राष्ट्रीय

शरद पूर्णिमा, चंद्रमा के पूर्ण स्वरूप का उत्सव

हिंदू धर्म में वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा का अपना एक अलग महत्व है और हर पूर्णिमा तिथि को धनदायक तथा शुभ माना जाता है, किन्तु कुछ विशेष पूर्णिमा तिथियों को बेहद शुभ एवं समृद्धशाली माना गया है और इन्हीं पूर्णिमा में से एक है शरद पूर्णिमा। शरद पूर्णिमा से ही ऋतु परिवर्तन की शुरुआत होती है। अत: वात, पित्त और कफ दोषों को सही स्थिति में लाने के लिए मधुर रस अर्थात खीर का सेवन किया जाता है। खीर मीठी होती है और शीत ऋतु में होने वाले पित्त को कम करती है। आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा पर्व का महत्व मौसम परिवर्तन के हिसाब से बहुत ज्यादा है। दरअसल शरद पूर्णिमा से ही मौसम में ठंड की शुरुआत होती है और यह पर्व शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता पर अच्छा प्रभाव डालता है तथा आगे चलकर पाचन क्रिया भी सही करता है, जिससे गरिष्ठ भोजन कर स्वस्थ रहा जा सकता है…

हिंदू धर्म में वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा का अपना एक अलग महत्व है और हर पूर्णिमा तिथि को धनदायक तथा शुभ माना जाता है, किन्तु कुछ विशेष पूर्णिमा तिथियों को बेहद शुभ एवं समृद्धशाली माना गया है और इन्हीं पूर्णिमा में से एक है शरद पूर्णिमा। हिन्दू पंचांग में आश्विन मास में आने वाली इस पूर्णिमा का सर्वाधिक महत्व माना गया है, जो ‘धनदायक पूर्णिमा’ भी मानी जाती है। चंद्रमा जब हर महीने शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि को पूर्ण रूप से आसमान में दिखाई देता है, वह पूर्णिमा तिथि होती है और आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है, जो हिन्दू धर्म में सर्वाधिक धार्मिक महत्व वाली पूर्णिमा मानी जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष आश्विन शुक्ल की पूर्णिमा तिथि 16 अक्तूबर की रात 8 बजकर 40 मिनट से शुरू होगी और 17 अक्तूबर को शाम 4 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। ऐसे में शरद पूर्णिमा का पर्व 16 अक्तूबर को ही मनाया जाएगा। शरद पूर्णिमा वास्तव में एक ऐसा धार्मिक पर्व है, जिसमें चंद्रमा के पूर्ण स्वरूप का उत्सव मनाया जाता है। इसीलिए इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है। शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी धरती को अपने प्रकाश से आलोकित करती है और इसी उजियारे के बीच पूर्णिमा का यह पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा पर चंद्रमा से उत्पन्न होने वाली किरणें अद्भुत, स्वास्थ्यप्रद और पुष्टिवर्धक गुणों से भरपूर होती हैं और चंद्रमा की इन रश्मियों से आरोग्य की प्राप्ति भी होती है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में चंद्रमा को ‘औषधीश’ (औषधियों का स्वामी) कहा गया है। ‘चंद्रमा मनसो जात:’, यानी चंद्रमा को वेद, पुराण एवं ग्रंथों में मन के तुल्य स्वीकार किया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:’, यानी मैं ही रसस्वरूप अमृतमय चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियों और वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर्षभर में केवल शरद पूर्णिमा के ही दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है अर्थात् चंद्रमा पूरी 16 कलाओं के साथ उदय होते हैं। ये 16 कलाएं हैं अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, धृति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण, पूर्णामृत, प्रतिपदा। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक कला मनुष्य की एक विशेषता का प्रतिनिधित्व करती है और इन सभी 16 कलाओं से सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार केवल भगवान श्रीकृष्ण ही सभी सोलह कलाओं से युक्त थे। शरद पूर्णिमा को ‘कौमुदी’ अर्थात चन्द्र प्रकाश, कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कोजागर का अर्थ है ‘कौन जाग रहा है’ और इसके पीछे मान्यता है कि इस रात में जागकर जो श्रद्धालु मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं, उन पर लक्ष्मी की कृपा अवश्य होती है। शरद पूर्णिमा पर्व को भगवान श्रीकृष्ण से भी जोड़ा जाता है और इसे रास पूर्णिमा का नाम दिए जाने के पीछे मान्यता यही है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि को ही श्रीकृष्ण ने अपनी मुरली की मधुर धुन पर गोपियों के साथ यमुना तट पर महारास नामक दिव्य नृत्य किया था। धर्मशास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने रासोत्सव का यह दिन वास्तव में जगत की भलाई के लिए ही निर्धारित किया था। आज भी रास पूर्णिमा को वृंदावन और बृज में बड़े स्तर पर मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा के ही दिन समुद्र मंथन से धन की देवी मां लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी, इसीलिए शरद पूर्णिमा को धनदायक भी माना जाता है। मान्यता है कि मां लक्ष्मी इस दिन पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जो लोग रात्रि जागरण कर उनका पूजन करते हैं, वे उन पर अपनी कृपा बरसाती हैं और उन्हें धन-वैभव प्रदान करती हैं। ऐसी मान्यता भी है कि शरद पूर्णिमा पर व्रत रखकर रातभर सच्चे हृदय से मां लक्ष्मी का पूजन करने से व्यक्ति की कुंडली में लक्ष्मी योग नहीं होने पर भी अथाह धन एवं वैभव की प्राप्ति होती है। इस दिन मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की भी पूजा अर्चना की जाती है और शिव-पार्वती तथा कार्तिकेय की भी पूजा का विधान है। शास्त्रों में यह उल्लेख भी मिलता है कि लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की अमृतमयी किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण कर पुनर्यौवन की शक्ति प्राप्त करता था। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है और ऐसा प्रतीत होता है, जैसे पृथ्वी चंद्रमा की दूधिया रोशनी में नहा गई है।

