों पर खड़ी एक गतिशील पार्टी बन चुकी है।

अमित शाह भले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन पार्टी आज भी हर बड़ी चुनावी लड़ाई में उनके नेतृत्व-क्षमता पर ही निर्भर रहती है। वह महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में भी कठिन परिस्थितियों को अवसरों में बदल चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत है— राजनीति को भावना नहीं, प्रणाली के तौर पर देखना। अगला चुनावी युद्धक्षेत्र पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा कर दी है कि “बंगाल के जंगलराज को समाप्त करना है।” माना जा रहा है कि अमित शाह अब बंगाल पर ध्यान केंद्रित करेंगे। क्योंकि जहाँ मोदी जन-भावना जगाते हैं, वहाँ शाह जन-भावना को संरचना में बदलते हैं।

बहरहाल, यदि राजनीति एक विद्या है, तो अमित शाह उस विद्या के अधिष्ठाता हैं— रणकौशल, बुद्धि और संगठनात्मक कठोरता के अद्वितीय संयोजन के साथ। अमित शाह की राजनीति आधुनिक चाणक्य की तरह निर्णायक और परिणाम-केंद्रित है।

-नीरज कुमार दुबे

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