इस अवसर पर चंद्रमा की विशेष पूजा-अर्चना किए जाने का विधान है और चंद्र देवता को खीर का भोग लगाया जाता है। यह प्रसाद चंद्रमा के सभी सकारात्मक एवं दिव्य गुणों के लिए घर के आंगन में खुले आसमान के नीचे रखा जाता है। दरअसल धार्मिक मान्यताएं हैं कि इस दिन आसमान से अमृत की बूंदों की वर्षा होती है और इस अमृत वर्षा से चंद्रमा की चांदनी में रखी खीर में भी अमृत समा जाता है, जिससे यह खीर अमृत समान हो जाती है, जिसे परिजनों द्वारा सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दूध, चीनी तथा चावल चंद्र ग्रह से जुड़े हैं, इसलिए इनमें चंद्रमा का प्रभाव सर्वाधिक रहता है। वैसे शरद पूर्णिमा की रात को चांद की रोशनी में खीर रखने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। शरद पूर्णिमा की रात्रि को खुले आसमान के नीचे रखी जाने वाली खीर का औषधीय के अलावा वैज्ञानिक महत्व भी सिद्ध हो चुका है। दरअसल दूध में प्रचुर मात्रा में लैक्टिक एसिड होता है, जो चंद्रमा की तेज रोशनी में दूध में पहले से मौजूद बैक्टीरिया को और बढ़ाने में सहायक होता है। दूसरी ओर खीर में पड़े चावलों में मौजूद स्टार्च इस कार्य को और भी आसान बना देता है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रोशनी सबसे तेज होती है और रात में चांदी के बर्तन में खीर रखने से उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता का विस्तार होता है। दरअसल चांदी के बर्तन में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी ज्यादा होती है, इसलिए घर में अगर कोई चांदी का बर्तन हो तो शरद पूर्णिमा की रात उसमें खीर रखना सबसे ज्यादा फायदेमंद है।

माना जाता है कि यह अमृतमय खीर खाने से मनुष्य की उम्र बढ़ती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा को वर्षा काल की समाप्ति तथा शीत काल की शुरुआत माना जाता है, अर्थात इस दिन से सर्दियों की शुरुआत हो जाती है। यह वही समय है जब मौसम में परिवर्तन की शुरुआत होती है और शीत ऋतु का आगमन शुरू होता है। शरद पूर्णिमा से ही ऋतु परिवर्तन की शुरुआत होती है। अत: वात, पित्त और कफ दोषों को सही स्थिति में लाने के लिए मधुर रस अर्थात खीर का सेवन किया जाता है। खीर मीठी होती है और शीत ऋतु में होने वाले पित्त को कम करती है। आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा पर्व का महत्व मौसम परिवर्तन के हिसाब से बहुत ज्यादा है। दरअसल शरद पूर्णिमा से ही मौसम में ठंड की शुरुआत होती है और यह पर्व शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता पर अच्छा प्रभाव डालता है तथा आगे चलकर पाचन क्रिया भी सही करता है, जिससे सर्दी के मौसम में गरिष्ठ भोजन कर स्वस्थ रहा जा सकता है। कुछ राज्यों में शरद पूर्णिमा को फसल कटाई के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।-योगेश कुमार गोयल

Show More

Daily Live Chhattisgarh

Daily Live CG यह एक हिंदी वेब न्यूज़ पोर्टल है जिसमें ब्रेकिंग न्यूज़ के अलावा राजनीति, प्रशासन, ट्रेंडिंग न्यूज, बॉलीवुड, बिजनेस, रोजगार तथा टेक्नोलॉजी से संबंधित खबरें पोस्ट की जाती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button